लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-

hindi
(एक) सारांश
ॐ — देवनागरी लेखन का अभ्यास, उंगलियों की लचक बढ़ाता है,  रोमन लिपि में लेखन उंगलियों की लचक नहीं बढ़ाता।
ॐ –देवनागरी लिपि नें ध्वनि को ही अमर कर दिया है । इस के कारण, परम्परित उच्चारण निरन्तर शुद्ध और  सुरक्षित है। रोमन में लिखे उच्चारण अलग-अलग देशों में एक समय पर भी अलग अलग होते हैं। अंग्रेज़ी तीन बार गत हजार वर्षों में भी, आमूलाग्र बदली है। पुरानी अंग्रेज़ी आज के विद्वान भी समझ नहीं सकते।

ॐ–और संस्कृत उच्चारण मुख विवर में पूरा फैला हुआ है, उसका अभ्यास, जिह्वा की लचक बढ़ा देता है।
पर, अंग्रेज़ी और अन्य यूरोप की भाषाएं, बोलने में जिह्वा और मुख विवर के बहुतेरे भागों का प्रयोग ही नहीं करती।
ॐ–प्रचण्ड सांस्कृतिक और आध्यात्मिक साहित्य के पीछे भी हमारी लिपि और शब्द समृद्धि कारण है।
ॐ –ऐसा ध्वन्यर्थक मंत्रोच्चारण मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को उत्तेजित कर निपुण चिन्तन में सहायक होता है।
लेखक का मन्तव्य है कि केवल देवनागरी सारे भारत में पढ़ायी जाए।
( नाममात्र विरोध अपेक्षित है।)

(दो) संप्रेषण।
देवनागरी लिपि की सर्वश्रेष्ठता निर्विवाद है। इस लिपि का गुणगान कितना करें? जो भी परदेशी  विद्वान, इसे जानता है, समझता है, असीम गुणगान ही करता है। संसार की अन्य भाषाएं लिखी जा सकती है; पर उन भाषाओं में, संप्रेषण कोई चित्रों द्वारा, या कोई भावचित्रों द्वारा करता है। देवेंद्रनाथ शर्मा लिखते हैं कि  लिपि के विकास सोपान-१. चित्रलिपि, २. भावलिपि, ३.ध्वनिलिपि माने जाते हैं।और देवनागरी सारी ध्वनि लिपियों में भी श्रेष्ठतम है। आप लिखिए किसी भी लिपि में पर पढ़ना तो आप को, उच्चारण कर के ही है। अर्थात ध्वनि द्वारा  ही उच्चारण करना होता है। इसलिए देवनागरी ने इसी सत्य का उपयोग कर चमत्कार ही कर दिया। क्या विशेष किया देवनागरी ने?

(तीन) देवनागरी नें ध्वनि को ही अमर कर दिया।
देवनागरी नें सीधे ध्वनि को ही चिह्नित कर दिया। चित्र लिपि भले चित्रों द्वारा लिखी जाती है, पर पढ़ते समय तो बोलकर ही पढ़ते हैं। बातचीत भी तो उच्चारण से ही करनी पडती है। इसीलिए जब ध्वनिहीन भाषाओं को, अपनी भाषा के उच्चारणों को अमरत्व देना होता है; तो साहजिक देवनागरी का ही उपयोग करना पड़ता है। देवनागरी से ही दिशा बोध लेना पड़ता है।
जापान ने देवनागरी से ही दिशा बोध प्राप्त  किया था। अन्य लिपियाँ भी वर्तनी सुधार में,जाने अनजाने, मानदण्ड देवनागरी का ही स्वीकार करती है। अंग्रेज़ी (रोमन) वर्तनी सुधार के भी प्रयास किए गए थे।
वैसे भारत की सभी लिपियाँ उच्चारण में देवनागरी की ही अलग अलग आवृत्तियाँ हैं। प्रत्यक्ष देवनागरी का प्रयोग ५० से ६० % जनसंख्या की भाषाएं करती हैं। एक अपवाद छोड़कर, शेष भारतीय लिपियाँ भी देवनागरी (ब्राह्मी) की ही छायाएँ हैं। लिपि अलग अलग होती है; पर उच्चारण और उसका क्रम समान होता है।

