दिल्ली विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा के सामने बड़ी चुनौती

दीपक कुमार त्यागी

कभी छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत करने वाले देश के मशहूर जेपी आंदोलन से सुर्खियों में आए जगत प्रकाश नड्डा आज भारतीय राजनीति का एक ऐसा लोकप्रिय चेहरा है, जिसने भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अमित शाह की टीम में महासचिव के रूप में कार्य किया था। जो वर्ष 2012 में राज्यसभा के लिए चुने गए और अमित शाह ने उन्हें अपनी टीम में संसदीय बोर्ड के सचिव जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से नवाजा था। बेहद सौम्य व्यक्तित्व के धनी नड्डा ने मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री की हैसियत से कार्य किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों के लिए बेहद महत्वाकांक्षी योजना ‘आयुष्मान भारत’ को सफलतापूर्वक धरातल पर लांच करने का कार्य किया था। देश के वोटर की नब्ज पकड़ कर चुनाव प्रबंधन करने की रणनीति में माहिर माने जाने वाले नड्डा के सामने राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वैसे तो बहुत सारी अनगिनत चुनौती हैं, क्योंकि हमारे देश की आजकल के दौर की राजनीति में नकारात्मकता बहुत अधिक होने के चलते राजनीति में कदम-कदम पर विरोधियों के चलते चुनौतियों का भरपूर भंडार हर समय मौजूद रहता है। आज के समय में हमारे देश की राजनीति में सफलता प्राप्त करने के लिए किसी भी नेता का राजनीतिक रूप से आराम-हराम है, उसको हर वक्त काम करते हुए चोबीस घंटे सातों दिन राजनीतिक उधेड़बुन में उलझें रहना पड़ता है। देश की राजनीति के मिजाज को समझने वाले नड्डा इस तरह के माहौल में बाखूबी काम करना जानते हैं।
देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में जेपी नड्डा के सामने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि, वो भाजपा के चाणक्य व देश के लोकप्रिय गृहमंत्री अमित शाह के कार्यकाल के समय में देश के आमजनमानस के बीच जो पार्टी का जलवा उनके द्वारा बनाया गया था, उसको बरकरार रखना नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। अमित शाह के द्वारा बनाये उस माहौल को देश की जनता के बीच वह किस तरह से बरकरार रख पायेंगे, यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। क्योंकि जिस तरह अपने कार्यकाल में राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अमित शाह ने पार्टी को आमजनमानस के बीच लोकप्रिय बनाकर, देश के विभिन्न राज्यों में पार्टी की सत्ता का विस्तार करके भाजपा के इतिहास में एक जबरदस्त शानदार नया कीर्तिमान बनाया था, वह काबिलेतारीफ है। आज जिसको बरकरार रखने की नड्डा के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। देश की उथलपुथल भरी मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर लगता है कि आने वाले समय में नड्डा के सामने भाजपा शासित राज्यों में पार्टी को सत्ता में बरकरार बनाए रखना बहुत बड़ी चुनौती होगी। उनके सामने विपक्षी दलों से राज्यों की सत्ता को हासिल करने की बड़ी चुनौती सामने खड़ी है। उसी क्रम में फिलहाल जेपी नड्डा के सामने देश की राजधानी दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की पहली बेहद कठिन अग्निपरीक्षा है, वैसे भी दिल्ली के विधानसभा चुनावों के चलते दिल्ली में आजकल राजनीति अपने चरम पर पहुंच गयी है, सारी दुनिया की नजरें दिल्ली चुनावों पर लगी हुई है। इन चुनावों में कुछ नेताओं के द्वारा समाज में जितना अधिक जहर बोया जा सकता है, उन्होंने जहर बो कर अपना वो काम करके समाज में बहुत बड़ी दरार पैदा कर दी है, बयानवीर नेताओं के चलते दिल्ली में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहद नाजुक होकर  चिंताजनक हो गयी है, हालात यह हो गये है कि आयेदिन गोली चलाने की घटनाएं घटित हो रही है। वैसे भी शाहीन बाग धरने का मामला दिल्ली की जनता के सभी जनहित के मुद्दों पर जबरदस्त ढंग से हावी हो गया है, भाजपा का नेतृत्व शाहीन बाग का दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जोरशोर से इस्तेमाल करने में लगा हुआ है। कही ना कही उसे उम्मीद है कि शाहीन बाग का संयोग उसे सत्ता दिलाने का नया प्रयोग बन सकता है। दिल्ली विधानसभा चुनावों के बीच में ही मोदी सरकार का सम्पूर्ण बजट 2020-2021 भी आ गया, शाहीन बाग व बजट का भाजपा को चुनावों में क्या नफा-नुकसान होगा यह तो आने वाली 8 फरवरी को दिल्ली का वोटर ही तय करेगा। इन सभी हालातों में नड्डा के सामने दिल्ली का विधानसभा चुनाव जीतना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। इसलिए ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर आम-आदमी पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए अपने संगठन के दिग्गजों, सरकार के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों व सांसदों की पूरी फोज को आधुनिक अस्त्र शस्त्र से लैस करके चुनावी जंग के मैदान में उतार दिया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली चुनाव प्रचार में शाहीन बाग का इस्तेमाल करते हुए कहते है कि- शाहीन बाग प्रदर्शन संयोग नहीं प्रयोग है। वहीं गृहमंत्री अमित शाह अपनी शैली के अनुसार जबरदस्त मेहनत करते हुए घर-घर जाकर वोटरों से सीधा संपर्क साधकर वोटरों को भाजपा के पक्ष में लुभाकर, अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा की राह को आसान बनाने में लगे हुए हैं। 
