लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

Posted On by &filed under लेख.


संजय द्विवेदी

आखिर देश कहां जा रहा है ?

या तो हमारी राजनीति बहुत ज्यादा समझदार हो गयी है या बहुत नासमझ हो गयी है। जिस दौर में अमरीकी पूंजीवाद औंधे मुंह गिरा हुआ है और वालमार्ट के खिलाफ दुनिया में आंदोलन की लहर है,यह हमारी सरकार ही हो सकती है ,जो रिटेल में एफडीआई के लिए मंजूरी देने के लिए इतनी आतुर नजर आए। राजनेताओं पर थप्पड़ और जूते बरस रहे हैं पर वे सब कुछ सहकर भी नासमझ बने हुए हैं। पैसे की प्रकट पिपासा क्या इतना अंधा और बहरा बना देती है कि जनता के बीच चल रही हलचलों का भी हमें भान न रह जाए। जनता के बीच पल रहे गुस्से और दुनिया में हो रहे आंदोलनों के कारणों को जानकर भी कैसे हमारी राजनीति उससे मुंह चुराते हुए अपनी मनमानी पर आमादा हैं, यह देखकर आश्चर्य होता है.

महात्मा गांधी का रास्ता सालों पहले छोड़कर पूंजीवाद के अंधानुकरण में लगी सरकारें थप्पड़ खाते ही गांधी की याद करने लगती हैं। क्या इन्हें अब भी गांधी का नाम लेने का हक है? हमारे एक दिग्गज मंत्री दुख से कहते हैं “पता नहीं आखिर देश कहां जा रहा है ?” आप देश को लूटकर खाते रहें और देश की जनता में किसी तरह की प्रतिक्रिया न हो, फिर एक लोकतंत्र में होने के मायने क्या हैं ? अहिंसक प्रतिरोधों से भी सरकारें ‘ओबामा के लोकतंत्र’ की तरह ही निबट रही हैं। बाबा रामदेव का आंदोलन जिस तरह कुचला गया, वह इसकी वीभत्स मिसाल है। लोकतंत्र में असहमतियों को अगर इस तरह दबाया जा रहा है तो इसकी प्रतिक्रिया के लिए भी लोगों को तैयार रहना चाहिए।

रिटेल में एफडीआई की मंजूरी देकर केंद्र ने यह साबित कर दिया है कि वह पूरी तरह एक मनुष्यविरोधी तंत्र को स्थापित करने पर आमादा है। देश के 30 लाख करोड़ रूपए के रिटेल कारोबार पर विदेशी कंपनियों की नजर है। कुल मिलाकर यह भारतीय खुदरा बाजार और छोटे व्यापारियों को उजाड़ने और बर्बाद करने की साजिश से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मंदी की शिकार अर्थव्यवस्थाएं अब भारत के बाजार में लूट के लिए निगाहें गड़ाए हुए हैं। अफसोस यह कि देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए रोजगार सृजन के लिए यह एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। नौकरियों के लिए सिकुड़ते दरवाजों के बीच सरकार अब निजी उद्यमिता से जी रहे समाज के मुंह से भी निवाला छीन लेना चाहती है। कारपोरेट पर मेहरबान सरकार अगर सामान्य जनों के हाथ से भी काम छीनने पर आमादा है, तो भविष्य में इसके क्या परिणाम होंगें, इसे सोचा जा सकता है।

खुदरा व्यापार से जी रहे लाखों लोग क्या इस सरकार और लोकतंत्र के लिए दुआ करेंगें ? लोगों की रोजी-रोटी छीनने के लिए एक लोकतंत्र इतना आतुर कैसे हो सकता है ? देश की सरकार क्या सच में अंधी-बहरी हो गयी है? सरकार परचून की दुकान पर भी पूंजीवाद को स्थापित करना चाहती है, तो इसके मायने बहुत साफ हैं कि यह जनता के वोटों से चुनी गयी सरकार भले है, किंतु विदेशी हितों के लिए काम करती है। क्या दिल्ली जाते ही हमारा दिल और दिमाग बदल जाता है, क्या दिल्ली हमें अमरीका का चाकर बना देती है कि हम जनता के एजेंडे को भुला बैठते हैं। कांग्रेस की छोड़िए दिल्ली में जब भाजपा की सरकार आयी तो उसने प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए। क्या हमारी राजनीति में अब सिर्फ झंडों का फर्क रह गया है। हम चाहकर अपने लोकतंत्र की इस त्रासदी पर विवश खड़े हैं। हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना शायद इसीलिए लिखते है-

‘दिल्ली हमका चाकर कीन्ह,

दिल-दिमाग भूसा भर दीन्ह।’

याद कीजिए वे दिन जब हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीका से परमाणु करार के लिए अपनी सरकार गिराने की हद तक आमादा थे। किंतु उनका वह पुरूषार्थ, जनता के महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर हवा हो जाता है। सही मायने में उसी समय मनमोहन सिंह पहली और अंतिम बार एक वीरोचित भाव में दिखे थे क्योंकि उनके लिए अमरीकी सरकार के हित, हमारी जनता के हित से बड़े हैं। यह गजब का लोकतंत्र है कि हमारे वोटों से बनी सरकारें विदेशी ताकतों के इशारों पर काम करती हैं।