(चार) देवनागरी सारे भारत में पढ़ायी जाए।
भारत की एकता दृढ़ करने के लिए, देवनागरी सारे भारत में पढ़ाई जाए।
साथ ध्यान रहे, कि, शुद्ध उच्चारण सीखने की अवधि बालकपन में ही होती है। ८-१० वर्ष की आयु खो देने के पश्चात शुद्ध उच्चारण सीखा नहीं जा सकता। जिह्वा लचिलापन खो देती है। फिर जीवन भर उच्चारण बहुत कठिनता और दृढ निश्चय से ही (शायद) सीखा जा सकता है; फिर भी त्रुटियाँ रह ही जाती है।

(पाँच) बचपन में रोमन सीखने से हानि।
रोमन लिपि सीखने पर शुद्ध देवनागरी उच्चारण संभव नहीं हो पाता। पर देवनागरी सीखनेपर प्रायः (बहुतेरा) अंग्रेज़ी उच्चारण कठिन नहीं होता। यह देवनागरी का विश्व की सभी भाषाओं की अपेक्षा अति-महत्त्वपूर्ण लाभ है।  इसलिए आप देखेंगे कि चीनी, जापानी, हवाइयन इत्यादि लोगों को अंग्रेज़ी उच्चारण में भारतीय लोगों की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है।

(छः) देवनागरी कैसे पढ़ाई जाए।
देवनागरी को स्वतंत्र रीति से, (हिन्दी) भाषा से अलग रूप में, सारे भारत में पढ़ाया जाए। छात्रों का, प्रायः सभी भाषाओं का उच्चारण सुधर जाएगा। संस्कृत की भी लिपि देवनागरी होने से, विरोध की राजनीति भी न्यूनमात्र होगी।

(सात)रोमन लिपि सदोष है।
रोमन लिपि से अन्य भाषाओं का, शुद्ध उच्चारण सीखा नहीं जा सकता। विमान परिचारिकाओं जैसा गलत उच्चारण सीखा जा सकता है। देवनागरी का उच्चारण आपको संसार की किसी भी भाषा के उच्चारण में पूरी सहायता करता है। हमारी अंग्रेज़ी की डिक्षनरियाँ भी कोष्ठक में देवनागरी में ही उच्चारण मुद्रित करती हैं। देवनागरी की सहायता बिना आप अंग्रेज़ी भी सीख नहीं सकते।

(आठ) संप्रेषण स्पष्ट और निःसंदिग्ध होना चाहिए।
देवनागरी के विकास के समय बहुत गहरा चिंतन और विचार कर, उसे सम्पूर्णतया निर्दोष बनाया गया है। नुक्ता वाले, और ऑ (Hot) और ऍ (Hat) जैसे, कुछ अंश भी विचार करने के पश्चात ही त्यजे गए थे। वे उलझन भरे या अस्पष्ट थे। और, देवनागरी शोधकर्ताओं को, संप्रेषण में संदिग्धता स्वीकार नहीं थी।
इस लिए नुक्ता,  और ऍ और ऑ जैसे अस्पष्ट अंशो को त्याग दिया गया। और संप्रेषण स्पष्ट और निःसंदिग्ध किया गया। समस्त उच्चारणों का, समग्र चिंतन किया गया था, ऐसा ही इतिहास है।
हमने ध्वनि को पूर्णतः तोड तोड़कर विश्लेषित किया था। सारे उच्चारण आप लघु-सिद्धान्त-कौमुदी में पाएंगे। वेद मंत्रों का पाठ कभी ध्यान देकर सुनने पर भी आप देवनागरी उच्चारण के प्रति आश्वस्त हो जाएंगे।

इस लिए, पहले, हम हीनग्रंथि का त्याग करें। और किसी अहरी गहरी लिपि का अनुकरण छोड़ दें। आप स्वतंत्र विचार करना नहीं चाहते तो, विद्वानों के उद्धरण पढें। विश्वका कोई भी भाषा-विज्ञान का, मौलिक चिंतक  देवनागरी का ढाँचा  देखकर ही स्तंभित हो जाता है। पर भारतीयों को अपना छद्म विनय त्यागना होगा; हीन ग्रंथि त्यागनी होगी। और गौरव धारण करना होगा।

