लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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जबसे केंद्र में कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार सत्तासीन हुई है महंगाई लगातार बेलगाम होती जा रही है। कीमत थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जीवनावश्‍यक वस्‍तुओं की कीमतों ने सभी रिकार्ड तोड़ते हुए गरीबों की कमर भी तोड दी है। आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। उसके सामने दो वक्त की रोटी जुटाने तक का संकट खड़ा हो गया है। दाल-रोटी को तो गरीब से गरीब आदमी का भोजन समझा जाता था परन्तु अब तो दाल-रोटी के लिए भी आम आदमी तरस रहा है। संप्रग सरकार गरीबों के मुंह से निवाला तक छिनने पर आमादा है।

गौरतलब है कि खाने पीने की चीजों की महंगाई दर बढ़कर सत्रह परसेंट के करीब पहुंच गई है। 12 जून को खत्म हफ्ते में खाने-पीने की महंगाई दर करीब पौने एक परसेंट बढ़ गई है। महंगाई दर में ये बढ़ोतरी दालों, सब्जियों और दूध के दाम बढ़ने की वजह से आई है। सब्जियां करीब आठ परसेंट महंगी हुई है। जबकि दालों के दाम दो परसेंट तक बढ़े हैं। खाने पीने की चीजें महंगी होने की वजह से ही मई में महंगाई दर सवा दस परसेंट को पार कर गई है।

अजीब विडंबना है कि जहां एक ओर लोगों के पास खाने की कमी है और दूसरी ओर लाखों टन खाद्यान्न गोदामों में सड़ रहा है। क्‍या कांग्रेस वास्‍तव में आम आदमी की सरकार है; नहीं, यह सरकार सिर्फ कुछ खास लोगों के लिए काम कर रही है। जहां आम आदमी का जीना मुहाल हो गया है वहीं कांग्रेस अध्‍यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और ‘युवराज’ श्री राहुल गांधी इस विषय पर अटूट चुप्पी साधे बैठे हैं। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बार-बार दावा कर रहे हैं कि महंगाई जल्द ही दूर होगी। कृषि मंत्री कहते हैं कि महंगाई पर काबू करना उनके हाथ में नहीं है। वह कहते हैं कि फसल का मामला राज्य सरकारों के हाथ में है। ऐसा क्‍यों होता है कि कांग्रेस जब-जब सत्ता में आती है महंगाई बेलगाम हो जाती है। जबकि मोरारजी भाई के नेतृत्‍वाली जनता पार्टी और अटलजी के नेतृत्‍व वाली एनडीए के शासन में सभी आवश्यक वस्तुएं की कीमतें नियंत्रण में रहीं।

महंगाई बढने का सिर्फ एक कारण है कि संप्रग शासन में मुनाफाखोरी और जमाखोरी अपने चरम पर है। आपका क्‍या कहना  है ?

33 Responses to “परिचर्चा : आम आदमी आज दाल-रोटी तक के लिए मोहताज”

  1. जितेन्द्र कुमार यादव

    जब तक वदेशी महिला के हाथ में देश रही तब तक देश के यही हाल रही।

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  2. Dilip sikarwar

    मह्गाइ मारे जा रहो है. मै तो कहत हु कि सरकर के नुमैन्दे जन्रल बोगि मे सफर करेन. गेस के लिये लैएन मे खदे र्हे रहे तो उनकि अकल थीक हो जयेगी

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  3. swamisamvitchaitanya

    आम आदमी जो अपने जीवन के प्रति अनभिज्ञ है वह हमेशा ही मोहताज रहेगा उसके लिए राजनीती नहीं रोटी की जरुरत होती जहा से जितनी भी उपलभध हो जाये उसी से चले परिवतन धीरे धीरे होता है

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  4. Dr. Danda Lakhnavi

    दोहों के आगे दोहे
    ===========
    मारा गया किसान फिर, पीटा गया मंजूर।
    जल-डीजल दोनों हुए, आम-जनों से दूर॥

    शासन-सत्ता का यही, जनता को वरदान।
    मंहगाई कोल्हू बनी, आम आदमी घान॥

    स्वप्न दिखाए स्वर्ग के, दिया नर्क में ठेल।
    मंहगाई की मार के, क्या सरकारी खेल?

