‘काबिलियत’ बनाम ‘कोरोना’ की डिग्री

  • श्याम सुंदर भाटिया

कोविड के चलते आधा दर्जन गैर भाजपा सूबों की सरकारों और देशभर के अलग-अलग संस्थानों के अंतिम वर्ष के 31 छात्रों का उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी संवैधानिक बॉडी- यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जबर्दस्त टकराव जारी है। दरअसल फाइनल ईयर एग्जाम के विरोधी चाहते हैं, कोरोना महामारी के कारण अंतिम वर्ष की परीक्षा न कराकर प्रमोट पॉलिसी अपनाई जाए। इन सभी छात्रों को पिछले सेमेस्टर या परीक्षाफल के आधार पर डिग्री दे दी जाए, लेकिन शिक्षा और यूजीसी इससे कतई सहमत नहीं हैं। शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक कहते हैं, ‘कोरोना डिग्री’ नहीं देंगे। वैश्विक बाजार में इससे न केवल देश की शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठेंगे बल्कि छात्रों को भी शोध से लेकर जॉब तक में तमाम दुश्वारियां आएंगी। यूजीसी चाहती है, अंतिम वर्ष के स्टुडेंट्स के पास काबिलियत की डिग्री होनी चाहिए। यूजीसी की नई गाइडलाइन्स के मुताबिक ऑनलाइन/ऑफलाइन या ऑफ और ऑनलाइन ये परीक्षाएं सितम्बर अंत तक हो जानी चाहिए, लेकिन यूजीसी का यह फरमान न तो देश की गैर भाजपाई सरकारों-दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा आदि को रास आ रहा है और न ही चुनिंदा छात्रों के गले उतर रहा है। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाओं के जरिए इंसाफ के लिए दस्तक दी है। इस बड़ी अदालत में यूजीसी ने भी हल्फनामा दायर कर दिया है-लिखित परीक्षा यानी काबिलियत की डिग्री क्यों जरुरी है। उच्चतम न्यायालय करीब के माह से इस पर सुनवाई कर रहा है। प्रस्तावित एग्जाम की मुखालफत में पैरवी कर रहे चुनिंदा वकीलों में नामचीन अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी भी हैं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने अंतिम फैसला सुरक्षित कर लिया है। सभी पक्षों को अपनी दलीलें लिखित में पेश करने का आदेश दिया है। उम्मीद की जा रही है, बड़ी अदालत जल्द ही अपना फैसला सुना देगी- अंतिम वर्ष के यूजी और पीजी के ये लाखों स्टुडेंट्स परीक्षा देंगे या उन्हें इंटरनल असेसमेंट और पूर्व सेमेस्टर के प्रदर्शन पर प्रमोट करके डिग्री दे दी जाए। 

शिक्षण के बिना परीक्षा कैसे

वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की बेंच के सामने कहा, अनुच्छेद 14 को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। परीक्षा अपने आप में एक अंत नहीं है। परीक्षा शिक्षण के बाद होनी चाहिए। उन्होंने कहा, यह मुद्दा- छात्रों के जीवन और सेहत से जुड़ा है। डॉ. सिंघवी याचिकाकर्ता यश दुबे की ओर से दायर याचिका पर बहस में हिस्सा ले रहे थे। यश दुबे ने यूजीसी के 30 सितम्बर तक फाइनल ईयर के एग्जाम कराने को चुनौती दी है। सीनियर वकील डॉ. सिंघवी ने पूछा, शिक्षण और परीक्षा लेने के बीच एक सीधा सम्बन्ध है, शिक्षण के बिना परीक्षा कैसे हो सकती है। गृह मंत्रालय ने भी अब तक शैक्षिणक संस्थानों को खोलने की अनुमति ही दी है, लेकिन परीक्षा आयोजित करने की मंजूरी दे दी है। यहां परीक्षा विशेष नहीं है। यहां महामारी विशेष है। महामारी हर किसी पर और हर चीज पर लागू होती है। परीक्षा के आयोजन को लेकर यूजीसी के पास कोई सुसंगत रुख नहीं है, क्योंकि यूजीसी पहले के परिपत्र में बढ़ते कोविड-19 को लेकर आशंका जता चुका है।

यूजीसी की गाइडलाइन्स संघवाद पर हमला

डॉ. सिंघवी ने कहा, यूजीसी का यह दिशा निर्देश संघवाद पर हमला है। राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेने की स्वायत्तता होनी चाहिए। कोई भी सामान्य समय में परीक्षा के खिलाफ नहीं है। हम महामारी के दौरान परीक्षा के खिलाफ हैं। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए सीनियर वकील श्री श्याम दीवान ने शीर्ष अदालत से कहा, फाइनल ईयर के स्टुडेंट्स की हेल्थ भी उतनी ही अहमियत रखती है, जितनी अन्य बैच के स्टुडेंट्स की रखती है। इन दिनों स्टुडेंट्स को ट्रांस्पोर्टेशन और कम्युनिकेशन से जुड़ी काफी दिक्कतें आ रही हैं। महाराष्ट्र के कई कॉलेज क्वारंटाइन के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ओडिशा  जनरल एडवोकेट अरविन्द दातार कहते हैं, अगर आईआईटी जैसे केंद्रीय संस्थान एग्जाम रद्द कर सकते है तो विवि एग्जाम रद्द क्यों नहीं कर सकते? दिल्ली, पश्चिम बंगाल, पंजाब और तमिलनाडु के तो मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इन गाइडलाइन्स को वापस लेने की मांग की है। इसके अलावा यूजीसी के पूर्व चेयरमैन प्रो.सुखदेव थोराट 27 और शिक्षाविदों के साथ पहले ही यूजीसी को पत्र लिखकर यह परीक्षाएं रद्द कराने की मांग कर चुके हैं। इन शिक्षाविदों ने पत्र में पूछा है, जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि परीक्षा रद्द होने से डिग्रियों का मूल्य कम हो जाएगा, उन्हें यह भी बताना चाहिए कैसे एक वर्चुअल एग्जाम से डिग्री की वैल्यू बढ़ जाएगी। 