राहुल गांधी की गरीब समर्थक छवियां क्या उनकी सरकार की ऐसी हरकतों से मेल खाती हैं। देश के खुदरा व्यापार को उजाड़ कर वे किस ‘कलावती’ का दर्द कम करना चाहते हैं, यह समझ से परे है। देश के विपक्षी दल भी इन मामलों में वाचिक हमलों से आगे नहीं बढ़ते। सरकार जनविरोधी कामों के पहाड़ खड़े कर रही है और संसद चलाने के लिए हम मरे जा रहे हैं। जिस संसद में जनता के विरूद्ध ही साजिशें रची जा रही हों, लोगों के मुंह का निवाला छीनने की कुटिल चालें चली जा रही हों, वह चले या न चले इसके मायने क्या हैं ? संसद में बैठे लोगों को सोचना चाहिए कि क्या वे जनाकांक्षाओं का प्रकटीकरण कर रहे हैं ? क्या उनके द्वारा देश की आम जनता के भले की नीतियां बनाई जा रही हैं? गांधी को याद करती राजनीति को क्या गांधी का दिया वह मंत्र भी याद है कि जब आप कोई भी कदम उठाओ तो यह सोचो कि इसका देश के आखिरी आदमी पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? सही मायने में देश की राजनीति गांधी का रास्ता भूल गई है, किंतु जब जनप्रतिरोध हिंसक हो उठते हैं तो वह गांधी और अहिंसा का मंत्र जाप करने लगती है। देश की राजनीति के लिए यह सोचने का समय है कि कि देश की विशाल जनसंख्या की समस्याओं के लिए उनके पास समाधान क्या है? क्या वे देश को सिर्फ पांच साल का सवाल मानते हैं, या देश उनके लिए उससे भी बड़ा है? अपनी झोली भरने के लिए सरकार अगर लोगों के मुंह से निवाला छीनने वाली नीतियां बनाती है तो हमें डा. लोहिया की याद आती है, वे कहते थे- “जिंदा कौमें पांच तक इंतजार नहीं करती। ” सरकार की नीतियां हमें किस ओर ले जा रही हैं, यह हमें सोचना होगा। अगर हम इस सवाल का उत्तर तलाश पाएं तो शायद प्रणव बाबू को यह न कहने पड़े कि “पता नहीं आखिर देश कहां जा रहा है ?”

5 Responses to “देश के खुदरा बाजार को विदेशी कंपनियों को सौंपना एक जनविरोधी कदम”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    मैं श्री संजय द्विवेदी से अपने दो प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करता हूँ,पर अभी तक उत्तर आये नहीं.

    Reply
  2. आर. सिंह

    R.Singh

    यहाँ मैं केवल दो प्रश्न करना चाहता हूँ?
    पहला प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि हम चीन से सस्ता सामान अपने उपभोक्ताओं को मुहैया नहीं करा सकते?
    दूसरा प्रश्न यह है कि यह कहाँ का न्याय है कि चंद मुनाफाखोरोंके लाभ के लिए पूरे देश के गरीबों और साधारण जीविका वालों को निम्न स्तर के साजो सामान के लिए उचित से अधिक पैसा खर्च करने पर बाध्य होना पड़े?
    रही बात वालमार्ट जैसी कंपनियों के विरुद्ध आवाज उठाये जाने की बात तो इसका कारण भी उपरोक्त दो प्रश्नों के उत्तर में सम्माहित है.

    Reply
  3. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    क्या हम अभी भी सर्कार बदलने के लिए २०१४ का इंतज़ार करेंगे?

    Reply
  4. Anil Gupta

    इस जनविरोधी सरकार के इस निर्णय के पीछे की असली कहानी क्या है ये इस देश की भोलीभाली जनता को कौन बताएगा?मिडिया तो सरकार की चरणवंदना में लिप्त है क्योंकि उससे मिडिया के बड़े लोगों को लाभ मिलते हें.इस साल कपास की बम्पर फसल हुई लेकिन कृषि मंत्री ने निजी लाभ प्राप्त करके निर्यात खोल दिया नतीजतन बम्पर फसल के बावजूद सूत के भाव दोगुने हो गए. अब चीनी का निर्यात खोला गया है इससे चीनी पचास रूपये किलो पहुँच जाएगी और कृषि मंत्री की अपनी शक्कर मिलों का मुनाफा कई गुना बढ़ जायेगा. इस सरकार में कोई काम बिना निजी लाभ के नहीं होता है अतः ये नहीं माना जा सकता की रिटेल व्यापर को ऍफ़ डी आई और वालमार्ट जैसी कंपनियों के लिए खोलने के निर्णय में भी निश्चय ही कुछ बड़े नेताओं का निजी लाभ अवश्य होगा. ऐसे में मायावती का ये कहना की ये सब राहुल के विदेशी दोस्तों को लाभ पंहुचाने के लिए किया गया है गलत नहीं लगता.इस फैसले की गहरायी से जांच होनी चाहिए.

    Reply
  5. shiv

    वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियां दुनिया के सबसे सस्ता सामान बनाने वाले देश से ही ९०% सामान आयात करके हर देश में व्यापार करती है और वोह देश भारत नहीं अपितु चीन है| क्या हमारी यह नपुंसक सर्कार ने यह नियम बनाया है की जो सामान भारत में पैदा होता है वोह सामान बहार से नहीं लाया जायेगा तब तो ठीक है लेकिन वाणिज्य मंत्री के वक्तया के अनुसार ऐसा कुछ भी नियम नहीं बनाया जायेगा| इसका मतलब है की भारत की बाकि के छोटे और मझौले कल कारखाने भी यह निकम्मे कांग्रेसी चीन के लिए बंद करवा के छोड़ेंगे|

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *