लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

नई दिल्ली 17 मई। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में आने वाले दो वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन का रोडमेप तैयार होने लगा है। देश पर आधी सदी से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस में इन दिनों भविष्य में सत्ता की मलाई खाने की गलाकाट स्पर्धा मची हुई है। कांग्रेस का एक बडा वर्ग जहां अब सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) को 12 तुगलक लेन (राहुल गांधी का सरकारी आवास) ले जाना चाह रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ प्रबंधक चाह रहे हैं कि 2014 में होने वाले आम चुनावों में भी राहुल गांधी को बतौर प्रधानमंत्री न प्रोजेक्ट किया जाए। इस रोड मेप में 2012 को बहुत ही अहम माना जा रहा है।

10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि 2014 में संपन्न होने वाले आम चुनावों में वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ.मन मोहन सिंह को पार्टी का नेतृत्व नहीं करने देने के मसले पर सोनिया गांधी ने अपनी मुहर लगा दी है। सोनिया के इस तरह के संकेत के साथ ही कांग्र्रेस के अंदर अब 2012 के सन को महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। 2012 में देश के महामहिम राष्ट्रपति का चुनाव होना है। कांग्रेस के प्रबंधकों का एक धडा इस प्रयास में लगा हुआ है कि वजीरेआजम डॉ. मनमोहन सिंह को या तो राष्ट्रपति बना दिया जाए या फिर उन्हें स्वास्थ्य कारणों से घर ही बिठा दिया जाए।

कांग्रेस के प्रबंधकों ने सोनिया गांधी को यह मशविरा भी दे दिया है कि अगर 2014 में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत लाने में कामयाब न हो सकी तो राहुल गांधी को पार्टी का नेतृत्व नही करना चाहिए। इन परिस्थितियों में भगवान राम के स्थान पर जिस तरह भरत ने खडांउं रखकर राज किया था, उसी तरह ”खडाउं प्रधानमंत्री” की दरकार होगी। 2012 में 7, रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की इच्छाएं अब कांग्रेस के अनेक नेताओं के मन मस्तिष्क में कुलाचें भरने लगी हैं। इस दौड में प्रणव मुखर्जी, पलनिअप्पम चिदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे के नाम सामने आ रहे हैं।

कांग्रेस की इंटरनल केमिस्ट्री को अच्छी तरह समझने वालों की नजरें इन सारे नेताओं के बजाए इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के अघोषित चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह पर आकर टिक गईं हैं। मध्य प्रदेश में दस साल तक निष्कंटक राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह ने संयुक्त मध्य प्रदेश में तत्कालीन क्षत्रप विद्याचरण शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल, अजीत जोगी, माधव राव सिंधिया, कुंवर अर्जुंन सिंह और कमल नाथ जैसे धाकड और धुरंधर नेताओं को जिस कदर धूल चटाई थी, वह बात अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नही हुई है।

राजा दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार को वर्तमान में जिस तरह से भरोसे में लेकर नक्सलवाद के मसले पर वर्तमान गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम पर हमले किए हैं, उसे राजा की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की सीढी के तौर पर देखा जा रहा है। राजा के कदम ताल देखकर लगने लगा है कि वे राजपूत नेताओं को लामबंद करने के साथ ही साथ अपनी ठाकुर की छवि को उकेर कर उदारवादी नेताओं का समर्थन भी हासिल करने का जतन कर रहे हैं। चिदम्बरम पर एक जहर बुझा तीर दागकर हाल ही में राजा दिग्विजय सिंह ने कहा था कि पलनिअप्पम चिदम्बरम अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो उन्हें और अधिक उदार बनने की दरकार होगी।

वैसे कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू तथा कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को राह दिखाने के लिए एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में लालटेन लेकर चलने वाले राजा दिग्विजय सिंह एक बात शायद भूल रहे हैं कि कांग्रेस की परंपरा कुछ उलट ही रही है। नेहरू गांधी परिवार की मंशा से इतर जब भी किसी कांग्रेसी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को देखा है, उसे राजनैतिक बियावान में सन्यासी जीवन बिताने बलात ढकेल दिया जाता रहा है।

राजा दिग्विजय सिंह को इसके लिए कांग्रेस का बहुत पुराना नहीं बल्कि सत्तर के दशक के उपरांत का इतिहास ही पलटाना होगा। बाबू जगजीवन राम से बरास्ता हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी और कुंवर अर्जुन सिंह के मन की बातें सामने आने और मंशा स्पष्ट होने के उपरांत उनके साथ कांग्रेस ने किस कदर ”अछूत” के मानिंद व्यवहार किया है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कल तक कुंवर अर्जुन सिंह के दिखाए पथ पर चलने वाली कांग्रेस ने आज उन्हें दूध की मख्खी के मानिंद निकालकर बाहर फेंक दिया है।

One Response to “दिग्गी की नजरें 7, रेसकोर्स पर”

  1. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    अब समझ मे आया कि आखिर दिग्गी राजा सोनिया को पटाने के लिये और नक्सलियो के समर्थन मे ऎसा बयान क्यो दे रहे है. कुर्सी के साथ थोडा देश-समाज का भी राजा जी ख्याल कर ले तो सब का भला होगा. देश के साथ घात करके कुर्सी मिल भी गई तो किस काम की……

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