“देशभक्त, त्यागी एवं बलिदानी अद्वितीय परमवीर वीर सावरकर”

-136 वीं जयन्ती पर वीर सावरकर जी को श्रद्धांजलि-

मनमोहन कुमार आर्य

               देश की आजादी में वीर सावरकर का अद्वितीय योगदान है। वह ऋषि दयानन्द के भक्त व क्रान्तिकारी के आद्य आचार्य पं0 श्यामजी कृष्ण वर्मा के शिष्य थे। लन्दन में रहकर उन्होंने कानून की पढ़ाई की और इसके साथ ही देश की आजादी के लिये क्रान्तिकारी गतिविधियों से भी जुड़े और महनीय कार्य किये। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें लन्दन में गिरिफतार किया गया और उन पर मुकदमा चला कर उन्हें दो जन्मों के कारावास की सजा दी गई। यह आश्चर्य है कि यह सजा अंग्रेजों ने दी थी। यह अंग्रेज ईसाई थे और इनका धर्म ग्रन्थ व धार्मिक मान्यतायें दो जन्मों व पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानते। वीर सावरकर जी ने लगभग 10 वर्ष कालापानी अर्थात् पोर्टब्लेयर की जेल में बिताये जहां इन पर अमानुषिक अत्याचार किये गये। हमारा सौभाग्य है कि हमें पोर्टब्लेयर स्थित कालापानी वा सेलुलर जेल में जाने का अवसर मिला और हमने उनका वह कमरा जिसमें वह रहते थे उसे भी देखा है। उन्हें न केवल कोल्हू में बैल की जगह स्वयं जुतकर तेल निकालना पड़ता था अपितु वहां का जेलर इन्हें कोड़ों से पिटाई आदि की यातनायें भी देता था। सेलुलर जेल में प्रतिदिन रात्रि समय आयोजित लाइट एण्ड साउण्ड शो को देखकर हृदय कांपने लगता है और आंखे गीली हो जाती हैं। वीर सावरकार जी ने कालापानी की जेल में रहते हुए अनेक यातनायें सहीं। उनका बलिदान स्वर्ण अक्षरों में लिखने योग्य है। आज उन्हें बदनाम करने के लिये कुछ राजनीतिक दलों को देखकर दुःख होता है। ऐसे लोग निहित राजनीतिक स्वार्थों व भारत विरोधी विदेशियों शक्तियों के इशारे पर हमारे देश के कुछ महापुरुषों को बदनाम करने के लिये ऐसा करते रहते हैं। ऐसे लोगों की निन्दा ही की जा सकती है। जो लोग कभी देश के लिये एक दिन भी आज की आरामदायक जेल में नहीं रहे, वह वीर सावरकर जी की आलोचना करें तो निश्चय ही वह निन्दा के पात्र हैं। हमने अपने गुरु प्रा0 श्री अनूपसिंह जी से कई बार सुना था कि इंग्लैण्ड में भारत के युवाओं को जो कानून की पढ़ाई करते थे, उन्हें परीक्षा में पास होने पर भी शेष जीवन में अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने की शपथ लेनी पड़ती थी। वीर सावरकर जी ने उत्तीर्ण होने पर भी शपथ नहीं ली जिस कारण इन्हें कानून की उपाधि नहीं मिली थी जबकि देश के अन्य कुछ प्रसिद्ध नेताओं ने शपथ ली थी और इन्हें डिग्री प्रदान की गई थी।