नड्डा के लिए चिंता की बात यह है कि जिस तरह से राज्यों में हाल के चुनावों में वोटरों ने सर्जिकल स्ट्राइक के जोश के बाद भी, ट्रिपल तलाक, आर्टिकल 370 हटाने व राम मंदिर निर्माण के निर्णय के बाद भी भाजपा को वोटिंग के रूप में उचित समर्थन नहीं किया था, वह भाजपा नेतृत्व के लिए बेहद आश्चर्यजनक स्थिति है। अब सीएए व एनआरसी जैसे ज्वलंत मुद्दों के बाद भी, कही ना कही वोटरों के दिमाग पर रोजीरोटी मंहगाई की चिंता बहुत तेजी से हावी होती नज़र आ रही है। जो पार्टी के लिए चिंता की बात हो सकती है, जिसका समय रहते कारगर उपचार ढूंढना अध्यक्ष के रूप में नड्डा के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। आपको बता दे अभी कुछ दिन पहले ही जगत प्रकाश नड्डा 20 जनवरी 2020 को निर्विरोध भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे। पूर्व में वो 19 जून 2019 में भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए गए थे। नड्डा आज की भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले गृहमंत्री अमित शाह की जगह पार्टी के अध्यक्ष बने हैं। चंद दिनों पहले तक भाजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रहे जगत प्रकाश नड्डा को पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल बने ‘भारतीय जनता पार्टी’ के 11वें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में 20 जनवरी 2020 को निर्विरोध निर्वाचित हुए  थे और इनका कार्यकाल जनवरी 2023 तक रहेगा। 
वैसे तो राजनीति लगातार चलने वाली वह अनवरत प्रक्रिया है जो कभी किसी का भी इंतजार नहीं करती है और वह कदम-कदम पर परीक्षा लेती रहती है, दिल्ली के विधानसभा चुनावों के बाद वर्ष 2020 के आगामी विधानसभा चुनावों में जेपी नड्डा की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में असली परीक्षा होगी। हालांकि, पूर्व में नड्डा के राज्यों के प्रभारी के रूप में कुशल चुनाव प्रबंधन के बलबूते भाजपा ने शानदार प्रदर्शन कर रखा है। दरअसल जेपी नड्डा को ऐसे समय में भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर उसका नेतृत्व करने का अवसर मिला है, जब पार्टी को वर्ष 2019 में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में तो मोदी-शाह की जोड़ी के नाम पर भारी बहुमत मिला था, मगर राज्यों के चुनावों में जनता- जनार्दन की प्रदेशस्तरीय नेतृत्व से कही ना कही नाराजगी के चलते उसे लगातार काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसको रोकने की बहुत बड़ी चुनौती राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके सामने खड़ी है। दिल्ली चुनावों के बाद बिहार और बंगाल में उनके राजनीतिक प्रबंधन की परीक्षा होगी। भाजपा का प्रदेशों में विस्तार करने के लिए प्रदेशस्तरीय नेताओं के आक्रामक रुख के चलते, राज्यों में गठबंधन धर्म को निभाने के लिए सहयोगी दलों के साथ भाजपा के रिश्तों को सहज बनाये रखना भी उनके लिए एक प्रमुख चुनौती साबित होने वाली है। क्या जेपी नड्डा सहयोगी दलों के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने के लिए विवादित मसलों पर नरम रुख अपना कर सभी सहयोगी दलों को एकजुट रख पाएंगे?
जिस तरह से देश में इन दिनों सीएए और एनआरसी को भाजपा के खिलाफ हथियार बनाकर सभी विपक्षी दलों के द्वारा दिनप्रतिदिन तूल दिया जा रहा है, उसका कारगर तोड़ निकालकर जनता को अपने पक्ष में करना उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है। क्योंकि भाजपा स्वयं जनता के बीच इन मुद्दों को लेकर काफी आक्रामक है।
नड्डा को ऐसी पार्टी की कमान मिली है जिसको राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गृहमंत्री अमित शाह ने रातदिन मेहनत करके मोदी के करिश्माई नेतृत्व के दम पर दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाया था। आज भी भाजपा अमित शाह की उसी मेहनत के बलबूते ही केंद्र के साथ-साथ 16 राज्यों में गठबंधन के साथ सत्ता संभाले हुए है। हालांकि पूर्व में यह संख्या 21 राज्यों तक पहुंच गयी थी जो पिछले कुछ समय से लगातार कम हो रही है, जिसका जल्द तोड़ नड्डा को ढूंढना होगा। गृहमंत्री अमित शाह के द्वारा जेपी नड्डा को जो विरासत दी गयी है उसके जलवे को बरकरार रखना उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है। इस लकीर को बरकरार रखने के लिए, एकतरफ तो नड्डा को भाजपा को देश के हर हिस्से में और हर बूथ पर पार्टी के संगठन को मजबूत करना होगा और फिर सशक्त पार्टी संगठन के जरिए अभी तक भाजपा की पहुंच से दूर रहे राज्यों में सत्ता हासिल करने का लक्ष्य बनाकर उसे वहां मुख्य चुनावी लड़ाई में लाना होगा । वहीं दूसरी तरफ आने वाले समय में जेपी नड्डा के सामने भाजपा शासित राज्यों की सत्ता को बरकरार रखने की बहुत बड़ी चुनौती सामने होगी।

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