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    दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे दिलीप साहब

    ● श्याम सुंदर भाटिया
    काश, सोशल मीडिया में सेहत से जुड़ी उनकी यह ख़बर भी दीगर न्यूज़ की मानिंद महज अफवाह होती, लेकिन इस बार बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार के निधन की ख़बर उनके ऑफिसियल ट्वीटर अकाउंट से रिलीज़ हुई तो उनके चाहने वाले करोड़ों फैन्स सदमे में आ गए। जबर्दस्त अदाकारी के मालिक मोहम्मद यूसुफ सरवर खान उर्फ़ दिलीप कुमार दो साल और जीवित रहते तो जीवन की एक स्वर्णिम सेंचुरी मुकम्मल कर लेते। दिलीप साहब के परिजनों के अलावा फैमिली डॉक्टर्स, बेशुमार फैन्स की भी ख्वाहिश यही थी, लेकिन तमाम व्याधियों के चलते खासकर सांस लेने की तकलीफ से ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर बॉलीवुड का यह बादशाह अंततः हार गया। 98 बरस के दिलीप साहब ने 07 जुलाई को सुबह मुंबई के हिंदुजा अस्पताल में अंतिम सांस ली। दिलीप साहब को शूटिंग के दौरान जब भी वक्त मिलता था, वह क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। सोशल मीडिया के जरिए अपनी पुरानी यादों को ताजा करना भी उनकी आदतों में से एक था। दिलीप साहब ने अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को पैसा कमाने के लिए कभी नहीं भुनाया। सायरा बानो और दिलीप कुमार की लव स्टोरी शादी के अंजाम तक तो पहुंच गई, लेकिन इनके माता-पिता बनने का सपना अधूरा ही रहा। ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा दिलीप साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में किया है। इसमें बताया गया है, दिलीप-सायरा ताउम्र माता-पिता क्यों नहीं बन सके? यह बात दीगर है, दिलीप साहब ने दो शादियां की थीं। दूसरी बीबी अस्मा साहिबा तो उनकी जिंदगी में 1983 तक ही रहीं, लेकिन 22 बरस छोटी सायरा बानो का साथ अंतिम सांस तक बना रहा।

    11, दिसंबर 1922 पेशावर-पाकिस्तान में जन्मे दिलीप साहब का बॉलीवुड करियर 1944 में फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से शुरू हुआ था। 1947 में उन्होंने ‘जुगनू’ में काम किया। इस फिल्म की कामयाबी ने दिलीप साहब को चर्चित कर दिया। इसके बाद उन्होंने ‘शहीद’, ‘अंदाज’, ‘दाग’, ‘दीदार’, ‘मधुमति’, ‘देवदास’, ‘मुसाफिर’, ‘नया दौर’, ‘आन’, ‘आजाद’ सरीखी सुपरहिट फिल्मों में काम किया। दिलीप साहब की फिल्म मुग़ल-ए-आजम उस वक्त की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। अगस्त 1960 में रिलीज़ हुई उस वक्त की सबसे महंगी फिल्म थी। अपने अभिनय के बूते वह स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों में लाखों युवा दर्शकों के दिलों की धड़कन बन गए थे। दिलीप साहब ट्रेजेडी किंग के साथ ऑलराउंडर एक्टर भी कहे जाते थे। 25 साल की उम्र में वे देश के नंबर वन एक्टर के रूप में स्थापित हो गए थे। राजकपूर और देव आनंद के आने से ‘दिलीप-राज-देव’ की फेमस त्रिमूर्ति ने लोगों के दिलों पर लंबे समय तक राज किया। दिलीप कुमार प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकीज की देन हैं, जहां देविका रानी ने उन्हें काम और नाम दिया। यहीं वे यूसुफ सरवर खान से दिलीप कुमार बने और यहीं उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के लिए उन्हें 1250 रुपए मिले थे। उस वक्त उनकी उम्र 22 साल थी।

    पद्मभूषण से दादा साहब फाल्के तक इस महानायक ने अपने करियर के दौरान करीब 60 फिल्मों में काम किया। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि अभिनय के चलते उनकी इमेज खराब न हो। उन्हें उनके अभिनय के लिए भारत सरकार ने 1991 में पद्मभूषण से नवाजा था। वहीं, 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड भी उन्हें मिल चुका है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1997 में ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से नवाजा, जो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। हालांकि इस सम्मान को लेकर सियासी गलियारों में हंगामा बरपा। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और यह सम्मान वापस करने की इच्छा जताई, लेकिन अटल जी ने ऐसा न करने सलाह दी। दिलीप साहब अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, लेकिन एक अभिनेता से लेजेंड बनने का उनका सफर आसान नहीं रहा है। वे कुल 12 भाई-बहन थे। उनका बचपन काफी तंगहाली से गुजरा था। अंग्रेजी जानने के चलते उन्हें पुणे की ब्रिटिश आर्मी कैंटीन में असिस्टेंट की नौकरी मिल गई। दिलीप कुमार को कैंटीन में 36 रुपए मेहनताना मिलता था। इसी कैंटीन में एक दिन भारत की आजादी की लड़ाई का समर्थन करने के चलते उन्हें गिरफ्तार होना पड़ा था।

