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    गांधीवादी चिंतक पं. गोपालकृष्ण पौराणिक जी के सुयोग्य शिष्य थे देशबंधु शर्मा

    विवेक कुमार पाठक

    एडवोकेट स्व. देशबंधु शर्मा एक स्मृति
    शिवपुरी के छोटे कस्बे लुकवासा से निकलकर बंबई से वकालत पढ़ने वाले ग्वालियर के वरिष्ठ अधिवक्ता देशबंधु शर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। राजस्व और दीवानी मामलों के कुशल अधिवक्ता होने के साथ ही उनके व्यक्तित्व के कई आयाम रहे हैं। वे ग्वालियर में अनेक सामाजिक, शैक्षिक एवं धार्मिक संस्थाओं के संस्थापक सदस्य रहे हैं। समाजसेवा के लिए वे कई मंचों के माध्यम से सक्रिय रहे। आज अतीत के झरोखे से बरबस ही उनकी स्मृतियां हमारे स्मृति पटल पर उभर आती हैं।
    देशबंधुजी वर्तमान में जीने वाले व्यक्ति थे। वे श्रेष्ठ कर्म पर गहरा विश्वास करते थे मगर उनका इस संसार को संचालित करने वाली सर्वशक्तिमान सत्ता पर दृढ़ विश्वास था। वे स्वजनों के बीच चर्चा के दौरान अक्सर अंत में होइहि सोइ जो राम रचि राखा अवश्य कहा करते थे। तुलसी बाबा द्वारा रचित पावन रामचरितमानस की ये लोकहितकारी चौपाई दोहराकर वे आपसी वार्तालाप में कई समाधान एक साथ कर देते थे। कम शब्दों में अधिक और गहरी बात कहना उनके व्यक्तित्व का आकर्षक गुण था।
       कहा जाता है कि बिनु सत्संग विवेक न होई। देशबंधुजी के जीवन को देखेंगे तो यह चौपाई भी उनकी जीवन यात्रा का वर्णन करती है। बाल्यावस्था में उन्हें अपने मामाजी एवं गांधीजी की रचनात्मक धारा के अग्रणी विद्वान पंडित गोपालकृष्ण पौराणिक जी का जो सानिध्य मिला वो आजीवन उनका पथ प्रदर्शक रहा। वे पौराणिकजी द्वारा स्थापित आदर्श विद्यालय पोहरी के योग्य छात्र रहे। परिवार नागरिक गुणां की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। देशबंधुजी को भी मानवीय सरोकारों से जुडे़ अपने परिवार से काफी कुछ सीखने को मिला। अपने जीजाजी एवं ग्वालियर के स्वनामधन्य विद्वान स्व हरिहरनिवास द्विवेदी व अपनी बहन विद्या देवी के सानिध्य में उनमें कला, साहित्य संस्कृति और इतिहास के प्रति सहज अभिरुचि बढ़ी।  आदर्श विद्यालय पोहरी में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करते हुए उन्होंने स्वाबलंबन, सहकार, सदाचार, विनम्रता और परस्पर सहयोग जैसे मानवीय गुणों का पाठ पढ़ा। आदर्श विद्यालय में वे ग्रामीण जनजीवन को करीब से देख समज्ञ पाए। यहां से निकलकर आगे उन्होंने ग्वालियर को अपनी कर्मस्थली बनाया। देशबंधुजी ने ग्वालियर में आत्मनिर्भर होकर वकालत शुरु की और अपने बुद्धि विवेक और ज्ञान से कानून के क्षेत्र में खुद को सिद्ध किया। उन्होंने ग्रामीण काश्तकारों के हक की लड़ाई लड़ी और उन्हें उनके अधिकार की जमीनों पर विधिवत रुप से भूस्वामी का दर्जा दिलाया। राजस्व और दीवानी मामलों में उनकी गहरी जानकारी और विधिक योग्यता अकाट्य रही।
    एक एडवोकेट के रुप में अपनी विशिष्ट पहचान के अलावा वे सामाजिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उन्होंने ग्वालियर में छत्री मैदान के सामने आराधना कन्या विद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संस्था के अंतर्गत प्रायमरी, मिडिल एवं कन्याओं के लिए उच्चतर माध्यमिक विद्यालय वर्तमान में भी कुशलता से संचालित किया जा रहा है।    ग्वालियर में महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि के निकट गंगादास की बड़ी शाला एक ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। बलिदानी साधुओं की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया की अगुआई में देशबंधुजी ने यहां के ट्रस्ट का गठन कराया और यहां की विभिन्न गतिविधियों का संस्थापक न्यासी के रुप में संरक्षण किया। वे लायंस क्लब, ग्वालियर के सक्रिय सदस्य रहे और यहां के मित्रों के साथ समाजसेवा गतिविधियों में निरंतर सहभागी रहे।
    स्वास्थ्य कारणों से वे पिछले दो दशकों से न्यायालयीन कार्य से विरत रहे मगर इस बीच उन्होंने शिवपुरी लिंक रोड पर अपने पूज्य गुरु और मामाजी गोपालकृष्ण पौराणिकजी की स्मृति में पंडित गोपालकृष्ण पौराणिक शोध संस्थान की नींव रखी। संस्थान में पौराणिकजी के आदर्श, विचार और लेखन पर नियमित रुप से रचनात्मक कार्यक्रम होते हैं। यहां आदर्श विद्यालय, स्वालंबन और सहकार की संकल्पना पर आधारित शोध भी जारी हैं।
    निरोगी काया ही सबसे बड़ा सुख है। इसी मंत्र को समर्पित करते हुए देशबंधुजी की प्रेरणा से ग्वालियर में आयुर्वेदिक पंचकर्म केंद्र “आरोग्यम” भी स्थापित हुआ था। स्वास्थ्य सुधार को समर्पित इस केन्द्र के द्वारा लोगों को योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अपनाने और निरोगी रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। आज देशबंधुजी हमारे बीच नहीं है मगर उनके नाम के अनुरुप विश्व बंधुत्व की भावना और विचार का प्रसार ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

    विवेक कुमार पाठक
    स्वतंत्र पत्रकार

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