छात्रों का छलका दर्द, संवेदनशील नहीं यूजीसी

छात्रों का कहना है, यूजीसी स्टुडेंट्स को जीवन और करियर में किसी एक को चुनने पर विवश कर रही है, जिसे लेकर वे बहुत तनाव में हैं। छात्रों के सामने इंटरनेट कनेक्ट‍िविटी से लेकर पाठ्यक्रम पूरा न होने जैसी कई समस्याएं सामने हैं। छात्रों की मुश्किलें हैं कि देशभर के कॉलेज होली की छुट्टियों के समय से ही बंद हैं। छात्रों की स्टडी मेटेरियल हॉस्टल के कमरों में बंद हैं। 20 से 30 प्रतिशत सिलेबस भी पूरा नहीं हुआ है।  ऐसे में परीक्षा कैसे दे सकते हैं? छात्रों का कहना है कि महामारी के दौर में हमें सरकार से मदद की उम्मीद थी, जबकि सरकार हमें मौत के मुंह में धकेल रही है। यदि हम ऑफलाइन परीक्षा देते हैं।  परीक्षा देने के लिए हॉस्टल में रुकते हैं, तो यहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं है। छात्र एक ही कमरा, बाथरूम और मेस शेयर करते हैं। मकान मालिक हमें किराये पर कमरा देने के लिए तैयार नहीं हैं।

राज्यों को परीक्षा रद्द करने का अधिकार नहीं

यूजीसी ने दिल्ली और महाराष्ट्र में राज्य के विश्वविद्यालयों में फाइनल ईयर की परीक्षाएं रद्द करने के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा, ये नियमों के खिलाफ है। राज्यों को परीक्षाएं रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से जानना चाहा कि क्या राज्य आपदा प्रबंधन कानून के तहत यूजीसी की अधिसूचना और दिशानिर्देश रद्द किये जा सकते हैं? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से कहा कि राज्य सरकारें आयोग के नियमों को नहीं बदल सकती हैं, क्योंकि यूजीसी ही डिग्री देने के नियम तय करने के लिए अधिकृत है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह छात्रों के हित में नहीं है कि वे परीक्षा आयोजित न करें। उन्होंने तर्क दिया कि यूजीसी एकमात्र निकाय है जो एक डिग्री प्रदान करने के लिए नियमों को बना सकता है और राज्य सरकारें नियमों को बदल नहीं सकती हैं। मेहता ने न्यायालय को बताया कि करीब 800 विश्वविद्यालयों में से 290 विवि में परीक्षाएं हो चुकी हैं। इनमें यूपी की तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी दीगर प्राइवेट विवि में इस मायने में अव्वल रही, मेडिकल और डेंटल कॉलेजों को छोड़कर न केवल वह फाइनल ईयर के एग्जाम करा चुकी है बल्कि 31 जुलाई तक सभी रिजल्ट भी घोषित कर चुकी है। श्री मेहता ने कहा, 390 विवि परीक्षा कराने की प्रक्रिया में हैं। यूजीसी के अनुसार, स्टुडेंट्स के एकेडमिक सत्र को बचाने के लिए फाइनल ईयर एग्जाम कराए जाने जरूरी हैं और चूंकि डिग्री यूजीसी की ओर से दी जाएगी, ऐसे में परीक्षाएं कराने या न कराने का अधिकार भी उसी का होना चाहिए।

फाइनल ईयर के एग्जाम नहीं कराए तो डिग्री अमान्य 

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील डॉ. सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि अप्रैल के महीने में जारी हुई गाइडलाइन्स को यूजीसी ने जुलाई के महीने में बदल दिया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि यूजीसी को ऐसा करने का अधिकार है और वे ऐसा कर सकते हैं। इस पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि जुलाई में जारी हुई गाइडलाइन्स अप्रैल वाली गाइडलाइन्स से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने कोर्ट में यह भी कहा कि देश में कई सारे ऐसे विश्विद्यालय हैं, जहां ऑनलाइन परीक्षाओं के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। डॉ. सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा कि यूजीसी की गाइडलाइन्स में परीक्षाएं ऑफलाइन देने का भी विकल्प है। इस पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि लेकिन बहुत से लोग स्थानीय हालात या बीमारी के चलते ऑफलाइन परीक्षा नहीं दे पाएंगे। उन्हें बाद में परीक्षा देने का विकल्प देने से और भ्रम फैलेगा। डॉ. सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा कि ये फैसला तो छात्रों के हित में ही दिखाई दे रहा है। सुनवाई में यूजीसी ने यह भी कहा है कि यदि यूनिवर्सिटी फाइनल ईयर एग्जाम आयोजित नहीं करती है तो डिग्री को मान्यता नहीं दी जाएगी।

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