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    Homeसाहित्‍यकविताभारतीय डाकघर की गिरती दशा

    भारतीय डाकघर की गिरती दशा

    —विनय कुमार विनायक
    श्रद्धेय महामहिम भारत सरकार
    नमस्कार डाकघर का नमस्कार!
    औपचारिक कुशलम कुशलात के पश्चात
    शुरू करता हूं अपनी बात
    भारतीय डाकघर की हालत नित हो रही बदतर
    अंग्रेज गए सत्ता बदली पर किस ने लिया खबर?

    अंतरिक्ष जयी भारत टैंक मिसाइल से लैस हो
    चला नई सदी की ओर
    पर डाकघरयूंटीम-टीम करते जैसे तारक भोर!

    नौ शाखाओं की डाक व्यवस्थाहो साखहीन दिन गिन रहा
    डाक कर्मियों का दोष नहींउनकी दशा अन्य से हीन रहा!

    डाकघर के बचत बैंक काअब बचना हैएकदम मुश्किल,
    आदम युग की व्यवस्था सेजनास्था की नींवगई है हिल!

    आज की इस भौतिक दुनिया मेंवक्त की हो रही मारामारी,
    पर शत मीलों तक दूर उप डाकघर सेमहज व्याज पुट हेतु
    प्रधान डाकघर तकखातों को भेजने कीये कैसीहै लाचारी?

    बंगालसे सटे चितरंजन केमिहीजामउपडाकघर का खाता
    जबतक झारखंड के प्रधान डाकघर बीदेवघरनहीं जाता,
    तबतकपरिपक्वहोकर भी वहकहांपरिपक्वता का मुहर पाता?

    यह कैसा दस्तूर,
    खाताधारी प्रतीक्षा में रहतेखाता करता अंधा टूर,
    कुछ लक्ष्य को पा जाता
    कुछराह मेंगुम हो जाता,बोलो किससे हुआ कसूर!

    ऐसे ढेरोंयक्षप्रश्न और उलटेसीधेहैंप्रावधान,
    जो रुढ़ियों सा हो खड़ा बन प्रगति का व्यवधान,
    नवयुग की नव दक्षता को कर रहाहैरान-परेशान!

    ऐसे प्रावधानडाकघरकाअनावश्यक कार्य बढ़ाता
    जटिलता में भारतीय डाकविभाग कोपड़ाता,
    वर्तमान समय मेंपरिवर्तन ही अब एकमात्रनिदान!
    निर्णय लेने में सक्षम अधिकाधिक प्रधान डाकघर का करें निर्माण!

    जो जन्मा डाकघर सेपीछेवही आज जन-मनको खिंचे,
    क्या मजदूरक्या वणिककिसानसबके मन कोसींचे
    बैंक और जीवन बीमा,चरम उपलब्धि की लांघकर सीमा
    करता डाकघर से एकयक्ष सवाल,हे प्रेरणा के आदि श्रोत,
    बैंकजीवनबीमाके पितृसमदेशी अर्थ कोष के महापोत!

    तुम्हें आज कौन सागम,कैसे हुए तुम बदहाल और बेदम?
    तुम अहर्निशम् सेवा महे मंत्र जाप करते रहते,
    खालीराजकोष को अपनी कमाई से नितभरते
    लेकरकम से कम अपनाअंशदान!

    तेरे श्रम पूंजी को सत्तादेती दूसरों को अलबत्ता,
    तुम्हें नहीं कुछ भी है अता पता
    तुम्हें नहीं कुछ भी अनुमान,डाकघर क्यों हो रहा गुमनाम!

    आज डाक विभाग कीसोचऐसी असफलजन कल्याण की
    कि हरकस्बा में एकअतिरिक्त विभागीय ग्रामीण डाकघर खुलता,
    जिसमेंसंपूर्ण डाक सेवासे रहितग्रामीण डाक सेवकबहालहोता,
    ऐसे एककार्यालय के दो तीन अंशकालिक कर्मीबिना कामभत्ता पाता,
    जबकि उसी कस्बा में दर्जन भर बैंक पूर्ण कैपेसिटी में चलता!

    अपने संपूर्ण पद सोपान अधिकारीकर्मियों के साथ,
    येसारेबैंकछोटे कस्बे में कभी घाटे में नहीं रहता!
    परंतु भ्रष्टाचार में लिप्तडाकघर सदा घाटे में चलता!

    ये सच है किपूरेभारत का
    कोईअंशकालिक शाखा डाकघरवक्त पर नहीं खुलता,
    बिना काम के ग्रामीण डाक सेवकों को दाम मिलता,
    ऐसेअकर्मण्यमानदेय पदधारीअक्सरा घोटाला करता!

    गबन घोटाले भ्रष्टाचार सेयदि मुक्ति चाहिए,
    तोऐसे अंशकालिक अतिरिक्त विभागीय ग्रामीण डाकघर
    औरपद समाप्त कर
    पूर्णकालिकविभागीय डाककर्मी बहाल करना चाहिए!

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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