लेखक परिचय

अमित शर्मा (CA)

अमित शर्मा (CA)

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी। वर्तमान में एक जर्मन एमएनसी में कार्यरत। व्यंग लिखने का शौक.....

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अमित शर्मा

देश का दिल दिल्ली, कोहरे और धुंए के लिव इन रिलेशनशिप से प्रकटे “स्मॉग” रूपी हलाहल विष से संसद की कार्यवाही की तरह ठप्प पड़ा है। पर्यावरण विशेषज्ञो की माने तो दिल्ली में वायु की शुद्धता का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि वो आसानी से कोई भी राजनैतिक दल ज्वाइन कर सकता है। वायु प्रदूषण के लिए दिल्ली कभी दूर नहीं होती है।

दिल्ली में सांस लेना अब आईफोन लेने जितना मुश्किल और मँहगा हो गया है। दिल्ली की हवा और यहाँ की राजनीती में ज़हर के स्तर को लेकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चल रही है जो कि वृहद सामाजिक हितो के लिए पर्यावरण और राजनीती को एक मंच पर लाने की कवायद की और इंडिकेटर देकर इशारा करती है। पर्यावरण और राजनीती दोनों समान रूप से प्रदूषित हो जाए तो दोनों आसानी से एक दूसरे के पूरक बन सकेंगे और  दिल्ली वालो को भी दोनों से तालमेल बिठाने में आसानी रहेगी।

दिल्ली सरकार के पास जनता की सेवा करने के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं है लेकिन फिर भी वो ज़बरदस्ती जनता की सेवा करना चाहती है। सेवा करने का यही ज़ज़्बा और ज़बरदस्ती देखते हुए लगता है की दिल्ली पुलिस , दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है वरना वो स्मॉग को तुरंत बरामद कर, गिरफ्तार करके, अपने विधायको के साथ तिहाड़ जेल में डाल देती।

केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच दिल्ली ठीक उसी तरह पीस रही है जैसे चटनी अवतार धारण करने के लिए अपने अस्तित्व की बलि देता हुआ धनिया पीसता है। दिल्ली के मालिक की कार और अधिकार दोनों चोरी हो चुके है और जिनके अधिकार जेब और दिलो-दिमाग से लीक होकर सड़क पर बह रहे है वो चौकीदार बनकर केवल मन की बात कर रहे है। दिल्ली सरकार के ज़िम्मे कौन कौन से काम आते है इसका अंदाज़ा उगलना दुरूह है क्योंकि इवन डे पर हमें पता चलता कि फलाना काम दिल्ली सरकार के करने लायक नहीं है और ऑड़ डे पर  हम बिना माँगे किसी नई मूवी का रिव्यू पाकर कृतार्थ होते है।

इस जन्म का तो पता नहीं लेकिन पूर्वजन्म में गलती से किए गए अच्छे कर्मो के कारण कभी भगवान को मैंने  दर्शन दिए तो मैं ज़रूर पूछूँगा, “हे दीनदयाल प्रभु, दिल्ली की आहत मानवता हेतु बताने का कष्ट करे कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत क्या क्या आता है।” योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में मानव मात्र के कल्याण हेतु सब कुछ बता दिया , लेकिन यह बताना भूल गए कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत क्या क्या आता है। मुझे लगता है की अगर जल्द ही इस बात का निपटारा नहीं किया गया कि दिल्ली सरकार को क्या क्या निपटाना है तो शायद भगवान को एक अवतार केवल यह बताने के लिए ही लेना पड़ जाए।

देश की राजधानी में समस्याओ का ढेर, कचरे के ढेर से आगे निकलने के लिए 100 मीटर की रेस लगाता हुआ नज़र आता है। दिल्लीवासियो को केंद्र सरकार, राज्य सरकार, एलजी, एमसीडी का सानिध्य बिना माँगे मिल जाता है, अगर माँग कर भी कुछ नहीं मिलता है तो वो है समस्याओ का समाधान। जनता की सुविधा के लिए दिल्ली में सत्ता के इतने केंद्र स्थापित किए गए है फिर भी जनता अपनी समस्याओ को संतुष्ट नहीं करवा पा रही है यह चिंता और क्षोभजनक है क्योंकि असंतुष्टी का बढ़ना ही समस्याओ का मूलकारक है। जनता को भी अब अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए, अपनी समस्याओ के कद और अपने संतुष्टी के स्तर को दिल्ली सरकार की हदो में लाना होगा।

सविंधान ने भले ही दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा नहीं दिया हो लेकिन दिल्ली ने इसका बुरा नहीं माना और अपनी लगन और दृढ निश्चय से अपनी हालत पूर्ण राज्य जैसी कर ली है। ज़ब भी गणतंत्र का पर्व (चुनाव) आता है तो गर्व की अनुभूति होती क्योंकि तभी हमें पता चलता है की देश की राजधानी में भी पानी-बिजली-सड़क की वही समस्याए है जो मूलभूत सुविधाओ को तरस रहे किसी गाँव की है। शहर और गाँव के मुद्दों की यह अद्भुत समानता ही हमारी आज़ादी के 70 सालो का हासिल है।  हमारे सविंधान ने जो समानता का अधिकार दिया है उसे सत्ताओ के शीर्ष पर बैठे लोगो ने जिस  कुशलता और ईमानदारी से लागू  किया है उसे देखकर आँखे,स्मॉग छटने पर भी भर आती है।

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