लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


-सतीश सिंह

एक बार फिर खाद्य व कृषि मंत्री श्री शरद पवार चर्चा में हैं। अब श्री पवार शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने की जुगाड़ में हैं। श्री पवार ने 3 सितम्बर को प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के समक्ष शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने की योजना प्रस्तुत की है। इस खाके को अन्य मंत्रालयों के पास उनके सुझाव हेतु भेजने का भी विचार श्री पवार का है। ज्ञातव्य है कि इस कवायद में उनका साथ शक्कर उघोग से जुड़े हुए पूंजीपति भी दे रहे हैं। शक्कर लॉबी देश में इस कदर हावी है कि शक्कर उघोग के पेड विष्लेषक कह रहे हैं कि शक्कर क्षेत्र को विनियंत्रित करने वाले सुधार से गन्ने के उत्पादन में स्थिरता लाई जा सकती है।

जबकि भारत जैसे देश में गन्ने का उत्पादन बहुत हद तक मानसून पर निर्भर करता है। दूसरे परिपेक्ष्य में इसे देखें तो किसानों के बीच उत्साह का अभाव भी गन्ना के उत्पादन को प्रभावित करता है। आमतौर पर बिचौलियों और कृत्रिम बाजार के सूत्रधारों के हाथों में पिसकर किसान गन्ना बोने से तौबा कर लेते हैं। गन्ने का अच्छा उत्पादन हो या कम दोनों स्थितियों में किसानों को व्यापारियों और शक्कर मिल मालिकों की मर्जी से ही गन्ने की कीमत मिलती है। इसलिए यह कहना कि शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने से गन्ने के उत्पादन में स्थिरिता आ सकती है, पूर्णरुप से गलत संकल्पना है।

सूत्रों के मुताबिक 15 सालों से शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। बावजूद इसके शक्कर की कीमत में होने वाले उतार-चढ़ाव और अन्यान्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में होने वाली बढ़ोत्तारी के कारण सरकार ने अभी तक शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित नहीं किया है।

जानकारों की मानें तो 2010-11 में गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है। इसी अनुमान के आधार पर श्री पवार ने शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करने वाली अपनी योजना को प्रधानमंत्री के सामने रखा है। उल्लेखनीय है कि विनियंत्रण के बाद शक्कर की कीमत को बाजार तय करेगा।

आने वाले साल में शक्कर का उत्पादन तकरीबन 2.3 करोड़ टन होने का अनुमान लगाया जा रहा है। विष्वविख्यात विश्‍लेषक किंग्समैन एसए का भी मानना है कि अगले साल भारत में शक्कर का उत्पादन 2.3 से 2.8 करोड़ टन के बीच में रह सकता है।

पुनश्‍च: श्री पवार का कहना है कि इस क्षेत्र को विनियंत्रित करने से किसानों को लाभ होगा। वे अपना मर्जी से सबसे अधिक कीमत देने वाले मिल के मालिक को गन्ना बेच सकेंगे। इतना ही नहीं विनियंत्रण के बावजूद सरकार गन्ना के लिए एफआरपी तय करना जारी रखेगी। एफआरपी उस न्यूनतम कीमत को कहते हैं जो किसानों को शक्कर के मिल मालिकों के द्वारा गन्ने की कीमत के रुप में अदा की जाती है। विडम्बना ही है कि इसके बाद भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि शक्कर के मिल मालिक बाजार पर नियंत्रण करने का काम छोड़ेंगे।

इस योजना को यदि अमलीजामा पहनाया जाता है तो गन्ने की कटाई के सीजन यानि अक्टूबर से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खुले बाजार से खरीदकर शक्कर को राशन दुकानों में बेचा जाएगा। वर्तमान समय में शक्कर मिलों को अपने उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा सस्ते दामों पर सरकार को बेचना पड़ता है और सरकार इसी 20 फीसदी हिस्से को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतगर्त बीपीएल को सस्ती कीमतों पर मुहैया करवाती है।

