लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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महाराष्ट्र की राजधानी तथा देश की गौरवशाली औद्योगिक महानगरी मुंबई को लेकर देश में घमासान मचा हुआ है। महाराष्ट्र राज्य की सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाने की होड़ में जहां शिव सेना तथा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) कथित घोर एवं कट्टर मराठावाद को लेकर एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं वहीं ठाकरे परिवार की इस स्वार्थ पूर्ण राजनैतिक महत्वाकांक्षा के परिणामस्वरूप एक बार फिर देश के टूटने का ख़तरा बढ़ता दिखाई देने लगा है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे इस विषय पर सीधे तौर से अपने विचार भी व्यक्त कर चुके हैं। हालांकि मराठों के प्रति हमदर्दी का ढोंग करने वाले ठाकरे ख़ानदान से यह सवाल भी किया जा रहा है कि स्वयं उत्तर भारत के मध्य प्रदेश राज्य से अपना पुश्तैनी सम्बंध रखने वाला ठाकरे परिवार अचानक मराठों का क्षत्रप कैसे बन बैठा। साथ साथ यह प्रश् भी उठ रहा है कि देश को तोड़ने की कोशिश में लगे बाल ठाकरे को इस योग्य बनाने में तथा राजनैतिक रूप से उनके कद को और ऊंचा करने में कौन-कौन सी शक्तियां ठाकरे की सहायक रही हैं।

सूत्रों के अनुसार बाल ठाकरे 1960 के आसपास के समय में अखबारों में अपने द्वारा बनाए गए कार्टून प्रकाशित कराया करते थे। इसी राह पर चलते चलते उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी। पत्रकारिता करते हुए ठाकरे की नजरें इस विषय पर जा टिकीं कि मुंबई में होटलों, ढाबों, जैसे स्थानों पर कितने लोग और किन-किन राज्यों के लोग काम करते हैं। सर्वप्रथम उन्होंने दक्षिण भारतीयों की एक सूची बनाई तथा उनके विरूद्ध मराठा लोगों को नफरत का पाठ पढ़ाना शुरू किया। मजे क़ी बात तो यह है कि यह ठाकरे परिवार स्वयं को खांटी हिंदुत्व का भी अलमबरदार बताता रहा और साथ ही साथ मराठावाद के परचम को भी उठाए रखा। ग़ैर मराठा का मुंबई में विरोध करते-करते ठाकरे ने मुंबई में सांप्रदायिकता का भी पोषण करना शुरु कर दिया। और फलती-फूलती खुशहाल मुंबई को सांप्रदायिकता का केंद्र बना डाला। सांप्रदायिक नंफरत की यह आग कई बार मुंबई व महाराष्ट्र के अन्य कई शहरों को अपनी चपेट में ले चुकी है। अब यही बाल ठाकरे व उनकी गोद में पले भतीजे राज ठाकरे अपने हिंदुत्ववादी केंचुल को फेंक कर उत्तर भारतीयों के विरुद्ध भी उठ खड़े हुए।

सवाल यह है कि बाल ठाकरे को एक कार्टूनिस्ट से मातोश्री अर्थात् शिवसेना प्रमुख के मुख्य कार्यालय तक पहुंचाने में तथा उसे इतना शक्तिशाली बनाने में किन शक्तियों ने उसका साथ दिया। शिवसेना कभी भी पूर्ण बहुमत के साथ राज्य विधानसभा के चुनाव नहीं जीती। इसने हमेशा भाजपा से ही समझौता किया। चाहे शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव लड़े हों या राज्य की संसदीय सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हों। यहां तक कि महाराष्ट्र में शिवसेना का मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश की लोकसभा में स्पीकर के पद तक शिवसेना के उम्मीदवारों ने अपनी मंजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। जाहिर है अपने अकेले बलबूते पर न तो शिवसेना राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंच सकती थी न ही उसके सदस्य मनोहर जोशी लोकसभा के अध्यक्ष निर्वाचित हो सकते थे। परंतु देश के इतने महत्वपूर्ण एवं संवैधानिक पदों पर शिवसेना पहुंची। और नि:संदेह उस की सफलता की इस यात्रा में शिवसेना का साथ भारतीय जनता पार्टी ने दिया।

भाजपा को बाल ठाकरे में मराठा प्रेम के साथ-साथ हिंदुत्व के प्रति भी गहरा लगाव दिखाई दे रहा था। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने शिवसेना को एक दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाला अपना हमख्याल संगठन मानते हुए उसके साथ राजनैतिक रिश्ता स्थापित कर लिया। 1990 के दशक में जब भाजपा पूरे देश में अयोध्‍या स्थित विवादित रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुद्दे को हवा देकर देश में सांप्रदायिकता के आधार पर हिंदुत्व की अलख जगा रही थी तथा इसी सांप्रदायिकता के बल पर हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही थी उस समय यही शिवसेना भाजपा के शाना-बशाना साथ-साथ चल रही थी। यहां तक कि 6 दिसंबर 1992 की अयोध्या घटना में भी शिवसेना के कार्यकर्ताओं व नेताओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा भी लिया था। प्रश्न यह है कि क्या उस समय बाल ठाकरे की नीति व नीयत से भाजपा वाकिंफ नहीं थी? या उसने महाराष्ट्र में केवल कांग्रेस का मंजबूत विकल्प बनने हेतु उस बाल ठाकरे की शिवसेना से गठबंधन करना जरूरी समझा जो आज देश को तोड़ने की भाषा सरेआम बोल रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जोकि स्वयं को राष्ट्रवाद का इतना बड़ा पैरोकार बताता है जितना कि शायद कोई दूसरा संगठन या दल दावा नहीं करता वह संघ भी अब बाल ठाकरे के अलगाववादी प्रयासों के विरुद्ध हो गया है। संघ को संभवत: कल तक इसी शिवसेना में हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद दोनों ही विशेषताएं दिखाई देती थीं। परंतु आज जब ठाकरे ने अलगाववाद का ‘फन’ काढ़ कर अपनी वास्तविकता की पहचान कराई है तब संघ ने शिवसेना की आलोचना करने का साहस किया है। संघ शिवसेना के विरुद्ध इस मुद्दे पर अपने मराठा स्वयंसेवकों को किस हद तक अपने साथ जोड़े रख पाने में सफल हो पाता है यह भी शीघ्र ही पता चल जाएगा। परंतु इतना तो जरूर है कि कार्टूनिस्ट ठाकरे को मातोश्री का ‘सेना प्रमुख ठाकरे’ बनाने में तथा मुंबई में एक शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित करने में इसी संघ तथा भाजपा दोनों का ही बराबर का योगदान है।

कहना गलत नहीं होगा कि सांप्रदायिक व सामाजिक हिंसा पर विश्वास करने वाली शिवसेना ने भाजपा से राजनैतिक गठबंधन केवल इसीलिए किया था और आज तक यह गठबंधन फिलहाल कायम भी है क्यों कि दोनों ही संगठन अतिवादी विचारधारा के पक्षधर हैं। दोनों ही संगठन धर्म निरपेक्षता को पानी पी-पी कर कोसते हैं। भाजपा यदि घुमा फिरा कर इस राजनैतिक निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा में लगी रहती है कि भारतवर्ष हिंदुओं का देश है तथा यहां की प्रत्येक संपदा पर केवल हिंदुओं का ही पहला अधिकार है। ठीक इसी प्रकार बाल ठाकरे ने भी अब उसी ढंग की भाषा महाराष्ट्र को लेकर बोलनी शुरु कर दी है। वह भी मुंबई को केवल मराठों की और वह भी हिंदू मराठों की मुंबई बता रहे हैं। अब उनके निशाने पर वही उत्तर भारतीय हैं जिन्होंने दुर्भागयवश कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना था तथा उसी दौरान इन्हीं भाजपा, संघ व विश्व हिंदू परिषद समर्थकों ने शिव सैनिकों को मुंबई से अयोध्या आने का न्यौता दिया था।

उपरोक्त घटनाक्रम कोई आरोप मढ़ने अथवा किसी को बेवजह बदनाम करने के प्रयास जैसी बात नहीं बल्कि 1992 से लेकर मुंबई के आज तक के हालात पर बड़ी ही सूक्ष्मता से नंजर रखने व इसका अध्ययन करने की जरूरत है। आज शिव सेना व मनसे मुंबई में बैठकर पूछ रहे हैं कि ‘देश का कैसा संविधान तो कैसा कानून। मुंबई केवल हमारी है’। यही कहकर ठाकरे परिवार व उनके समर्थक देश के संविधान व कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। याद कीजिए 6 दिसंबर 1992 की घटना तथा उस घटना का संवैधानिक तथा वैधानिक पहलू। और उस घटना को अंजाम देने वाले पात्रों के चेहरे। तब भी देश के एक सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह ने अयोध्या के विवादित स्थल की रक्षा के लिए झूठा हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल किया था। और उसके बावजूद अपनी सत्ता, अपनी पुलिस और अपने ही द्वारा निमंत्रित भीड़ के बलबूते पर विवादित ढांचे को कुछ इस अंदांज में गिराया था गोया देश में न कोई संविधान है, ना कोई कानून, न कोई निर्वाचित सरकार और न ही मुख्यमंत्री की कोई जिम्मेदारी। और उस समय यही सभी शक्तियां एक स्वर में कह रही थीं कि ‘अयोध्या मुद्दा देश के हिंदुओं की भावनाओं से जुड़ा हुआ मुद्दा है, कानून संविधान से इसका समाधान नहीं हो सकता । उस समय यही ठाकरे साहब इन्हीं ‘राष्ट्रवादी शक्तियों’ के साथ-साथ चल रहे थे।

