“देश अपना-प्रदेश पराया”

देश के ‘विभाजन की त्रासदी’ सात दशक बाद भी जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में बसे लाखों हिन्दू शरणार्थियों को अभी भी झेलनी पड़ रही है। यह तो सर्वविदित ही है कि  भारत – पाक विभाजन के समय सन 1947 में  सांप्रदायिक दंगो के चलते  पाकिस्तान में अपना सब कुछ गंवा कर आये हिन्दू-सिख भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बसे थे। बहुत बड़ी संख्या में ये शरणार्थी आज भारत में सामाजिक व सरकारी सहयोग से संपूर्ण नागरिक अधिकारों के साथ सम्मान से रह रहे हैं। यहाँ तक कि अनेक उच्च पदों को सुशोभित करने के  अतिरिक्त इन लोगों में से ही श्री इंद्रकुमार गुजराल व डॉ मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री व श्री लालकृष्ण आडवाणी उपप्रधानमंत्री भी बने।परंतु खेद यह है कि जो लोग अपनी जान बचाने के लिए जम्मू -कश्मीर के क्षेत्रों में चले गये थे वे आज तक दासों का जीवन जीने को विवश हैं।
पिछले समाचारों के अनुसार विभाजन के समय लगभग 2 लाख शरणार्थी जम्मू व घाटी में आकर बसे थे जो अब अखनूर, जम्मू, आरएस पुरा, बिश्नाह, सांबा, हीरानगर तथा कठुआ आदि के सीमान्त क्षेत्रों में रह रहें हैं। इनकी चार पीढियाँ हो चुकी हैं और संख्या भी अब कई लाखों में होगी फिर भी ये अभी शरणार्थी जीवन का दंश झेल रहे हैं। इनमें अधिकांश दलित, अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग के हिन्दू-सिख हैं। इनको भारत की नागरिकता मिल चुकी है परंतु अभी तक जम्मु-कश्मीर राज्य की नागरिकता नहीं मिली है। क्योंकि 1953 में राज्य सरकार ने निर्वाचन कानून में एक संशोधन किया था जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर की विधान सभा में वही मतदाता होगा जो वहाँ का स्थायी नागरिक होगा और स्थायी नागरिक वही होगा जो  1944  से पहले राजा हरिसिंह के राज्य की प्रजा होगी। अर्थात इस राज्य में जो 1944 के पहले से रह रहा है वही वहाँका स्थायी नागरिक कहलायेगा। इसके पीछे वहाँ के तत्कालीन “प्रधानमंत्री” ( उस समय वहाँ मुख्य मंत्री नहीं होता था) शेख अब्दुल्ला की हिन्दू विरोधी मानसिकता थी क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इन हिंदू शरणार्थियों को यहाँ बसाया जायें। जबकि 1948 में मध्य एशिया से आये मुस्लिम समुदाय को वहाँ बसाया गया और उन्हें नागरिकता भी दी गयी।अनेक अवसरों पर इन शरणार्थियों ने पंजाब आदि अन्य राज्यों में जाने की इच्छा की परंतु इनको नागरिक अधिकार दिलवाने का भरोसे दे कर रोक लिया जाता रहा। पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजी संघर्ष समिति के पदाधिकारी  निरंतर भारत सरकार से अपनी व्यथा के लिए चक्कर काटते रहें हैं फिर भी अभी तक कोई समाधान नहीं हो पा रहा है। लगभग 2 वर्ष पूर्व समिति के अध्यक्ष श्री लब्बा राम गांधी को प्रधानमंत्री मोदी जी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आदि ने भरोसा दिलाया था कि इनकी समस्या का शीघ्र हल निकाला जायेगा, पर अभी तक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है।उनका यह भी कहना था कि वे 1947 में यहाँ आकर बसे थे जबकि राज्य का संविधान दस वर्ष बाद 1957 से प्रभावी हुआ था।