(नौ) प्रचण्ड आध्यात्मिक उन्नति और साहित्य का कारण
मेरा मानना है, कि, हमारे प्रचण्ड आध्यात्मिक साहित्य और आध्यात्मिक उन्नति के पीछे भी हमारी लिपि और संस्कृत भाषा ने सशक्त मौलिक और सहायक भूमिका निभायी है। लिपि अकेली भी थी नहीं। उस लिपि में संस्कृत भाषा की अभिव्यक्ति भी साथ थी; संस्कृत की शब्द समृद्धि भी साथ थी; पाणिनि का व्याकरण भी था। इतनी सारी उपलब्धियाँ, जिन का परस्पर पूरक और पोषक होना भी एक चमत्कार से कम नहीं माना जा सकता। इस विषय पर आपसे भी विचार करने का अनुरोध  अवश्य है। आप मुझसे सहमत होगे ही।

(दस) पॉल मॉस, सेन्ट जेम्स शाला के मुख्याध्यापक।
पॉल मॉस, एक लन्दन की, शाला के मुख्याध्यापक  है, जहाँ  छः वर्ष अनिवार्यतः संस्कृत और देवनागरी पढ़ायी जाती है। वे कहते हैं कि देवनागरी लिपि में लिखने का अभ्यास,बालक की उंगलियों की लचक बढाने में सहायता करता हैं। इस प्रकार का व्यायाम, एक कलाकार की भाँति उस की अंगुलियों पर संस्कार करता है। देवनागरी अक्षरों पर जब घोट घोट कर के लिखने का अभ्यास किया जाता है, तो उंगलियों की अकड़ धीरे धीरे कोमलता में परिवर्तित होती है। और साथ साथ, संस्कृत उच्चारण का अभ्यास, जिह्वा की लचक भी बढ़ा देता है। ऐसा ध्वन्यर्थक उच्चारण मस्तिष्क के दोनो गोलार्धों को उत्तेजित कर व्यक्ति को निपुण चिन्तक बनाने में भी सहायक होता है।

(ग्यारह) युरोपीय भाषाओं की मर्यादा
पॉल मॉस आगे कहते हैं कि आज की यूरोप की भाषाएं बोलने में जिह्वा और मुख विवर के बहुतेरे भागों का प्रयोग ही नहीं करती। यह उन की सीमा-मर्यादा है। ऐसी सीमा को देवनागरी और संस्कृत भाषा पार कर गयी है, यह कोई साधारण-सा गुण नहीं है। उसी प्रकार लिखने में उंगलियों का विविध वलयांकित हलन-चलन, जो देवनागरी लेखन में किया जाता है, वह भी यूरोपीय लिपियों में अपवादात्मक ही जान पड़ता है।
पाठक भी, यदि विचार करें, तो उक्त कथन को सही ही पाएंगे। अब, जो बंधु रोमन लिपि में हिंदी पठन-पाठन का आग्रह रखते हैं, उन्हें भी इस जानकारी से विश्वास हो जाएगा। आप भी यदि, कुछ अक्षरों को लिख कर देखें, तो विश्वास दृढ़ होगा। जैसे क और K, म और M, ल और L, ह और H, जहाँ रोमन अक्षर केवल रेखाओं से ही काम चला लेते हैं, वहाँ देवनागरी में घुमावदार या वलयांकित अंशों का प्रयोग होता है। ॐ की तो बात ही अलग है।

(बारह) मस्तिष्क-गुंबज में गूंज ध्यान-मूलक है।
एक प्रसिद्ध श्लोक लेकर प्रयोग कीजिए।
“शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगं॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगीभिर्ध्यानगम्यं।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथं॥”
इस श्लोक में लगभग प्रत्येक शब्दका अंत अनुस्वार से होता है।

प्रयोग
(१)ले एकांत में २ मिनट शांत बैठिए, फिर
(२) आंखे मूंदे और दो मिनट बैठिए।
(३) इसके पश्चात, श्लोक को,धीरे पर कुछ ऊंचे स्वर सहित छंद में गाना प्रारंभ कीजिए। (मूक गायन नहीं।)
(४) बार बार गाते जाइए।  साथ साथ प्रत्येक शब्द के अंत को लम्बाइए।
(५)अब दोनों कानों के बीच, मस्तिष्क में. आपको, गूंज का अनुभव होगा।
(६)बार बार गाने से, कुछ समय पश्चात गूंज सुनने पर आप का ध्यान लगना प्रारंभ होगा।

