हिमालयी क्षेत्र में विकास कार्य और चीन की नीयत

– डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

                               भारत की उत्तरी सीमा के क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार ने निर्माण कार्य तेज कर दिया है । नई सड़कों बनाई जा रही हैं । पुलों व सुरंगें का निर्माण किया जा रहा है । हवाई पट्टियाँ भी विकसित की जा रही हैं । इन संरचनाओं का लाभ सेना के साथ साथ आम जनता को भी मिलता है । इससे पहले  तिब्बत के साथ लगती भारतीय सीमा का क्षेत्र विकास के मामले में अवहेलना का शिकार था । यह स्वीकारोक्ति स्वयं सबसे लम्बे समय तक रक्षा मंत्री रहने वाले ए के एंटोनी ने 2012 में स्वयं संसद में की थी । सरकार ऐसा क्यों कर रही थी , इसका कारण एंटोनी ने यह बताया था कि यदि भविष्य में चीन से टकराव होता है तो वह भारतीय क्षेत्र में घुस कर इन संरचनाओं का लाभ उठा सकता है । लेकिन अब नरेन्द्र मोदी सरकार की नीति इस भय को लेकर बदल गई है , इसलिए निर्माण कार्य भी तेज़ी से शुरु हो गया है । गलवान घाटी में चीन के साथ ख़ूनी झड़प का मुख्य कारण यही था कि वहाँ भारत सरकार सड़क का निर्माण कर रही थी, जिसे चीन पचा नहीं पा रहा था । उसने बलपूर्वक सड़क निर्माण कार्य को रोकने का प्रयास किया , जिसके कारण दोनों देशों के सैनिकों के बीच प्राणघातक झड़पें हुईं ।  चीन को वह भारत अनुकूल लगता है जो हिमालय के साथ साथ लगती अपनी उत्तरी सीमा को लेकर गलफत में सोया रहे । भारत विकास करता है तो कुछ देशों को चुभता है । वे उसे रोकने के ऐसे निरामिष तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं जिससे उनकी असली मंशा पर किसी को शक न हो । आप के ध्यान में होगा 2012 में मनमोहन सिंह सरकार देश में उर्जा की जरुरतों को पूरा करने के लिए  तमिलनाडु में रूस की सहायता से  दो परमाणु रिएक्टर स्थापित करना चाहती थी । तब कुछ एन जी ओ यानि ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने पर्यावरण के नाम पर इस प्रकल्प का विरोध करना शुरु कर दिया था । धरना प्रदर्शन शुरु हो गया । तर्क यही था कि इससे पर्यावरण पर्दूषित होगा । कितना प्रदूषण फैलेगा, मीडिया में इसके आँकड़े भी दिए जाने लगे । उपर से देखने पर उनकी यह चिन्ता स्वभाविक ही लग रही थी । आख़िर सारी दुनिया इस समस्या से जूझ रही थी । सरकार ने प्रदर्शन कर रहे लोगों को , मनाने की भरसक कोशिश की , उनकी कुछ माँगें मान भी लीं , लेकिन प्रकृति की रक्षा का सारा भार अपने कन्धों पर लिए , वे लोग टस से मस नहीं हो रहे थे । तब मनमोहन सिंह ने कुछ एनजीओ को सार्वजनिक रूप से ताड़ना की और ख़ुलासा किया कि सरकार को पता है कि इन एनजीओ को विदेश से पैसा आ रहा है ताकि किसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर प्रकल्प को रोका जा सके । कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना ।
                 हिमाचल में रोहतांग सुरंग बन जाने से जहाँ वहाँ के स्थानीय लोगों को लाभ हुआ, पर्यटन का विकास हुआ , वहीं सेना की शक्ति को सुदृढ़ करने में भी यह सुरंग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है । अब उत्तराखंड में भी सरकार तीन सड़कों, ऋषिकेश से माना , ऋषिकेश से गंगोत्री, और टनकपुर से पिथौरागढ को चौड़ा करना चाहती है । ये सड़कें चार धाम यात्रा मार्ग का भी हिस्सा हैं और भारत-तिब्बत सीमा तक सेना को सामान पहुँचाने का रास्ता सुगम बनाती हैं  । ज़ाहिर है इससे जहाँ स्थानीय लोगों को लाभ मिलेगा, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा , वहीं भारत-तिब्बत  सीमा पर भारतीय सेना की पहुंच सुगम बनाने व  लाजिस्टिक्स सप्लाई लाइन सुदृढ करने में  सहायता मिलेगी ।इसलिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि इन सड़कों को चौड़ा करने की अनुमति प्रदान की जाए । लेकिन जैसे जैसे हिमालय में सुरक्षा के लिहाज़ से निर्माण कार्य तेज हो रहा है , वैसे वैसे कुछ लोगों की चिन्ता प्रकृति की रक्षा के लिए बढ़ने लगी है । चार धाम यात्रा की सड़कों को चौड़ा करने के प्रकल्प को        रुकवाने का आग्रह करते हुए एक  एनजीओ "सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून" ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है । तर्क यहाँ भी वही पुराना है , प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा की चिन्ता । इस एनजीओ के वकील कॉलिन गोंजालेस और मोहम्मद आफताब ने कोर्ट में तर्क दिया है कि  सड़कों को चौड़ा करने से हिमालय में भू स्खलन होगा , ग्लेशियर पिघल जाएँगे , इसलिए इस प्रकल्प को रोकना होगा । उच्चतम न्यायालय की सुनवाई कर रही पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि सीमा के पार , चीन हिमालय क्षेत्र में सड़कें बना रहा है , वहाँ भी तो हिमालय की प्रकृति वैसी ही होगी जैसी इधर है ?
                 दरअसल पूरे पर्वतीय क्षेत्रों में विकास बनाम प्रकृति संरक्षण की बहस काफ़ी लम्बे अरसे से छिड़ी हुई है । बीच बीच में यह बहस उच्चतम न्यायालय में भी पहुँच जाती है । लेकिन जब से चीन ने भारत-तिब्बत सीमा पर सड़कों का जाल ही नहीं बिछा दिया बल्कि गोर्मो से ल्हासा तक रेल पटडी भी बिछा दी है , तब से हिमालय क्षेत्रों में आधारभूत संरचनात्मक ढाँचा विकसित करना और भी जरुरी हो गया है । पिछले कुछ अरसे से चीन आक्रामक भी हो गया है । इसका कारण भी यही है कि उसे लगता है भारत उत्तरी सुरक्षा के प्रति जाग गया है । अभी उसे रोक दिया जाए तो बेहतर होगा , बाद में ऐसा करना संभव नहीं होगा । रोकने के दो तरीक़े हैं । सीमा पर भारतीय सेना को डराया जाए , जैसा प्रयास उसने डोकलाम और गलवान में किया । लेकिन चीन का यह प्रयोग सफल नहीं हुआ । दूसरा तरीक़ा किसी तरह हिमालय क्षेत्र में हो विकसित हो रहे आधारभूत संरचनात्मक ढाँचे को रुकवाया जाए । देखना होगा आने वाले दिनों में यह रुकवाने के लिए कॉलिन गोंजालेस और मोहम्मद आफताब कैसे कैसे तर्क देते हैं । उच्चतम न्यायालय में सुनवाई कर रही पीठ ने सुनवाई के दौरान उचित ही कहा है कि भूस्खलन और अन्य विपरीत घटनाओं का कारण केवल सड़क निर्माण नहीं है , उसके अन्य कारण भी हैं । चीन को देखते हुए हिमालय की सुरक्षा पहला दायित्व है । इसी के चलते पर्यावरण की रक्षा हो सकेगी ।

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