आज ठाकरे ठीक उसी अंदांज में फरमा रहे हैं कि मुंबई मराठों की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है। और वे भी वैसे ही संविधान व कानून को ठेंगा दिखाने को तत्पर बैठे हैं जैसे कि पहले कभी उनकी सहयोगी तथा स्वयं को राष्ट्रभक्त, राष्ट्रवादी और न जाने क्या-क्या बताने वाली शक्तियों ने दिखाया था। देश में ठाकरे सरीखी और भी कई शक्तियां व संगठन ऐसे हैं जिनसे इन तथाकथित राष्ट्रवादियों के सुर मिलते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि कल वे भी ठाकरे की ही तरह उनसे प्रेरणा लेते हुए यही भाषा बोलने लग जाएं कि यह तो हमारे राज्य से जुड़ा हमारे राज्य के लोगों की भावनाओं का मामला है। ऐसे में उन वास्तविक राष्ट्रभक्तों का क्या होगा जो राज्य से पहले तथा धर्म जाति व क्षेत्र आदि के सीमित व संकुचित बंधनों से भी पहले केवल और केवल राष्ट्रवाद व राष्ट्रीयता को सर्वोपरि मानते हैं तथा उन्हें सर्वोच्च समझते हैं।

बेशक दक्षिणपंथी शक्तियां स्वयं को कांग्रेस का विकल्‍प प्रमाणित करने के प्रयास में यहां-वहां क्षेत्रीय हितों का पोषण करने वाले राजनैतिक दलों से समझौता अवश्य करती हैं परंतु आज जिस प्रकार देश की जनता ठाकरे परिवार के साथ पूरी सख्ती न बरतने के लिए कांग्रेस को संदेह की नंजरों से देख रही है ठीक उसी प्रकार यही जनता उन ताकतों को भी कभी माफ नहीं करेगी जो ढोंग तो राष्ट्रीयता का करते फिरते हैं परंतु इन्हीं की संगत व सहयोग से देश में और भी कई दुर्योधन तैयार किए जा रहे हैं।

-तनवीर जाफरी

3 Responses to “राष्ट्र विभाजक ‘दुर्योधनों’ को किसने बनाया शक्तिशाली?”

  1. Mayank Verma

    एक जानवर भी अपने बच्चों की रक्षा करता है एवं उनके हितों के बारे मैं सोचता है, एक पक्षी भी, एक बाप भी, एक परिवार का मुखिया भी, एक कुटुंब का मुखिया भी, एक गाँव का मुखिया भी, एक ब्लॉक का, एक जिले का प्रदेश का एवं राष्ट्र का मुखिया भी, एक पार्टी का मुखिया भी अपने वोट बैंक( वास्तव मैं जिनके हितों की वो रक्षा करता है ) के बारे मैं सोचेगा. वैसे आप किससे हमदर्दी रखते हैं. यह आपको बताने की जरूरत नहीं है.

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  2. sadhak ummed singh baid

    सुनें जाफ़री आपका, सही नहीं निष्कर्ष.
    फ़िर भी सच है बात में, आओ करें विमर्ष.
    आओ करें विमर्ष, भ्रमित जब सारे व्यक्ति.
    कोई भी तो सही नहीं है, समाज-व्यक्ति!
    कह साधक कविराय, बात है बहुत आकरी.
    सही नहीं निष्कर्ष, आपका सुनें जाफ़री.
    sahiasha.wordpress.com

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  3. डॉ. मधुसूदन

    Dr. madhusudan uvach

    राजनीति में गठजोड़ ऐसे ही हुआ करते हैं| यदि आप सारे बिन्दुओंपर समानता चाहे?, तो फिर अलग पार्टियाँ क्यों हो? उनकी आवश्यकता ही नहीं| और यह आशा, की समय के साथ, और भाजपाके संग, शायद, शिवसेना में भी बदलाव आएगा, यह संघकी, या भाजपा की अपेक्षा भी नकारी नहीं जा सकती| मोहनजी भागवतके भाषण अनुसार, संघ तो इस्लाम पंथियोंसे भी राष्ट्रीयता की अपेक्षा(बदलाव) कर रहा है| संघ तो उत्क्रान्तिशिलता का परिचय १९२५ से लेकर आज तक देते आया है| इस गठजोड़ के इतिहासको मैं इसी अर्थसे पढ़ता हूँ| आपने जो निष्कर्ष निकाला है, मेरी मान्यता में सही नहीं|

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