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-बंशीधर मिश्र

एक तरफ वैभव का विराट सम्मेलन हो, उसमें गोते लगाते तमाम देशी-विदेशी मेहमान हों और दूसरी तरफ, भूख से बिलबिलाते बच्चे हों, बाढ़ में सब कुछ गंवा चुके यतीम यायावर हों, तो आप किसके साथ खड़े होंगे? यदि एक तरफ अरबों के खर्च पर बने ‘खेलों के गांव’ हों और दूसरी तरफ उजड़ गए गांवों के मलबे में सड़ी लाशों को नोंचते कौवे और गिद्ध हों तो आप किसे सच और किसे तिलस्म कहेंगे? यदि यह सब एक ही राष्ट्र-राज्य के भू-क्षेत्र में एक ही सरकार के शासन काल में घटने वाले नंगे सच हों, तो इसके लिए आप किसे जिम्मेदार ठहराएंगे?

दो अक्टूबर को जब देश में अहिंसा, सत्य और सादगी के देवदूत महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाई जा रही थी, तो दिल्ली में वैभव के विराट प्रदर्शन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा था। उसी समय करीब सौ किलोमीटर दूर गढ़मुक्तेश्वर के पास एक महिला ने जंगल में जहर खाकर जान दे दी थी। वैसे जान देना इस व्यवस्था में बहुत सामान्य घटना हो गई है। इसलिए कुछ अपनों को छोड़कर अब इस पर लोगों का ध्यान भी नहीं जाता। इस घटना के साथ भी ऐसा ही हुआ। पर दरअसल, यह मौत मामूली नहीं। इस मायने में कि इसके पीछे भूख, प्राकृतिक आपदा से उजड़ने वाले शरणार्थियों के प्रति शासन-प्रशासन की भूमिका, समाज और मीडिया का नजरिया पता चलता है। गंगानगर की रहने वाली इस महिला का घर-संसार बाढ़ ने लील लिया था। वह बच्चों व पति के साथ भोगल की धर्मशाला में शरणार्थी के रूप में दिन काट रही थी। एक रात अधिकारियों ने उन्हें धर्मशाला से भगा दिया। वह भूख से बिलबिलाते बच्चों की पीड़ा नहीं देख सकी और उसने जहर खाकर जान दे दी। जिस वक्त यह सब हो रहा था उसी समय दिल्ली के गेम्स विलेज में ऐतिहासिक जश्न के प्रदर्शन का रिहर्सल किया जा रहा था। करीब 70 हजार करोड़ रुपये खर्च कर कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया गया है। तीन अक्टूबर के उद्घाटन शो ने भारत के वैभव की शान पूरी दुनिया में स्थापित कर दी है। अच्छा है। यह देश के लिए गौरव और सम्मान की बात है। हम बहुत उदार हैं। इस सात सौ अरब के खर्च में कितने अफसर, मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार मालामाल हो गए, शायद ही कोई इस पर शोध करने की जहमत उठाए। हम इसी में संतुष्ट हो लेते हैं कि अंत भला सो सब भला। मीडिया भी अब शायद ही किसी गहरी पड़ताल में जाए। पर इस बीच देश के तमाम हिस्सों में आई बाढ़, उससे उजड़े हजारों घरों के लाखों लोगों के आंसू पोंछने, उन्हें फिर से बसाने और उनके चेहरों पर खुशियों के दो पल लौटाने की चिंता क्या सरकार और उसके विशाल प्रशासनिक संजाल को है? नहीं। क्यों? यदि होती, तो भूखे बच्चों की पीड़ा और सब कुछ नष्ट हो जाने के दर्द झेलती महिला को मदद सांत्वना के दो बोल की जगह धर्मशाला से खदेड़ा न जाता। भूख से बिलखते विदर्भ, बुंदेलखंड, कालाहांडी के हजारों-लाखों परिवारों की अंतहीन पीड़ाएं किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय नहीं रह गई हैं। करोड़ों-अरबों की संपत्ति के मालिक अफसरों, मंत्रियों को सौ रुपये किलो की दाल महंगी नहीं लगती।

यह सवाल मामूली नहीं है कि जिस देश के गोदामों में लाखों टन अनाज बिना रखरखाव के सड़ जाए और वहीं लोग भूख से तड़पकर जान दे दें, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? कहीं सूखा, तो कहीं बाढ़ ने हजारों गांवों को उजाड़ दिया है। गांव के गांव खाली हो गए हैं। लाचार वृद्ध, बच्चे और अशक्त महिलाएं ही गांवों में बची हैं। काम की तलाश में लाखों-करोड़ों की आबादी दर-ब-दर हो गई है। पिछले एक दशक में देश में डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली। यह सरकारी आंकड़ा है, जो पूरे सच का एक छोटा सा टुकड़ा है। देश के कई हिस्सों का सामाजिक भूगोल बदल गया है। सामाजिक ताने-बाने का ऐसा विखंडन बंगाल के अकाल के समय देखने को मिलता है। पर यह सब कुछेक मौकों पर बहस-मुबाहिसे को छोड़कर कभी निर्णायक मुद्दा नहीं बन पाया। ऐसा क्यों होता है, चुनाव के समय भी देश की जनता अपने भाग्यविधाताओं से सवाल नहीं करती या कर पाने की हिम्मत नहीं रखती। कभी-कभार मीडिया में हल्ला मचा, तो सदनों में विरोधी पक्ष के प्रतिनिधि सवाल उठा देते हैं। संबंधित विभाग के मंत्रियों की तरफ से सरकारी जवाब तैयार करके पटल पर पेश कर दिया जाता है। अंदर ही अंदर पुलिस प्रशासन को इशारा कर दिया जाता है कि भूख से मौतों का जिक्र जीडी में दर्ज न किया जाए। कम से कम उत्तर प्रदेश में तो पिछले 12 सालों से यही हो रहा है। मीडिया के पास सिवाय सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करने के कोई रास्ता नहीं बचता कि वह सच तक पहुंच सके। गढ़ मुक्तेश्वर की घटना को भी पुलिस अफसर यही साबित करने में लगे हैं कि वह भूख और यंत्रणा से नहीं मरी, उसे सांप ने काट लिया था। ऐसा इसलिए कि सरकार के माथे पर बाढ़ पीड़ित के दुखद अंत का कलंक न लग सके।