ये लोग राज्य में भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा भी नहीं खरीद सकते, इनके बच्चों को उच्च तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश निषेध है । इनको राज्य सरकार में अधिकारी तो छोड़ो एक चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल सकती। इनका लोकसभा के चुनाव में तो मताधिकार है परंतु विधान सभा, नगरपालिका व ग्राम पंचायत आदि के चुनावों में कोई अधिकार नहीं। राज्य की अनेक सुविधायें जैसे  शिक्षा,  कृत्रिम अंग व कानूनी सहायता निशुल्क नहीं मिल सकती । विकलांग व बुजुर्ग लोगों को राज्य के नागरिकों को पेंशन की व्यवस्था है पर इन शरणार्थियों को इससे भी वंचित रखा जाता है।इनके पास  राशन कार्ड व गैस कनेक्शन भी नहीं है।जिन गाँवों में केवल हिन्दू शरणार्थी ही हैं तब भी वहाँ का नंबरदार किसी दूसरे गाँव का  स्थायी निवासी ही थोपा जाता है। इनको बाहरी मानकर अनुसूचित व दलित जाति के प्रमाण पत्र भी नहीं दिये जाने से केंद्र की अनेक योजनाओं का भी लाभ इनको नहीं मिल पाता। केंद्र सरकार के द्वारा इनके हित में समय-समय पर कुछ फैसले किये परंतु राज्य सरकारों के भेदभाव पूर्ण व्यवहार  ने उन्हें लागू ही नहीं होने दिया।यह कैसी दुःखद विडंबना है कि जम्मू-कश्मीर के नागरिक दोहरी नागरिकता के कारण देश व प्रदेश दोनों की सुविधाओं का लाभ उठा रहें है । जबकि इन लाखों लोगों का देश अपना होकर भी प्रदेश पराया बना हुआ है।
विश्व में संभवतः यह अकेला उदाहरण होगा जहाँ शरणार्थियों के  मानवाधिकारों का  पिछले लगभग 70 वर्षों से निरंतर हनन होने पर भी अंतरराष्ट्रीय संस्थायें उदासीन हैं। जबकि पिछले 5-6 वर्षों में म्याँमार से आने वाले रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों (घुसपैठियों) को राज्य में बसाने के लिये  स्थानीय प्रशासन व समाज सकारात्मक हो रहा है । इनके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ भी सक्रिय है । यहाँ यह बताना बहुत आवश्यक है कि पिछले 20-25 वर्षों से पीओके व पाकिस्तान गए हुए कश्मीरी आतंकवादियों को आत्मसर्पण करने पर उन्हें आर्थिक सहायता व सरकारी नौकरियाँ आदि देकर पुनः कश्मीर में बसाया जा रहा है। इन आतंकवादियों को मुख्य धारा में लाने के नाम पर करोड़ों रुपयों की योजनायें बनाई गयीं जो एक अलग चर्चा का विषय है।जबकि लियाक़त अली जैसे अनेक कश्मीरी आतंकवादियों ने पाकिस्तान जाकर वहाँ शादी करके अपनी पाकिस्तानी बीबी व उससे हुए  3-4 बच्चों के साथ वापस आकर कश्मीर में मुस्लिम संख्या बढ़ाना भी जारी रखा है।
यहाँ विस्थापित  लगभग 5 लाख  कश्मीरी हिन्दुओं की समस्या को भी जानना चाहिये जिनको 90 के दशक में कश्मीर छोड़ने को विवश किया गया था। अब उनको भी पुनः कश्मीर में बसाने की चर्चा अनेक भागों में हो चुकी है पर दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव होने से यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का मानवीय कार्य अभी भी समस्याओं में घिरा हुआ है।
पिछले 30-35 वर्षों से जम्मू -कश्मीर आतंकवाद व अलगाववादियों के अनेक षडयंत्रों से जूझने के अतिरिक्त उपरोक्त समस्याओं से भी ऐसा ही प्रतीत होता है कि कश्मीरियत पर इस्लामियत चारों ओर से आक्रामक हो चुकी है। अब इससे मुस्लिम धार्मिक कट्टरता ही प्रोत्साहित हो रही है जिससे  कश्मीर की मूल वैदिक संस्कृति को मिटा कर “निज़ामे मुस्तफा” की स्थापना का कुप्रयास जारी है। वैसे तो कश्मीर की कड़वी सच्चाई व समस्त समस्याओं की जड़ है “विवादित व विभाजनकारी अनुच्छेद 370”  जो स्वाधीन भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल  लार्ड माउंटबेटन , शेख अब्दुल्ला व गांधी-नेहरु की एक शातिराना चाल थी ।परंतु इस अनुच्छेद की संविधान विशेषज्ञों के अनुसार कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन नेहरु जी के आधिकारिक दोषपूर्ण आग्रह ने इसका प्रावधान करवाया, जबकि नेहरु जी यह भी कह गए थे कि घिसते घिसते यह अनुच्छेद स्वतः ही समाप्त हो जायेगा।इस अनुच्छेद पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों व राजनेताओं ने समय समय पर अपने अपने विचारों को देश के समक्ष रखा है।

विनोद कुमार सर्वोदय

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