    अमरीका – ईराक का, हुआ कभी था युद्ध।
    उसके काले असर से, जग विकास अवरुद्ध॥

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  5. प्रेम

    महंगाई का प्रश्न क्योंकि भारत की अभाव ग्रस्त अर्थ व्यवस्था में सदैव अविरत है, पिछले वर्ष जून २५ को प्राकाशित इस लेख के विषय में मुझे कूदने में कोई संकोच नहीं| संक्षेप में इसका दोष थोडा थोडा कर हम सभी भारतीयों पर है| कहा जाता है कि पंजाब में जालंधर में स्थित मेरा छोटा सा गाँव जहां बचपन में घर की छत पर खड़े मैं चारों ओर दूर क्षितिज तक खेत खलिहान के अतिरिक्त कुछ और नहीं देख पाता था किसी पठान के नाम पर आधारित है| पठान वहां कैसे पहुंचा? इतिहास बताता है कि उत्तर की ओर से आये अनेक आक्रमणकारियों ने सैंकडों राज्यों को रौंदा और फिर हिन्दोस्तान पर शासन किया| समय बीतने पर मुठी भर धूर्त अंग्रेजों की कंपनी ने विलायत से लगभग छै हज़ार किलोमीटर दूर हिन्दोस्तान के राजों और रजवाडों पर धीरे धीरे अपना प्रभुत्व बना ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित किया| मुझे कहना यह है कि हम सदा लुटते रहे है| लूटना हमारी मनोवृति में है क्योंकि हम अकेले हैं| मुझे किसी ने नहीं बतलाया लेकिन तथाकथित स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश और तत्पश्चात कांग्रेस, दोनों के देश को लूटने की रीति में कोई विशेष अंतर नहीं था| मुझे अपनी अधेड़ ऊमर में यह भी विश्वास हो चला है कि वास्तव में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले के एक ही भारतीय सपूत जवाहरलाल नेहरु ने रक्त और रंग में भारतीय होते अंग्रेजी सोच, नैतिकता, और बुद्धि से अंग्रेजों के प्रतिनिधी कार्यवाहक के रूप में स्वतंत्रता के प्रारंभ से ही बिना किसी विरोध के सत्तारूढ़ी कांग्रेस द्वारा भारतीय स्वशासन स्थापित कर भारतीयों से ऐसे ऐसे राजनीतिक दाव पेंच खेले हैं कि हम आज भी अकेले हैं और स्वेच्छापूर्ण गुलामी में लुटे जा रहे है|
    मुझे संदेह है कि अलग अलग राग अलाप रहे टिप्पणीकारों ने यहां प्रस्तुत छब्बीस टिप्पणियों में एक दूसरे के विचार पढ़े हों| क्योंकि यहाँ सभी मिल एक आवाज़ में सामाजिक कुरीतियों के कारण बिगड़े व्यक्तिगत आचरण की बात नहीं करते; संगठन की बात नहीं करते; समाज व देशप्रेम की बात नहीं करते| आज भी व्यक्तिवाद की दुर्बलता के कारण जीवन के प्रत्येक वर्ग में हम अपराधी संगठन से लुटे जा रहे हैं| महंगाई पर कौन रोक लगाए? इस निराशाजनक स्थिति में चारों ओर अँधेरे में एक किरण के स्वरूप उजागर हुए हैं बाबा रामदेव| मैंने स्वंतंत्रता से आज तक भगवे कपड़ों में किसी व्यक्ति को भारत और इस देश की गरीब जनता की दयनीय दशा पर इतना विचार करते नहीं देखा और सुना है| उनके द्वारा स्थापित भिन्न भिन्न भारत स्वाभिमान कार्यक्रम संगठनों के अंतर्गत भारतीयों को संगठित कर बाबा रामदेव भारत पुनर्निर्माण करने चले हैं| देश में वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक स्थिति ज्यों की त्यों बनाए रखने वाले राजद्रोहियों और षड्यंत्रकारियों ने अभी से उनके विरोध में शोर मचाना शुरू कर दिया है| क्यों न हम व्यक्तिवाद छोड़ हिलसा मछली की तरह एक बड़े समूह में बाबा रामदेव के सहयोग से एक ऐसा समाज बनाए जहां भद्र, सचरित्र, न्यायप्रिय, व राष्ट्रवादी लोग राजनीति में आएं और तुरंत भारत पुनर्निर्माण में लग जाएं| महंगाई व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक समस्या होगी जिसे समाज सुलझायेगा|

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    महगाई के अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे महत्वपूर्ण व वास्तविक कारण हैWTO द्वारा विश्व के देशों पर थोंपी गयी वे नीतियाँ जो अमेरिकी व उसके साथी देशों की व्यापारी ताकतों को बेपनाह मुनाफ़ा पहुंचानेवाली हैं. संसार की आबादी की केवल २० % जनसंख्या वाले ये चंद देश और इनकी व्यापारी कम्पनियां दुनिया के करोड़ों लोगों की भुखमरी का मुख्य कारण हैं. भारत जैसा विशाल देश भी इन्ही राक्षसी कंपनियों का शिकार बन रहा है और भारत की सरकारें उनकी एजेंट के रूप में काम कर रही हैं. सोनिया सरकार और उनकी पार्टी तो पूरी तरह उन विदेशी कंपनियों के हित में भारत के हितों को बेचती साफ़-साफ़ नज़र आ रही हैं. वामपंथी और भाजपा भी न्यूनाधिक इन विदेशी व्यापारियों के हित में खड़े नज़र आते हैं.
    उम्मीद की किरण केवल स्वामी रामदेव, आर्ट ऑफ़ लीविंग, गोविन्दाचार्य तथा सैंकड़ों- हज़ारों छोटे-छोटे प्रयास हैं जो एक दिन मिल कर एक हो जाने के आसार साफ़ नज़र आ रहे हैं. अतः कोरी बातें नहीं बनानी हों तो हम में से प्रत्येक को अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ करते जाना होगा. हम सब विश्वास के साथ एक बार शुरुआत करें, कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो सके. हम कर सकते हैं, हम कर डालेंगे. फिर समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो.

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  7. NK Thakur

    महंगाई सरकार की नीति से घटती बढती है / आयत – निर्यात, कराधान, सब सरकार के नियंत्रण में है / भारत के इतिहास में जितना टैक्स यह सरकार ले रही है उतना कभी नहीं लिया गया / हर कदम ,हर चीज ,हर सेवा में , हर जगह , हर बार ,टैक्स लेती है ये सरकार / भाव तो बढ़ेंगे ही / सरकार ने बताया था की इस साल भरपूर फसल हुई है , उत्पादन में वृद्धि हुई है फिर सामान के भाव क्यों बढे ? सरकार के लोग ही भ्रष्टाचार कर रहे है / कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक सिक्के के दो पहलू है / जब भी कांग्रेस की सरकार होती है भाव बढ़ते है , कालाबाजारी होती है / भाव कम करने की कांग्रेस की नीति है भाव 10 / रु. बढ़ा दो फिर जनता की मांग पर २/ रु. कम कर दो और कहो भाव कम हो गया / अभी प्याज का भाव पहले 25 / – 30 / रु. किलो था , फिर 80 / रु, किलो हो गया अब कांग्रेस उसे 35 /रु. से 40 / रु. करवा कर हल्ला करेगी की भाव कम हो गया / कालाबाजारी सरकार के लोग ही कर रहे है / नियंत्रण में 3-4 maah lag jayenge हो gai kamai ?

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  8. shishir chandra

    महंगाई एक बड़ी चिंता की बात है. इस सरकार का नियंत्रण प्रधानमंत्री के हाथ में न होना भी इस समस्या को भयावह बना देता है. क्योंकि सभी मंत्री बेलगाम हैं. सामूहिक जिम्मेदारी का अभाव होने से समस्या अपने आप सुलझने के आलावा बहुत कम आसार हैं. वास्तव में दोष सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि mandate का है. जो mandate इस सरकार को जनता से मिला है, वो कुछ ऐसी ही सरकार के लिए है, जनता ने मनमोहन सिंह को mandate दिया जिसका रिमोट सोनिया गाँधी के हाथ में है और सोनिया किसी भी निर्णय के लिए पूर्ण रूप से सलाहकारों पर निर्भर करतीं हैं. आशा करता हूँ की सलाहकार सोनिया मैडम को सही सलाह देंगे. सोनिया मैडम को सोच समझकर सलाहकार रखना चाहिए, जिससे देश सुचारू रूप से चल सके. आखिर जनता भी तो कुछ ऐसी ही व्यवस्था चाहती है?
    सोनिया के अलावा भी इस देश को चलने वाले हैं. ममता बेनर्जी, करुनानिधि आदि. जो सोनिया के बस में नहीं हैं. उन्हें भी सोनिया जी को साधना है.
    इस महंगाई के लिए जनता भी तो कम दोषी नहीं है. भूमंडलीकरण के दौर में जब सारे संसार में मुद्रा स्फीति बढ़ रही है तो अकेले भारत से उम्मीद करना ठीक नहीं होगा की वो महंगाई पर लगाम कास सके. संसाधन बढ़ने के लिए इमानदार प्रयास नहीं हुए. जनसँख्या विस्फोट को रोकने के लिए जनता में इच्छा शक्ति का अभाव साफ झलकता है. आखिर इतनी बड़ी आबादी और इसकी बढ़ी हुई जरूरतों के हिसाब से महंगाई तो बढ़ना ही है. इसके लिए क्रय शक्ति बढ़ाना होगा. एक तबके का क्रय शक्ति बढ़ गया है जिसने महंगाई को बढ़ावा दिया है. लेकिन सामान्य आदमी अभी भी वहीँ के वहीँ है. इसलिए वह दुखी हो रहा है. महंगाई मांग और आपूर्ति के नियमों से संचालित होती है न की जनता और सरकार की इच्छाशक्ति से.
    यह महंगाई काबू में आना उतना आसान भी नहीं है. अन्यथा तानाशाह सरकारें कब की महंगाई को काबू में कर ली होतीं. जिम्बाब्वे, रूस आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. इसके अलावा रही सही कसर मनमोहन सिंह की कमजोर सरकार पूरी कर देती है.
    इस महंगाई को कृत्रिम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इतने लम्बे समय तक कृत्रिम महंगाई सामान्यतया नहीं चला करती. हाँ यदि जमाखोरों, कालाबाजारियों, मुनाफाखोरों पर सक्त कार्यवाही की जाए तो महंगाई की मार कम हो सकती है. इसके अलावा सरकार की आर्थिक नीतियां भी महंगाई को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं.
    पिछले समय में गन्ना के समर्थन मूल्य के मामलें में सरकार किरकिरी करा चुकी है. सरकार को महंगाई रोकने के लिए खाद्य पदार्थों के निर्यात पर तुरंत प्रभाव से पाबंदी लगा देनी चाहिए. बढे हुए रेट का फ़ायदा सिर्फ bichauliyon को milta है ya phir utpadak को dekhne wali बात है, क्योंकि सामान्यतया महंगाई से bichauliye ही fayde में rahte हैं.

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  9. S K Mishra

    we know that inflation is the situation when agregate demand is greater than aggregate supply. But india inflation cause is corruption and dishonesty of government as well as citizen.

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  10. DEVENDRA G. HOLKAR

    orZeku dh dkaxszl ljdkj dks xjhcksa ls dksbZ ysuk nsuk ugha jgk A ftl xfr ls eagxkbZ c<+ jgh gS mruh gh xfr ls vijk/k c<+ jgs gSa] D;ksafd xjhc dc rd Hkw[kk jgs vkSj vius ifjokj dks Hkw[kk j[ksa \ tc og gj izdkj ls gkj tkrk gS rks mlds dne vijk/k txr dh vksj eqM+ tkrs gS A ;fn ljdkj oLrqvksa dh dhersa vke vkneh dh dz; ‘’kfDr ds Hkhrj dj nsa rks fuf’pr :i ls vijk/k de gksaxs A fujarj c<+rs vijk/k ds fy;s eagxkbZ vkSj eagxkbZ c<+kus ds fy;s dkaxszl mRrjnk;h gS A

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  11. mazharuddeen khan

    Aaj mahangai ko lekar hai tauba macha hua hai. Oposition mahangai ko lekar upa govt. par hamla kar raha hai. Mahangai ke liye na upa jimmedar hai aur na hi other parties. Iske liye sabhi log jimmedar hain. mahangai rokne ke liye hamen govt. ka saath dena chahiye aur jamakhoron ko pakadne me help karni chahiye. Govt. Ko bhi mahangai rokne ke liye kade kadam uthane honge. akaal aur mahangai ka choli daman ka saath hai. anaj kam paida hone par ka asar bazar par padega aur mahangai badhegi

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  12. अशोक बजाज

    अशोक बजाज रायपुर

    महंगाई डायन खाय जात है………0 इन दिनो फिल्म “ पिपली (लाईव) ” का यह गीत खूब चल पड़ा है ठीक वैसे ही जैसे कि पिछले एक दो वर्षो से “ सास गारी देवे …… ” वाला गीत चल रहा है । फिल्म “ पिपली (लाईव) ” का भविष्य तो मै नही जानता शायद आक्टोपस पॅाल बाबा ही बता पाएंगे लेकिन इतना तय है कि यह गीत जरूर हीट हो जायेगा । गायक श्री रघुवीर यादव एवं उनकी मंडली को इस गीत से प्रसिध्दि तो मिल ही रही है। उपर से स्वर कोकिला लता मंगेश्कर ने इस गीत की तारीफ करके सोने में सुहागा कर दिया है।
    इस गीत में “ महंगाई ” जैसे ज्वलंत मुद्दे को शामिल किया गया है । वास्तव में यह गीत आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति है । आज हर व्यक्ति मंहगाई से ग्रस्त है। निम्न व मघ्यम वर्ग के लोगो का तो बड़ा बूरा हाल है । इस गीत में आम आदमी की दशा का चिन्तन बहुत ही खूबसूरत ढंग से किया गया है।“ और आगे का कहूं, कहे नही जात है. महंगाई डायन खाय जात है ……….. ”

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    • atmaram yadav

      सरकार की जनहितैसी नीतियों की बातें बेमानी हो गई है. सरकार अब पूरी तरह एक व्यवसाई बनकर लाभ का कारोवार चाहती है. यही कारण है देश मे लाखो लोग दो जून की रोटी को मोहताज है किन्तु सरकार इनके कल्याण के लिए संचालित योजनायो मे भी जनता से कर के रूप मे मिले पैसो का खुलकर दुरूपयोग कर भ्रस्टाचार को पोषित कर रही है. देश मे लाखो टन गेहू सड़ रहा है..समर्थन मूल्य पर १२८५ रुपिये मे एक कुन्टल गेहू ख़रीदा जाकर उसके रखरखाव पर १००० रुपये खर्च किया जाना फिर उक्त २२८५ रूपये प्रति कुन्टल के गेहू को चुनाबो मैं किये वायदे के अनुसार गरीवो को ३००&७०० रूपये प्रति कुन्टल वितरण कर १५०० प्रति कुन्टल का नुकसान उठाना कहाँ की समजदारी है , इस प्रकार अनेक कारण है जिससे यह महगाई वेलगाम हो गई है. नेता और अधिकारी सारे काम खरीददारी. आने जाने हेतु वाहन सुबिधाये ,खाना पीना,रहने व घरेलु नोकर की सुबिधायें मुप्त मे पा रहा है इसलिए उसे महगाई बदने से कोई अंतर नहीं पड़ता है और आखिर मे मारा जाता है आमजन.

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  13. Abdul Rashid (Journalist)

    ऊँगली उठाना बहूत आसान सा तरीका है लेकिन सच्चाई का सामना करना बेहद मुश्किल होता है केवल बातो से समस्सया का समाधान नहीं हो सकता है क्योंकि सबदवीरता से देश नहीं चलती देश को चलने के लिए कर्मवीरता की आवश्यकता होती है ईमानदारी से हरकोई अपने दिल से पूछे तो समस्या का समाधान अपने आप निकल आये लेकिन हमको तो पेट्रोल ३० रुपया का ही मिले तो अछ्छा होगा भले हम ईमानदारी से टैक्स भरे या नहीं भले सरकार ३० का पेट्रोल १०० में ख़रीदे हमको क्या पड़ी है हमे तो सिर्फ सरकार को दोषी ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से आंख मूंद लेना है क्या यह तरीका ठीक है शायद नहीं.कमसेकम हम जैसे कलम के शीपाही को तो यह बात शोभा नहीं देता हमारी जिम्मेदारी है के हम देश के हरेक पहलू को राजनीती से अप्रभावीत होकर कहें और आधे अधूरे सच्चाई को पेश करने से परहेज करे क्योंकि महाभारत में आधे सच्चाई ने दोर्नाचार्य जैसे गुरु को नील गया जबकि उसवक्त इतना संचार का साधन नहीं था लेकिन आज आधे सच्चाई से लाखो लोग परभावीत हो सकते हैं ऐसे हालात में हमारी जिम्मेवारी और भी बढ़ जाती है के हम गंभीर विषय पर निष्पक्ष व इमानदार हो कर चर्चा करें. jai hind

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  14. Nagendra pathak

    महंगाई के लिए सरकार पूरी तरह से जिम्मेवार है | सच पूछिये तो सरकार हीं चाहती है कि महंगाई बढती रहे और उनके संपर्क में रहने वाले उद्योग घराने को इसका फायदा होता रहे जो सरकार के आगे कुछ टुकड़े फेंकते रहें | जनता भी दोसी है महंगाई के लिए | वह क्यों नहीं एक साथ सड़क पर आ जाती है ? अब तो हालत ऐसी है कि बीमार पड़ना भी एक अपराध या विलासिता है जिस पर सरकार टैक्स लगा कर पुण्य का काम कर रही है | महंगाई मानसून की भांति हमें हर तरफ से घेर रही है और हम असहाय की भांति इसे झेलने को विवास हैं |

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  15. आर. सिंह

    R.Singh

    Maine kabhi kahaa tha aur aaj bhi kahta hoon ki na samyabaad,na samajbaad aur na baajaarbaad ,sab buraiyon ki jad hai to kewal C yani corruption yani bharaastachaar baad. Bharaastachaar ko hataa dijiye,sabkuchh apne aap theek ho jayega. Par laakh take ka sawaal hai ki yah hogaa kaise?

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ.मधुसूदन उवाच

      R.Singh धन्यवाद। आप ठीक ही कहते हैं।
      सभी समस्याओं की जड भ्रष्टाचार ही है।
      प्रवक्ता से अनुरोध, कि, भ्रष्टाचार को किस विधि घटाया, या समाप्त किया जा सकता है? इस पर परिचर्चा करवाएं।
      बहुत ही चमत्कार भरा, इतिहास जो हमारे सामने घट रहा है, वह है, “गुजरातमें नरेंद्र मोदी का भ्रष्टाचार रहित शासन”। मोदी जी ने बहुत विकराल भ्रष्टाचारको किस विधि नाथा? यह एक शोधका विषय हो सकता है। इस भ्रष्टाचार के राक्षसको नियंत्रित और इसका अंत किए बिना भारतका उत्थान संभव नहीं।
      चर्चा “भ्रष्टाचारका अंत कैसे करे?” इस पर हो। भ्रष्टाचार का वर्णन सभी को न्य़ूनाधिक मात्रा में पता है।
      ***** अवनतिका मूल है, भ्रष्टाचार,अंत कैसे करे?****प्रवक्ता का यह एक अच्छा योगदान होगा।
      संजीव जी इस पर विचार करें।

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  16. Biswanath Jena

    महंगाई बढ़ने का कई कारण है, आम जनता ही इस की मुख्य कारण है , लोग सुरु से महंगाई को स्वीकार कर ली है नतीजन सर्कार भी लापरबाहा हो चली है, यहां लोग मरे हुए हैं, महंगाई से बचने केलिए या तो महँगी सामान खरीदारी नहीं करते फिर करतें है तो कम, जिसका सीधा फ़ायदा मुनाफाखरों के जेब में जाता है, आब एक ही रास्ता है संप्रग की प्रगति की रहा स्वीकारतें है कम खातें हैं जायदा सोतें है. जब इलेक्शन होगी तब जगतें है अब बहस से कोई काम नहीं

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  17. alam

    गरीब की कमर तोड़ डाली
    तेल के दाम बढे तो भाडा बढेगा, भाड़ा बढेगा तो आवश्यक खाने-पीने की वस्तुओं के दाम जो पहले से आसमान छूं रहे है और महंगे हो जायेंगे . कहीं आना जाना और महंगा हो जाएगा , घर में रसोई जलाना महँगा हो जाएगा यानी सब तरफ से मार गरीब पर जो पहले से ही अधमरा पडा है. हे भगवान्, हे अल्लाह , हे इश्वर , हे वाहे गुरु रहम कर इस देश के गरीब पर और श्त्यानाश कर इन सत्ता में बैठ भ्रष्ट देश के धुश्मनो का, सत्यानाश हो इस बेशर्म मनमोहन और नेहरु खानदान का, सत्यानाश हो उनका जो इन्हें वोट देकर इस तरह गरीबों पर अत्याचार करने की छूट देते हो, सत्यानाश हो इन कांग्रेसियों का जो फूट डालकर अपनी रोटिया सकने में लगे है , सत्यानाश हो इन भाजपा वालों को जो साले ढोंगी पहले खुद थूकते है और फिर खुद ही चाटते भी है, सत्यानाश हो इन वामपंथियों का जो ये पाखंडी सर्वहारा वर्ग के हितैषी बनते है मगर आज तक इन गद्दारों ने एक भी उस अमीर का घर नहीं लूटा जिसने गरीब का पैंसा मारकर अमीर बना , सत्यानाश हो इन समाजवादियों का और इन दलितों के मसीहों का . गरीब की हाय इनको जरूर लगे, यही ऊपर वाले से प्रार्थना है .

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  18. sanjay

    आम आदमी के लिए न सरकार है न कोई भारत में अरव पतिओ की संख्या तो बढ़ रही किन्तु गरीबो की संख्या भी उसी रफ़्तार से बढ़ रही है. डीज़ल और केरोसिन का मूल्य बढाकर सोनिया नियंत्रित भारत सरकार ने सावित कर दिया की कांग्रेस का खून है जिसने २५००० लोगो को मौत का मुख्य आरोपी एन्दसान को भारत से भागकर पूंजीपतियो को पनाह दिया था अगर देश के गरीव जनता मर ही जायेंगे तो क्या होगा

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  19. तिलक राज रेलन

    तिलक

    कृपया मेरी टिप्पणी उन लोगों के सन्दर्भ में देखी जाये जो महंगाई के विषय की चर्चा की दिशा बदलना चाहते हैं. सीधे सीधे कांग्रेस का समर्थन कर नहीं सकते विरोध करना चाहते नहीं. सन्दर्भ मिट जाने से अर्थ बदल गया क्षमा चाहता हूँ ? सन्दर्भ के साथ ही देखा जाये समझ आयेगा.

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  20. तिलक राज रेलन

    तिलक

    देश की जनता महंगाई से त्रस्त है, केंद्र की कांग्रेस के प्रति जनता का आक्रोश उभरे उससे पहले उसका ध्यान कुछ
    बेसिर पैर के मुद्दे के गड़े मुर्दे निकाल कर खड़े करते हुए आक्रोश को भा.ज.पा. विरोध में बदलने की चाल है. इसमें बिकाऊ मीडिया तो शामिल है ही अब ब्लागर्स, वेबसाइट्स, समुदाय, सभी जगह जिनको हड्डी डाल दी गई है हड्डी चूसते उन्हें महंगाई नहीं दिखती या देखना नहीं चाहते. उनके कांग्रेस विरोध की जगह भा.ज.पा. विरोध का यही एक कारण है.
    कांग्रेस का एक ही अजेंडा है इस देश को बर्बाद करना. कुछ लोगों को बिकाऊ मीडिया से भ्रमित कर भा.ज.पा. के विरुद्ध जहर भरके उसका लाभ कांग्रेस को मिलता है 60 साल से देश की हर बुराई का कारण कांग्रेस ही रही है. जिस दिन यह सबकी समझ में आ जायेगा कांग्रेस का पत्ता साफ. सबके साथ हो इंसाफ, हिन्दू हो या मुसलमान, जम्मू व कश्मीर हो या पूर्वोत्तर या कोई भी प्रदेश, एक कानून एक विधान न कोई खास न कोई विशेष. इसमें क्या बुराई है, तथा कांग्रेस में क्या अच्छाई है, कोई मुझे समझाय. जम्मू व कश्मीर भारत का हिस्सा है तो हिन्दुओं से खाली होने का क्या किस्सा है, क्यों 84 के नर-संहार भुलाया है, और मोदी पर गुर्राया है. बाहर वालों को आने दो और घर वालों पर गुर्राओ/ काट खाओ, कोई रोके तो 14 इंजेक्शन लगवाओ. यह कब तक चलेगा समझाओ? तिलक

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  21. लोकेन्द्र सिंह राजपूत

    lokendra

    बहुत मुश्किल है आम आदमी का जीना इस महंगाई में… सही कहूँ तो वक़्त आ गया सरकार बदलने का…

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  22. ghughutibasuti

    स्थिति भयंकर है। और ऐसे में यदि कोई सेवा निवृत हो जाए, बीमार हो जाए या कोई भी समस्या आ जाए तो कंगाली में आटा गीला वाली बात होगी।
    इस सरकार को कितनी चिन्ता है यह तो हम भोपाल पीड़ितों के प्रति उसके रवैये व विदेशियों को सादर सरकारी जहाज में बिठाकर भेजने वाले रवैये को देखकर ही समझ सकते हैं।
    लोग अपनी आवश्यकताओं को कितना सिकोड़ सकते हैं बस यही देखना है।
    घुघूती बासूती

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  23. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    संजीव, तुमने ठीक लिखा है. मई भी एक लंबा लेख लिखने के मूड मे हूँ. अब जो सरकारे आ रही है, उनमे कल्याण की भावना ही नहीं है. वे देश को एक कंपनी की तरह चलाना चाहती है. जबकि देश उदार हो कर चलता है. नुक्सान उठा कर लोगों का फायदा पहुचाने की कोशिश की जाती है. लेकिन आज़ादी के बाद दिखने वाली वो भावना अब तिरोहित हो गयी है. कीमतें आकाश छू रही है. और सरकार की नैतिकता पाताल लोक चली जा रही है/ आम आदमी आखिर जिए तो कैसे. मै इस बात से सहमत हूँ, की संप्रग शासन में मुनाफाखोरी और जमाखोरी अपने चरम पर है। चोरों, लुटेरो, या कहें की धनपशुओ का वर्चस्व बढ़ गया है संसद मे.इसी लिए आम जन की पीड़ा से किसी का कोई लेना देना नहीं. विपक्ष भी विकलांग है. जनता बजबूर है. किसे चुने. ”रागदरबारी” उपन्यास में एक पात्र कहता है, जिसकी दम उठा के देखो, मादा नज़र आता है.

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  24. sunil patel

    संजीव जी ने बहुत अच्छा विषय उठाया है.
    आज सबसे ज्वलंत मुद्दा है महंगाई. यह ठीक है के संप्रग शासन उच्च वर्गों के हित को ही देख रही है क्योंकि इसके अधिकतर नेता जमीन से बहुत ऊपर है, जिन्हें यह नहीं पता है की गुड तेल किलो या लीटर में मिलता है. मुनाफाखोरी और जमा खोरी चरम पर है. यह किसी सर्कार के निम्नतर स्तर है.

    किन्तु महंगाई का सबसे बड़ा कारण सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार है. सरकारी भ्रष्ट है, सरकारी नौकर भ्रष्ट है, ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का बयार बह रही है. लोग आख मूच कर वोट दे रहे है. सौ विद्वानों के वोट सौ अनपढ़ वोटो के सामान है. एक अपना आगे का फायदा देख कर देता है दूसरा तुरंत के लालच में देता है.

    जब हमारी शिक्षा व्यवस्था में स्वाभिमान की कमी है. जब सच्चा इतिहास नहीं पढाया / बताया जायेगा तो खून में उबाल कहाँ से आएगा. जब स्वाभिमान ही नहीं होगा तो नेतिकता तो थोड़ी और दूर की बात है.

    संजीव जी इसी तरह गंभीर विषेय उठाते रहिये. धयवाद.

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  25. pushkar

    mahangai ke karan sthitiyan bhayavah hoti ja rahi hai……..aaj aadhi raat se petrol, diesal lpg ki daren badh jayengi……lagta hai is sarkar ko keematen badhane ka chaska lag gaya hai……aam aadmi ki samashayon se sarkar ne aankhen moond li hai……

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  26. Dr. Purushottam Meena

    आपका कहना है-

    महंगाई बढने का सिर्फ एक कारण है कि संप्रग शासन में मुनाफाखोरी और जमाखोरी अपने चरम पर है। आपका क्‍या कहना है ?

    यह अधूरा सत्य है, हर दल और पार्टी की सरकार भ्रष्ट है और भ्रष्टाचार ही परिणाम है-मुनाफाखोरी और जमाखोरी है. जब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी कोई भी सरकार हो, आम इन्सान सिर्फ रो ही सकता है. आज मीडिया और न्यायपालिका तक बीके हुए है. सबके सब भ्रष्ट हैं! आम जनता चाहती है, उसकी लड़ाई कोई और लड़े, अन्यथा जनता के सामने कौन टिक सकता है?

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
    राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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  27. सुमित कर्ण

    San

    You are right Sir,Its sounds incredible, but it is not. The government that came to power promising to ”enhance the welfare and well-being of farmers, farm labour and workers, particularly those in the unorganised sector and assure a secure future for their families in every respect” is now choosing to attack one of the most basic requirements for existence of these groups, access to adequate nutrition.

    The UPA government’s decision to cut the food subsidy by reducing the quantity of wheat and rice issued through the PDS and Antyodaya Anna Yojana is appalling on all counts. According to this measure, the most vulnerable households in the country, who are entitled to receive some food grain at lower more subsidised prices, will now receive 5 kg less of food grain per month.

    And this snatching of food from the mouths of millions of infants and destitute people is expected to yield ”saved resources” to the tune of Rs. 4524 crores – around the same as the amount that was given up by this same government last year when it chose to do away completely with the capital gains tax. Clearly, the government feels that domestic and foreign financial speculators on the stock market are more in need of public support than Antyodaya households, who are defined as the poorest of the poor.

    Yet this was not the declared perception of the government a year ago. The National Common Minimum Programme of the UPA government explicitly promised a comprehensive medium-term strategy for food and nutrition security. It went even further, promising that ”the objective will be to move towards universal food security over time, if found feasible. The UPA government will strengthen the public distribution system (PDS) particularly in the poorest and backward blocks of the country… Special schemes to reach foodgrains to the most destitute and infirm will be launched. Grain banks in chronically food-scarce areas will be established. Antyodaya cards for all households at risk of hunger will be introduced.”

    There was a reason for making such promises: the evidence of falling food consumption norms among most of the population and widespread and in some places worsening nutritional deficiencies. Per capita food-grain consumption declined from 476 grams per day in 1990 to only 418 grams per day in 2001, and even aggregate calorific consumption per capita declined from just over 2200 calories per day in 1987-1988 to around 2150 in 1999-2000.

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  28. VIJAY SONI ADVOCATE

    पूंजीपतियों और अमीरों की इस सरकार की नीतियों के आगे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जी भी लाचार बेबस हो गए हैं,भ्रस्टाचार,जमाखोरी,मुनाफाखोरी में लिप्त लोगों के खिलाफ कदम उठाना इस सरकार के बस का काम नहीं है,ये कार्य केवल भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही कर सकती है ,जब भी यह दल सरकार में आया है देश की जनता को याद है की महंगाई काबू में हमेशा रही है,आज तो अर्थशाष्त्री प्रधानमंत्री जी ने आम आदमी का पूरा अर्थ तंत्र ही पेट्रोल ,डीजल और गैस के भाव बढा कर चौपट कर दिया है…VIJAY SONI ADVOCATE DURG CHHATISGARH

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  29. विकास सैनी

    किसी भी सरकार का प्राथमिक दायित्‍व यह सुनिश्चित करना होता है कि लोगों की बुनियादें जरूरते पूरी हों। लेकिन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के शासन में गत छह वर्ष से महंगाई में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। दो वक्‍त का भोजन जुटाने में लोगों के पसीने छूट रहे हैं। कांग्रेस अध्‍यक्षा सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी, अर्थशास्‍त्री मनमोहन सिंह केवल खास आदमी के हितों को तव्‍वजों दे रहे हैं और आम आदमी को ठेंगा दिखा रहे हैं। जो सरकार आम आदमी के जीने का लोकतांत्रिक अधिकार छीन रही है, उसे सरकार सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

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