जैसे शान्ताकारम् ऽऽऽऽऽ
शान्ताकरम्‌‍ऽऽऽऽ  भुजगशयनम्‌ऽऽऽ  पद्मनाभम्‌ऽऽऽ सुरेशम्‌ऽऽऽऽ|
विश्वाधारं ऽऽऽ गगनसदृशंऽऽऽ  मेघवर्णंऽऽऽ  शुभांगंऽऽऽ||
लक्ष्मीकान्तंऽऽऽ  कमल नयनंऽऽऽ योगीभिर्ध्यानगम्यंऽऽऽ|
वन्दे विष्णुंऽऽऽ भवभयहरंऽऽऽऽ सर्वलोकैकनाथंऽऽऽ||
उनका कहना है, कि, ऐसा दीर्घ म्‌ऽऽऽ का उचारण आपके मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को उत्तेजित करता है।
इस श्लोक का लगातार प्रयोग, मस्तिष्क के गुंबज में गूंज जगाता है।यह गूंज ही आपका ध्यान लगा देती है।
इस में उतावले होकर प्रयोग ना करें; असफलता हाथ लगेगी। ध्यान केंद्रित करने के लिए आराध्य की छवि काम आती है। विष्णु भगवान की छवि अभिप्रेत है। आप अपने आराध्य देवता की छवि भी रख सकते हैं।
बार बार प्रयोग करें। कुछ समय के बाद ध्यान लगना प्रारंभ होगा। मन में विचारों का आना बंद हो जाएगा। ध्यान की यही प्रारंभिक अवस्था मानी जाती है।

(तेरह)यो ध्रुवाणि परित्यज्य
एक उचित सुभाषित से आलेख का अंत करता हूँ।
“यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यंति अध्रुवं नष्टमेव च।।”
-आचार्य चाणक्य
अर्थ- जो अपने पास की, निश्चित वस्तुओं को छोड़कर अनिश्चित वस्तुओं के पीछे भागता है, उस को अनिश्चित मिलना तो दूर रहा, पास की निश्चित वस्तु भी नष्ट हो जाती हैं।

अपनी देवनागरी का त्याग कर बचपन से ही, रोमन सीखने-सिखाने वालों को क्या चेतावनी देता हूँ।  देवनागरी और उच्चारण पहले चार-छः वर्ष पढ़ाई जाए। बादमें आप अन्य लिपियाँ सीख सकते हैं। ऐसा विचार कर निर्णय ले।
बादमें अन्य लिपि सीखी जा सकती है।
बालक का भविष्य आप उज्ज्वल करना चाहते हैं ना? विचार करें।

टिप्पणियों के उत्तर देने में देर होगी।
पर आप स्वतंत्र और मुक्त टिप्पणी से अनुग्रहित करें।

9 Responses to “देवनागरी रोमन विवाद भाग ३”

  1. Mohan Gupta

    भारत में कई लोग मानते हैं के नागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपी हैं। जिसमे जैसा लिखा जाता हैं बैसा लिखा जाता हैं। इसी आधार पर समय समय पर कई लोगो ने इस बात की बकालत की हैं के भारत की सभी भाषयो के लिए नागरी लिपि अपने जाये। डॉ मधुसूदन जी नागरी और हिंदी के प्रचार के लिए अमूल्य योगदान दे रहे हैं. . नागरी लिपि के बारे में ,मैं एक लेख जोड़ रहा हूँ जो ओर्गनिसर पत्रिका में छपा था। Devanagari – The Perfect Script

    “Nagari script is simple, scientific and a sure vehicle for national integration”, declared Dr. Mullick Mohammed, a recipeint of Padmasri and All-India President of Nagari Lipi Parishad, New Delhi while inaugurating the 17th All India Nagari Sammelan at Bangalore on 19 March 1994. Nittor Srinivasa Rao, ex-Chief Justice of Karnataka presided.