चल रही व्यवस्था के तहत सरकार हर महीने मिलों के लिए खुली बिक्री और लेवी शक्कर के लिए कोटे की घोषणा करती है। इसी व्यवस्था के कारण ही सरकार शक्कर की कीमतों पर नियंत्रण रखती आई है। शक्कर के उत्पादन में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव के कारण पिछले साल शक्कर का आयात करना पड़ा था।

अर्थशास्त्र के सिंध्दात के अनुसार मांग और आपूर्ति में होने वाले उतार-चढ़ाव ही बाजार की दिशा तय करते हैं। यदि मांग ज्यादा और आपूर्ति कम हो तो वस्तु की कीमत अधिक होगी और जब आपूर्ति अधिक तथा मांग कम हो तो वस्तु की कीमत कम होगी।

अर्थशास्त्र के इस सिद्धांत को व्यापारी अपने फायदे के लिए कालाबाजारी के द्वारा तोड़ते तो नहीं हैं, लेकिन उसका अंग-भंग जरुर कर देते हैं। वे बाजार की दशा और दिशा दोनों को अपनी सुविधानुसार बदलते रहते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि श्री पवार सिर्फ सिक्के के एक पहलू को देख रहे हैं। वे किसानों के बारे में तो सोच रहे हैं, किन्तु डायन महंगाई के बारे में नहीं सोच पा रहे हैं। वे ये भी नहीं सोच पा रहे हैं कि भारत में लॉबी चाहे तो हर चीज को अपने तरीके से नियंत्रित करके अपना खेल, खेल सकती है। हर्षद मेहता ने किस तरह से शेयर बाजार को अपनी डुगडुगी पर नचाकर करोड़ों रुपयों का वारा-न्यारा किया था, इससे हम अच्छी तरह से वाकिफ हैं।

शक्कर की कीमत हाल के महीनों में लगभग दो गुनी हो गई है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के शुरुआत में खुदरा बाजार में शक्कर की कीमत 50 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुँच चुकी थी। आज जब शक्कर का क्षेत्र विनियंत्रित नहीं है तब शक्कर की कीमत आसमान को छू रही है। यदि इसको विनियंत्रित कर दिया जाएगा तो शक्कर के बाजार का क्या हाल होगा? लिहाजा इस बेलगाम मँहगाई को कम करने के बजाए शक्कर के क्षेत्र को विनियंत्रित करना किसी भी मापदंड पर खरा नहीं उतरेगा। हाँ, शरद पवार किस मिट्टी के बने हुए हैं, इसकी जरुर जाँच होनी चाहिए। आखिर उनका जनता से इतना अलगाव क्यों है, इस बात का पता तो चलना ही चाहिए?

One Response to “शक्कर के विनियंत्रण से मँहगाई के तेवर और भी तीखे होंगे”

  1. Anil Sehgal

    शक्कर के विनियंत्रण से महंगाई के तेवर और भी तीखे होंगे – बी – सतीश सिंह

    (१) वास्तव में बताएं कि जो नियंत्रण चल रहा है, क्या सरकार उससे चीनी की महंगाई पर काबू कर पायी है ?

    (२) किन चीनी के कारखानों – निजी या सहकारी – ने चीनी दबा कर नहीं रखी जबकि कण्ट्रोल चल रहें हैं ?

    (३) क्या किसान को कैसी भी चीनी मिल (निजी या सहकारी) गन्ने का ठीक मोल, बिना दुखी किये, प्रदान करती है ?

    (४) जब नियंत्रण का अपेक्षित प्रभाव है ही नहीं तो इसे क्यों गले में फंसा रखा है ? करप्शन का बोल बाला दशकों से चल रहा है.

    (५) इज्मा हो या फेडरेशन हो सभी व्यापारीयों के साथ मिल कर सरकार और उपभोक्ता को चूना लगातें हैं.

    (६) जनाब, लेवी और फ्री चीनी का फन्दा भी त्याग दें.

    सब बाज़ार पर छोड़ दें.

    सब्सिडी सरकार अपने खजाने से प्रदान करे. यह अधिक सुविधाजनक और कम खर्चीला होगी.

    (७) चीनी में केवल सम्पूर्ण फ्री एकोंमी ही चलेगी – हज़ारों रोना रो लो.

    MARCH WITH THE TIME.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *