लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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2009 की बिदाई के साथ ही अब नए दशक के स्वागत की तैयारियां आरंभ हो गईं हैं। देश अब विजन 2020 को देख रहा है। आने वाले दस साल भारत के लिए चुनौतियों से भरे होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। देखा जाए तो दस से कहीं ज्यादा बडी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है 2020।

वैसे भी मनुष्य योनी में टीन एज (थर्टीनी 13 साल से उन्नीस साल नाईंटीन) की उम्र काफी महत्वपूर्ण होती है। इस आयु में शारीरिक बदलाव के साथ ही साथ मानसिक तौर पर भी बदलाव की बयार बहती है। बीस साल की आयु को पाने के साथ ही मनुष्य में शनै: शनै: परिपक्वता का बोध होने लगता है। दस से बीस साल की उम्र किसी भी व्यक्ति के जीवन की दशा और दिशा तय कर देती है, और कमोबेश यही बात देश पर भी लागू होती है।

इंदिरा, राजीव गांधी के इक्कीसवीं सदी के सपनों का भारत देश आजादी के बाद लगातार ही लहरों में हिचकोले खाता रहा है। इक्कसवीं सदी के पहले दशक में देश की जनता बुरी तरह हलाकान रही। मंहगाई चरम पर थी तो आंतरिक सुरक्षा की चूलें हिल रहीं थीं। देश में गेंहूं दाल सब्जियों के भाव आसमान पर थे, अर्थशास्त्र के ज्ञाता प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह भी हाथ बांधे चुपचाप देखते रहे।

मधु कोडा जैसे मुख्यमंत्री पर चार हजार करोड रूपए के घोटाले के आरोप लगे तो बूटा सिंह के पुत्र रिश्वत लेते दिखे। देश की रक्षा की सौगंध उठाने वाली सेना के शीर्ष अधिकारी भी भ्रष्टाचार के मकडजाल में उलझे दिखे। उमरदराज राजनेता नारायण दत्त तिवारी अपनी पोती की उम्र की कन्याओं के साथ रासलीला करते दिखाई दिए। नए राज्यों के सृजन के लिए कांग्रेस ने तेलंगाना की बिसात बिछाई पर इस होम में कांग्रेस के ही हाथ जल गए। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी एसपीएस राठौर पर रूचिका को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा घटना के उन्नीस साल बाद चलाने का निर्णय लिया जाना भारतीय व्यवस्थाओं की जडों में लगी दीमक की ओर ही इशारा करती है।

2009 में भारत देश की महिलाओं ने बुलंदियों को छुआ है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक तरफ जहां देश की पहली महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सत्तर की उम्र में भी लडाकू विमान सुखोई की यात्रा करने का साहस दिखाया तो मीरा कुमार जैसी सभ्रांत और कुलीन महिला को लोकसभा का प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव मिला। इतना ही नहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सुषमा स्वराज ने भी बाजी मारी।

आने वाले दशक में हिन्दुस्तान के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है। सबसे बडी चुनौति के रूप में देश की बढती आबादी ही दिखाई दे रही है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में देश के वाकई में भविष्यदृष्टा कहे जाने वाली शख्सियत स्व.संजय गांधी ने नसबंदी को कडाई के साथ लागू किया था। अगर संजय गांधी एसा नहीं करते तो आज देश की आबादी की कल्पनामात्र से ही रूह कांप उठती है।

इसके अलावा पानी और अधारभूत संरचनाओं के मामले में भारत देश की स्थिति बहुत ही खराब है। भ्रष्टाचार के केंसर से देश बुरी तरह कराह रहा है। देश की साठ फीसदी से अधिक जनता किसी न किसी नशे की गिरफ्त में अपना जीवन तबाह किए हुए है। देश में आज भी जातिभेद और लिंगभेद की मजबूत दीवारें खडीं हैं।

समूची दुनिया में भारत जैसा लोकतंत्र शायद ही कहीं हो। भारत को आज भी अपने विधायक या सांसद को वापस बुलाने का और मतपत्र में नकारात्मक वोटिंग अर्थात इनमें से कोई नहीं का विकल्प नहीं दिया गया है। भारत में पुलिस की दखल से आजादी दिलाना सबसे बडा काम होगा साथ ही सालों साल चलते अदालत के फैसलों को निश्चित समयावधि में निपटाना भी चुनौति से कम नहीं है।

सरकार और जंगल माफिया की मिलीभगत से हरे भरे हिन्दुस्तान में जंगलों की तादाद काफी कम ही रह गई है। विजन 2020 में देश को एक बार फिर हरा भरा बनाना होगा। आधारभूत संरचना में भारत की सडकों, रेल मार्ग, अंदरगामी रेल और सडक मार्ग (टनल), पुल पुलिया और फ्लाई ओवर का निर्माण भी बडे पैमाने पर किया जाना बाकी है। भारत में बुलेट रेल गाडी की दरकार काफी अरसे से महसूस की जा रही है। विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत में रेल की पांतें तेज गति से रेल चलाने के लिए नाकाफी ही कही जा सकतीं हैं। भोपाल से दिल्ली के बीच का कुछ हिस्सा भर 150 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार सह सकता है शेष में 130 से ज्यादा गति नहीं बढाई जा सकती है।

देश में विज्ञान और प्रोद्योगिकी को बढावा देने, आंतरिक सुरक्षा मजबूत करना, काश्मीर समस्या का हल, भ्रष्टाचार का खात्मा, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं मुहैया करवाना, बिजली का उत्पादन बढाना आदि समस्याओं जूझना होगा भारत देश को। विजन 2020 के लिए अभी से ही रोडमेप तैयार करना होगा वरना 2020 आते समय नहीं लगेगा और भारत देश एक बार फिर विकास के मार्ग खोजने के लिए दर दर भटकने पर मजबूर हो जाएगा।

-लिमटी खरे

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