    दिलीप कुमार के डॉक्टर जलील पारकर कहते हैं, दिलीप साहब उम्र से जुड़ी तकलीफों विशेषकर सांस से जुड़ी समस्या का सामना कर रहे थे, लेकिन डॉक्टर्स उनके उम्दा इलाज में जी-जान से जुटे थे। दिलीप साहब का 21 साल से इलाज कर रहे डॉ. नितिन गोखले कहते हैं, हम सब चाहते थे कि दिलीप साहब 100 साल की उम्र पूरी करें। दिलीप कुमार ने पांच दशक से भी अधिक के करियर में उन्होंने कई फिल्मों को ठुकरा भी दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि फिल्में कम हों, लेकिन बेहतर हों। उन्हें इस बात का मलाल रहा था कि वे ‘प्यासा’ और ‘दीवार’ में काम नहीं कर पाए। उनकी कुछ हिट फिल्मों में ‘ज्वार भाटा’ (1944), ‘अंदाज’ (1949), ‘आन’ (1952), ‘देवदास’ (1955), ‘आजाद’ (1955), नया दौर (1957) ‘मुगल-ए-आजम’ (1960), ‘गंगा जमुना’ (1961), ‘क्रान्ति’ (1981), ‘कर्मा’ (1986) और ‘सौदागर’ (1991) शामिल हैं। उन्हें आखिरी बार बड़े पर्दे पर 1998 में आई फिल्म किला में देखा गया। वह 1991 में पद्म भूषण, 1994 में दादा साहेब फाल्के, 2015 में पद्म विभूषण अवार्ड से नवाजे गए। वह 2000 से 2006 तक राज्य सभा से सदस्य भी रहे। दिलीप साहब झोली में 10 बार फिल्मफेयर अवार्ड भी आए । 1954 में बेस्ट एक्टर (दाग), 1956 में बेस्ट एक्टर (अंदाज), 1957 में बेस्ट एक्टर (देवदास), 1958 में बेस्ट एक्टर (नया दौर), 1961 में बेस्ट एक्टर (कोहिनूर), 1965 में बेस्ट एक्टर (लीडर), 1968 में बेस्ट एक्टर (राम और श्याम), 1983 में बेस्ट एक्टर (शक्ति)। यह रिकॉर्ड गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी दर्ज है। 1994 में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, 2005 में स्पेशल अवार्ड, नेशनल अवॉर्ड, 1961 में सैकंड बेस्ट फीचर फिल्म (गंगा जमुना), 2006 में स्पेशल लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला।

    राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने अपने शोक संवेदना में कहा, इस अभिनेता के आकर्षण ने सभी सीमाओं को पार कर दिया। उन्हें पूरे उपमहाद्वीप में बेपनाह मुहब्बत मिली। उनके निधन के साथ एक युग समाप्त हो गया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, दिलीप साहब को सिनेमा जगत के दिग्गज के रूप में याद किया जाएगा। वह एक अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। उनका निधन हमारी सांस्कृतिक दुनिया के लिए भारी क्षति है। श्री मोदी ने दिलीप साहब की पत्नी सायरा बानो को फोन करके भी गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है। बॉलीवुड में शहंशाह श्री अमिताभ बच्चन ने उन्हें याद करते हुए ट्वीट किया, एक संस्था चली गई.. भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, वह हमेशा ‘दिलीप कुमार से पहले, और दिलीप कुमार के बाद’ होगा..फिल्म स्टार श्री अक्षय कुमार ने ट्वीट कर लिखा, दुनिया के लिए और भी हीरो हो सकते हैं लेकिन हमारे लिए दिलीप कुमार ही हीरो थे। दिलीप साहब की दिनों-दिन बिगड़ती सेहत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है, उन्हें दो छोटे भाइयों के निधन की सूचना तक नहीं दी गई थी। दिलीप साहब ने अपने भाइयों -असलम खान (88) और एहसान खान (90 ) को कोरोना वायरस के कारण खो दिया था। इसके बाद दिलीप साहब ने अपना जन्मदिन और शादी की सालगिरह भी नहीं मनाई थी।

    श्याम सुंदर भाटिया
    श्याम सुंदर भाटिया
    लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। रिसर्च स्कॉलर हैं। दो बार यूपी सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान और पत्रकारिता में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए बापू की 150वीं जयंती वर्ष पर मॉरिशस में पत्रकार भूषण सम्मान से अलंकृत किए जा चुके हैं।

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