राष्ट्रीय स्वाभिमान की विश्व में स्थापना हो, यह ठीक बात है। इसमें किसी भी राष्ट्रप्रेमी नागरिक को भला आपत्ति क्यों होगी? पर जब देश के कई कोनों में भूख और लाचारी से मौतों का करुण क्रंदन हो रहा हो, तब राजधानी में सात सौ अरब खर्च कर जश्न मनाना क्या किसी भयंकर अपराध से कम नहीं? अपने देश के लाखों भूखे बच्चों के आंसू पोंछने के बजाय 70 करोड़ के गुब्बारे को आसमान में लटकाकर विदेशी मेहमानों का मनोरंजन करना क्या मनुष्यता का मजाक उड़ाना नहीं है? भूख का उपोत्पाद है अपराध। यह सिद्धांत पूरा नहीं, तो आंशिक सच जरूर है। इसी सच का नतीजा है देश के कई राज्यों में पनप रहा नक्सलवाद। जिस देश के करोड़ों वासी रात-दिन भूख से उबरने का उपक्रम कर रहे हों, वह देश दुनिया के सभ्य समाज में अपना सिर ऊंचा नहीं कर सकता। थोथा वैभव देश को असली ताकत नहीं देगा। उसे पहले भूख के अभिशाप से मुक्त होना होगा।

(बंशीधर जी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं, उनसे फोन नम्बर 09455763424 पर सम्पर्क किया जा सकता है)

3 Responses to “दिल्ली के तिलस्म को ललकारता भयावह सच”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    बंशीधर जी आलेख के लिए शुक्रिया …..अभी विगत २-३ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की किसी खोजी आकलन टीम ने विश्व के सबसे भुखमरे ८७ देशों की सूची जारी की है .उन गरीब देशों में भी हम -याने भारत सबसे अधिकतम भुखमरे अंतिम १० देशों में शुमार हो चुके हैं ….उधर आदरणीय मनमोहनसिंह जी की सुधार {बर्बाद }नीति के निर्माता और अमेरिका की मशीनरी झूंठी तारीफ कर कर ..इस दिवालिया सरकार को आर्थिक नियोजन की उत्तमता का सर्टिफिकेट दिए जा रही है …
    यह शर्म की बात है की पाकिस्तान और चीन की प्रति व्यक्ति आय हमसे बहुत ज्यादा है …अब इस महान लोकतंत्र की आरती उतारें या चीन -पकिस्तान की रह चलें ?

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  2. sunil patel

    धन्यवाद मिश्र साहब. भयावह सच है. इस देश का दुर्भाग्य है की इस देश के नियम कानून बनाने वाले बहतु ही उच्च स्तरीय (आर्थिक और सरकारी ओहदों) होते है. जिन्हें यह नहीं पता होता है की तेल और गुड बोतल या पन्नी में आता है. २१-२२ साल का बालक बालिका आई. ए.एस. बन जाते है जिन्हें जीवन का कुछ अनुभव ही नहीं होता है. नियम तो विदेशी आकाओं के इशारे पर बन रहे है.

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  3. Rajeev Dubey

    २००८ की सेनगुप्ता की प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में रु २० प्रति दिन या इससे नीचे के खर्च की क्षमता वाले करीब ८४ करोड़ हैं …यदि विश्व बैंक की २००५ की बात मानें तो रु २२ से नीचे क्षमता वाले करीब ५० करोड़ हैं … इसके बीच का आंकड़ा करीब ६७ करोड़ का है . चलिए ५० करोड़ पर हिसाब लगाते हैं .

    हर ८ घंटे काम करने वाले मेहनतकश की आय कम से कम रु ६००० प्रति महीना होनी चाहिए . २४ काम के दिवसों के महीने के हिसाब से २२ रु प्रति दिन पर मेहनतकश की आय मात्र ५२८ रु होती है . प्रति महीना कमी : रु ५४७२.

    ५० करोड़ लोगों की कुल वार्षिक आय में कमी हुई : ५४७२ X ५०,००,००,००० X १२ = रु ३२,८३,२०० करोड़ .

    हमारी काला धन पर आधारित अर्थव्यवस्था करीब रु २५,००,००० करोड़ की है . ध्यान से देखने पर पता चलेगा की हमारे मेहनतकशों को कम पैसा देकर उनके हक़ के पैसे से एक छोटी आबादी काला धन जमा कर रही है . इसमें फिजूलखर्ची और जोड़ दीजिये तो हमारे गरीबों की गरीबी गायब होते देर नहीं लगने की कुंजी दिखने लगेगी .

    लेकिन सत्ता का लोभ और स्वयं के अवैध भोग की लालसा हमारी सरकारों को यह करने नहीं देती …क्या नई पीढी आंदोलित महसूस कर रही है … क्या आँखों में राष्ट्र की पीड़ा के आंसू नहीं बह निकलते … अब नहीं जागे तो कभी नहीं मित्रों … परिवर्तन जरूरी है.

    http://economictimes.indiatimes.com/news/economy/finance/India-loses-Rs-10-lakh-crore-from-black-economy-every-year/articleshow/5710210.cms

    http://www.unicef.org/infobycountry/india_statistics.html

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