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    मोह में विरक्ति

    श्रीमति सुधा मूर्ति के इंगलिश लेख Detachment in attachment का हिंदी अनुवाद करने का प्रयास किया है। यहाँ आये दिन उपदेशात्मक लहजे मे रोज़ लोग माता पिता और बच्चों के रिश्तों में आई दरारों के कारण युवाओं को कोसते रहते है ,इस लिहाज़ से सुधा जी के इस लेख ने मुझे बहुत प्रभावित किया। प्रस्तुत है हिंदी अनुवाद-

    मोह है में विरक्ति

    जब मेरी दो बेटियों में से बड़ी की शादी हुई और वह घर छोड़कर अपना घर बसाने गई तो मुझे लगा मेरा एक हिस्सा मुझसे अलग हो गया है। जब वह किशोरावस्था में थी तो वह मुझे अपने शरीर का विस्तार सी ही लगती थी, इसलिये विवाह के बाद जब वह अपना घर बसाने गई तो मुझे लगा मैंने अपना एक हाथ ही खो दिया है।

    अगली बार जब वह हमसे मिलने आई तो मुझे हैरानी हुई कि उसकी प्राथमिकतायें अब बदल गईं थी। शायद इस प्रकार का झटका कभी हमने अपने माता पिता को भी दिया होगा।उसने अपनी सास के लिये अम्मा कहा तो मैं चौंकी।वो अपने घर जाने की जल्दी में रहती थी।

    तब मुझे पहली बार लगा कि मुझे इस मोह के साथ विरक्ति का अभ्यास करना चाहिये।

    मेरी बेटी की शादी के दो साल बाद मेरा बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त करने अमरीका चला गया।एक बच्चे के घर से जाने के अनुभव के कारण मेेेरी दूसरे बच्चे को बाहर भेजने के लिये मानसिक रूप से तैयारी बेहतर थी।

    मैने शहर में होने वाली कई कक्षाओं मे जैसे इकेबाना योग वगैरह में दाखिला ले लिया। मैं अधिकतर घर से बाहर रहने लगी क्योंकि मेरे पति २४ घंटे सातों दिन अपने काम में व्यस्त रहते थे।

    मेरा बेटा अमरीका से लिखता था कि उसे घर की बहुत याद आती है ख़ासकर मेरे बनाये हुए खाने की।कुछ साल बाद वह वापिस आगया तब हमने उसकी शादी करदी। उसने भी अपना घर अलग बसा लिया।

    अमरीका में उसे मेेेरे हाथ के बनाये खाने की याद आती थी पर अब जब कभी मैं उससे कहती हूँ आज खाना इधर खा लेना तो वह कहता है अम्मा आज कहीं और जाने का प्लान है ग़लत मत समझना किसी और दिन आजायेंगे।

    मैं समझ गई थी कि अब प्राथमिकतायें पूरी तरह बदल चुकी हैं।

    हम इतना बोलते है दूसरों को इतनी सलाह देते है पर बात जब अपने बच्चों की हो तो यह परिवर्तन स्वीकार करना मुश्किल लगता है।

    यही समय था जब मैने अपनी जीवन शैली और गतिविधियों को बदला।मैं अब मानसिरूप से परिपक्व हूँ। मेरे बच्चें से मेरा संपूर्ण स्नेह है, फिर भी इसमें विरक्ति है। मेरे प्यार के बदले मुझे उतना प्यार मिले ऐसी उम्मीद मैं नहीं रखती।मैं दख़लअदाज़ी नहीं करती न हीआलोचना करती हूँ।मेरी विरक्ति का यह अर्थ नहीं है कि मैं उनका ध्यान नहीं रखती या स्नेह कम हो गया है। जिन्हे आप प्यार करते हैं उन्हे जाने दीजिये वो लौट कर आयेंगे। ये सौंदर्य है मोह और विरक्ति का! जो जैसे रहना चाहे उसे स्वीकार कर सहनशीलता का परिचय दें। इससे शाँति और संपूर्णता का अनुभव मिलता है।

    बच्चे जब माता पिता का घर छोड़ कर जाते हैं तो जीवन में एक ख़ालीपन आता है इस समय अपने शौक पूरे करें चाहें वे आपको फालतू के काम लगें।अपने व्यक्तित्व का विस्तार करें।

    हमारी अगला क़दम होना चाहिये कि हम उन्हे पूर्णत: अबाधित छोड़ दें। मेरे इस फैसले से मुझमेंं सहनशीलता आई है जिससे आसपास के माहौल में भी बेहतर संतुलन बना है।

    मेरे दो बच्चे चेन्नई में ही हैं और मैं भावनात्मक रूप से समृद्ध हूँ। बच्चों के घर से जाने के बाद खालीपन से जूझना हमेशा से रहा है।

    मैं ये पोस्ट ख़ासकर उन मित्रों के लिये लिख रहीं हूँ जो भावनात्मकरूप से पूरी तरब बच्चों पर निर्भर हैं। अपने शौकों को समय और विस्तार दीजिये चाहें वो कितने ही बेमक़सद या फ़ालतू लगें। जो करें वो प्यार से करें न कि जिसे प्यार करते हैं वही करें।

    यही मोह में विरक्ति।

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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