               वीर सावरकर जी ने जेल से छूटकर रत्नागिरी में नजरबन्द रहते हुए वहां भी समाज सुधार सहित दलितोद्धार के कार्य किये। वीर सावरकर जी की नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी से भी भेंट हुई थी और सावरकर जी ने ही उन्हें देश से बाहर जाकर देश को आजाद कराने की प्रेरणा दी थी। इस अवसर का एक चित्र बहुत पहले आर्यजगत के एक विशेषांक में इसके प्रसिद्ध सम्पादक पं0 क्षितीज वेदालंकार जी ने प्रकाशित किया था। वीर सावरकर जी का यह योगदान कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं था। वीर सावरकर जी ने हिन्दुओं को संगठित करने व उन्हें भावी खतरों से भी सावधान किया था। उन्होंने अनेक पुस्तके लिखी हैं जिनमें से हमने कुछ पढ़ी हैं। मोपला विद्रोह एवं गोमांतक उपन्यास ग्रन्थ पढ़ने लोग हैं। उनका एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास है जिसें पढ़कर आजादी के इस आन्दोलन का सत्य इतिहास जानने को मिलता है। हमें इस ग्रन्थ को पढ़कर आश्चर्य हुआ कि लन्दन में बैठकर वहां के ग्रन्थालयों से कैसे वीर सावरकर जी ने सरकारी रिपोर्टों के आधार पर सामग्री एकत्रित की और एक विशाल एवं प्रामाणिक इतिहास की रचना की। यह भी बता दें कि इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। इस पर भी देशभक्तों द्वारा इस पुस्तक को किसी प्रकार छुपाकर भारत भेजा गया और यहां अंग्रेजों के शासन काल में ही इसका प्रकाशन हुआ। हमारे देश के अनेक क्रान्तिकारियों ने इस इतिहास से प्रेरणा लेकर देश की आजादी के आन्दोलन में अपना सर्वस्व अर्पण किया था। प्रत्येक देशभक्त नागरिक को इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिये।

               वीर सावरकर जी हिन्दू महासभा के प्रधान व उपप्रधान भी रहे। वह हिन्दुओं को संगठित करना चाहते थे। मुगलकाल में हिन्दुओं को जिस धर्मच्युत करने और अपमानित अवस्था से गुजरना पड़ा उसका कारण हिन्दुओं का असंगठन एवं धार्मिक व सामाजिक अन्धविश्वास, कुरीतियां वा कुप्रथायें आदि थी। जन्मना जातिवाद भी असंगठन का मुख्य कारण था। इसके विरुद्ध सबसे पहले ऋषि दयानन्द जी ने आवाज उठाई थी और अपने आचरण से जातिगत भेदभाव को दूर करने का सन्देश दिया था। उसके बाद ऋषि दयानन्द के अनुयायियों ने दलितोद्धार को अपना मिशन बना लिया था जिसके अनेक उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। डॉ0 अम्बेडकर जी को ऋषि के एक अनुयायी ने ही छात्रवृत्ति देकर इंग्लैण्ड अध्ययन करने के लिये भेजा था। आर्यसमाज के एक विद्वान पं0 कुशलदेव शास्त्री जी ने डॉ0 अम्बेडकर और आर्यसमाज विषयक एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना भी की है जो कि पठनीय है। वीर सावरकर जी ऋषि दयानन्द जी के प्रशंसक थे। उन्होंने कहा है कि जब तक ऋषि दयानन्द जी का लिखा हुआ सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ धरती पर मौजूद है, कोई मत व उसका आचार्य अपने मत-मजहब की शेखी नहीं बघार सकता।

            वीर सावरकर जी और उनके परिवार ने देश की आजादी के लिये जो कष्ट सहन किये हैं, उसकी अन्यत्र कोई उपमा नहीं है। जो लोग सत्ता में रहे हैं वा जिन्होंने सत्ता का सुख भोगा है, वह वीर सावरकर जी के साथ न्याय नहीं कर सकते। उनके लिये तो अपने हलके फुलके नेता ही सबसे महान होते हैं। आज सावरकर जी की 136 वीं जयन्ती हैं। उनके जीवन की कुल अवधि 83 वर्षों की रही। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए भारत की प्रसिद्ध गायिका लता मुंगेश्वर जी ने कहा है नमस्कार! आज स्वातन्त्रय वीर सावरकर जी की जयन्ती है। मैं उनके व्यक्तित्व को, उनकी देशभक्ति को प्रणाम करती हूं। आजकल कुछ लोग सावरकरजी के विरोध में बातें करते हैं, पर वह लोग यह नहीं जानते कि सावरकर जी कितने बड़े देशभक्त और स्वाभिमानी थे।’ भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने वीर सावरकर जी को श्रद्धांजलि देते हए कहा है ”We bow to Veer Savarkar on his Jayanti. Veer Savarkar epitomises courage, patriotism and unflinching commitment to a strong India. He inspired many people to devote themselves towards nation building.”

               इसी के साथ हम वीर सावरकर जी को आज उनकी जयन्ती पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्रमण कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

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