    One book each in Kashkmiri, Telugu and Kannada languages and Devanagari script
    was realeased on the occasion. Shri Ejasuddin, Chief Guest lighted the traditional lamp and declared that the Devanagari script was not realted to any particular language. It is connected with India’s culture.

    Nagar Lipi Parshad was founded by Acharya Vinobha Bhave in Wardha. Its aim is
    to spread the use of Nagari as a national link script. The Parishad gives awards to institutions and individuals for promoting this work. Last year the institutional award was given to Rashtra Bhasha Prachar Samiti and the individual award was won by Lipikar L. S. (Bapu) Wakankar of Pune who was instrumental in adopting Nagari script on the conputers.
    This 17th Sammelan discussed the follwoing subjects in its two-day session at Bangalore.
    1) Use of Devanagri script as a link script for promotion of national integration.
    2) Use of Nagari script for southern languages.
    3) Devanagari for languages wihtout their own scripts.
    4) Use of Devanagari in computers.

    Question: What are the benefits of using Devanagari script for all Indian languages?

    Answer: In depth graphic studies of the Devanagari script is based on logical evolution of the letters to which there is no parallel in any other script of the world. Sir William Jones in 1889, wrote that he chose Devangari as the standard for his transcription scheme as Devanagari is more regular than any other Indian script. Nagari is known to a larger percentage of readers in India, the structure of ther Indian scripts is identical with that of Nagari but the forms have diversified in the last one thousand years. This is why
    Nagari was recommended to be the link script by Acharya Vinoba Bhave without replacing the regional scripts. If regional language literature is transcribed into Nagari, most of the burden of knowing several regional language scripts could be avoided.
    Question: In spite of the fact that Devanagari script is more beneficial, why has it not been possible to make its universal use a success?
    Answer: A script by itself does not get weightage simply because it is near perfect phonography. The insufficiency of Roman letters and the practice of artificial spelling are the drawbacks of Roman letters but their wide circulation is due to the power and dominance of the Anglo-American forces in today’s world. Nagari, though it is more complete and scientific, will not
    replace the Roamn script until the Indian Nation becomes strong and effective. Savarkar had pointed out that no one gives credence to the faculties of weak nations. Our people need to unite and organise themselves to become a force.

    Reply
    • ken

      Since most Devanagari scripted languages(Magahi,Mathili,Bhojpuri ,Marathi etc) are slowly disappearing under the influence of Hindi/Urdu ,a regional state may learn Hindi in their native script the way Urdu people do , using Hindi grammar and native words or in India’s simplest nukta and shirorekha free Gujanagari script through script converter.

      One may see here some ancient Sanskrit letters modification to modern Devanagari letters.
      http://www.sanskrit-sanscrito.com.ar/en/learning-sanskrit-writing-ancient-sanskrit-characters-1/422

      Isn’t Gujanagari(Gujarati)a modern form of Devanagari script??

      Hindi promoters think their script is holy and more scientific compared to other regional scripts. if scientific can they write chemical and algebraic formulas in Hindi ?

      Why these sounds ( ॅ ॉ ) where missing in traditional alphabet?

      Why did they borrow nukta from Urdu ?

      Which script will unite Hindi and Urdu?

      One may read this article.

      Hindi Will Destroy Marathi Language, Culture and Identity in Mumbai and Maharashtra (India)
      http://www.tamiltribune.com/10/0501.html

      આઓ મિલકર સંકલ્પ કરે,
      જન-જન તક ગુજનાગરી લિપિ પહુચાએંગે,
      સીખ, બોલ, લિખ કર કે,
      હિન્દી કા માન બઢાએંગે.
      ઔર ભાષા કી સરલતા દિખાયેંગે .
      બોલો હિન્દી લેકિન લિખો સર્વ શ્રેષ્ટ નુક્તા/શિરોરેખા મુક્ત ગુજનાગરી લિપિમેં !

      Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    डॉ. रणजित सिंह जी, श्री. मुकुल शुक्लजी, श्रीमती रेखा जी, और डॉ. प्रतिभा जी का धन्यवाद व्यक्त करता हूँ।

    टिप्पणियों के लिए, विदुषियाँ और विद्वानों की ओरसे सहमति के लिए, डॉ. रणजित सिंह जी, श्री. मुकुल शुक्लजी, श्रीमती रेखा जी, और डॉ. प्रतिभा जी का आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करता हूँ।
    बिना हिचक आप “मुक्त टिप्पणियाँ” देते रहें। टिप्पणियाँ मुझे आलेखों की दिशा एवं समस्याग्रस्त बिंदुओं पर विचार करने में सहायता करती है। अगला आलेख “राष्ट्र-भाषा-भारती” का गठन और रणनीति के विषय में सोच रहा हूँ। शीघ्रही प्रकाशित करूंगा।
    सभी टिप्पणिकारों को कहना चाहता हूँ, कि,अब अवसर आ चुका है। अभी, परिश्रम करना होगा।
    राष्ट्र भाषा के लिए अवसर है,लोहा गरम है।
    लन्दन की शालाके अध्यापक कहने लगे हैं, कि, “संस्कृत पर भारत का एकाधिकार नहीं है। उसके नाम में भी जैसे मराठी, गुजराती तमिल …इत्यादि प्रादेशिकता से जुडे नाम होते हैं, वैसा कुछ भी नहीं। संस्कृत सारे मनुष्यों की धरोहर है।”

    मैं ने कहा, क्या दिन आ गए। “संस्कृत पर भी हमारा अधिकार नहीं?”
    जब भारत जगेगा नहीं, तो यही होना है।
    योग सीखानेवाले ९५% पराए। ध्यान सीखाने वाले ८०% पराए। पतंजलि को पढनेवाले भी उनका लोहा मानते हैं। उथला, विकृत और छीछरा है, पश्चिम का मनोविज्ञान। नहीं उसे अज्ञान कहलाना चाहिए।
    ऐसी अनेक बाते गिनाई जा सकती है।
    पर आप सभीका धन्यवाद करता हूँ।
    ————————————————
    रेखा सिंह।
    “हमारे वर्तमान प्रधान
    मंत्री जी ने जिस प्रकार २०१४ के चुनाव मे अपने विचारों को हिन्दी मे
    व्यक्त किया और करते है उससे जनता इस बात को अच्छी तरह समझ सकती है ।”
    –अवसर आ चुका है।
    ——————————————————-
    प्रतिभा सक्सेना
    ===”इतने कुंठाग्रस्त हैं कि इन
    श्रेष्ठताओं को स्वीकारने में आनाकानी करते हैं .
    आशा है अब परिवर्तन आएगा !

    सही कहा। मुझे भी आशा जगी है। लोहा गरम है।
    —————————–
    मुकुल शुक्ल
    सीखने के लिए विदेशियों की सहायता लेनी पड़े | ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा पर ऐसा होना संभव है |
    आयुर्वेद की तरह हमारी भाषा भी बहुत जल्दी विदेशी पेटेंट करा कर हमे उस से वंचित कर देंगे |

    Reply
  3. इंसान

    झावेरी जी, क्षमा करें मुकुल शुक्ल जी की बात रखते हुए क्षण भर के लिए संयुक्त राज्य अमरीका में रहते हम आप को विदेशी मान कर यदि आपसे सहायता लेते हैं तो हमारे अहोभाग्य हैं| सच्च तो यह है कि अब तक पूर्व भारत सरकार से जुड़े तथाकथित हिंदी-भाषा विशेषज्ञों में न तो राष्ट्रप्रेम था और न ही उनमें विचारों की परिपक्वता ही थी अन्यथा आज हिंदी भाषा की ऐसी दुर्दशा न होती| मैं आशा करता हूँ कि वर्तमान भारत सरकार और भारत में हिंदी प्रचार विस्तार में व्यस्त सभी संस्थाएं शीघ्र ही आपके द्वारा लिखे आलेखों से प्रेरित कुशल व लोकप्रिय राष्ट्र भाषा नीति अपना सकें| अति उत्तम आलेख के लिए मेरा साधुवाद|

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      प्रिय बंधु-इन्सान जी। आप की शुभेच्छा, और माँ शारदा की कृपा से, भरसक प्रयास होगा। कुछ आप प्रवक्तापर पढेंगे ही। हमें अपनी भाषा से, आर्थिक लाभ कितना और कैसे होगा, ये प्रस्थापित करना है।
      ढाँचा बन गया है।आँकडॆ भी प्रस्थापित हुए है। मोदी जी भी यहाँ पधार रहे हैं।
      अनुक्रम निम्न है।
      (१) नीति निर्धारण, (२) शिक्षा प्रणाली में फैलना (३) साथ शब्दावलियाँ सुसज्जित करना (४) पाठ्य पुस्तक तैयार करनाम (५)उस को प्रशिक्षा द्वारा अध्यापन में फैलाना (६) अंतमें उसका फल वैचारिक समृद्धि में परिवर्तित करवाना होगा।
      (६)देश को, आर्थिक लाभ दिखाना होगा–जो अति प्रचण्ड है।
      —————————-
      इन घटनाओं को ६६ वर्ष की महाभयानक कुम्भकर्णी निद्रा के बाद, उसका प्रत्यक्ष फल दिखने में कुछ विलम्ब होगा।और, सामान्य जन धीरज नहीं रखता।
      ——————————————–

      जैसे, बालक के जन्म के बाद १८ वर्ष का होने तक उसकी (पढाई को) उन्नति को समृद्धि में परिवर्तित करने की, फलदायकता नहीं दिखती—
      ———————————–
      ऐसा होने से सामान्य नागरिक जो त्वरित फल की अपेक्षा रखता है; उसे समझमें नहीं आती।
      आलेख में समझाई जा सकती अवश्य है। सभी समझेंगे ही, यह भी कहा नहीं जा सकता।

      प्रयास करने में बाकी कुछ न रखा जाएगा।
      ———————————————————

      बहुत बहुत बहुत कचरा फैलाकर गया है अगला शासन। क्या कहा जाए? मेरे प्रयास के लिए १००% आश्वस्त रहिए। माँ शारदा की कृपा के लिए प्रार्थना है।

      कुछ अनुमान से समझ लीजिए।

      Reply
  4. मुकुल शुक्ल

    तर्क पूर्ण ढंग से रखी गयी बात का वज़न बहुत होता है | आपकी बात मे दिये गए तथ्यों को झुठलाना संभव ही नहीं है | बस ज़रूरत सिर्फ इतनी है की इसे कितनी जल्दी अपनाया जाये | आज की परिस्थितियों मे जिस तरह से हम अपनी धरोहर का नाश कर रहे है कहीं ऐसा न हो की जल्द ही वो दिन आ जाए जब हमे अपने बारे मे ही सीखने के लिए विदेशियों की सहायता लेनी पड़े | ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा पर ऐसा होना संभव है | डॉक्टर साहब जो मार्ग दिखा रहे है उस मार्ग को जितनी जल्दी ये राष्ट्र पकड़ेगा उतनी ही जल्दी हमारा कल्याण होगा नहीं तो आयुर्वेद की तरह हमारी भाषा भी बहुत जल्दी विदेशी पेटेंट करा कर हमे उस से वंचित कर देंगे |

    Reply
  5. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    प्रतिभा सक्सेना

    हम आपसे पूरी तरह सहमत हैं .सबसे विचित्र बात मुझे यह लगती है कि लोग बहुत सी बाते जानते हैं ,समझते भी हैं,लेकिन इतने कुंठाग्रस्त हैं कि इन श्रेष्ठताओं को स्वीकारने में आनाकानी करते हैं .
    आशा है अब परिवर्तन आएगा !

    Reply
  6. Rekha singh

    लेख पूर्णतः सत्य एवं प्रामाणित है । हिन्दी भाषा जितनी धनी है उतना ही उसका साहित्य भी । सभी भारतीय भाषाओं का उद्गम संस्कृत ही है । हिन्दी राष्ट्र भाषा होनी चाहिए । इसमे कोई दो राय नही । हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री जी ने जिस प्रकार २०१४ के चुनाव मे अपने विचारों को हिन्दी मे व्यक्त किया और करते है उससे जनता इस बात को अच्छी तरह समझ सकती है । हिन्दी हर मायने मे राष्ट्र भाषा होनी चाहिए ।

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  7. Dr Ranjeet Singh

    आपका कथन पूर्णतः सत्य एवं युक्ति सङ्गत है।

    डा० रणजीत सिंह

    Reply

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