“श्रीकृष्ण के चरित्र को दूषित करने वाली भागवत पुराण की मिथ्या बातों को न मानें : आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री”

मनमोहन कुमार आर्य

आर्यसमाज हिण्डोन सिटी में रविवार 2 सितम्बर, 2018 को श्री कृष्ण-जन्माष्टमी पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः चार दम्पत्तियों को यजुर्वेद पारायण यज्ञ के समापन दिवस पर यज्ञ का यजमान बनाया गया। इन यजमान दम्पत्तियों के पुंसवन संस्कार भी सम्पन्न किये गये। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद यज्ञ प्रार्थना हुई। इसके बाद भजन तथा कुछ प्रमुख लोगों का सम्मान किया गया। यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी का योगेश्वर श्रीकृष्ण जी के जीवन पर व्याख्यान हुआ। व्याख्यान से पूर्व बहिन प्रियंका जी ने एक मधुर एवं प्रभावशाली भजन गाया जिसके बोल थे किसने फूल खिलायें हैं श्मशानों में, वो कोई और नहीं है आर्यसमाज है। किसने लावारिस लाशों को कफन दिये? किसने विश्व जनों को हवन दिया? किसने पाखण्डों को चकनाचूर किया? किसने सूनी माताओं को सिन्दूर दिया? वो और कोई नहीं है आर्यसमाज है। इस भजन के बाद आचार्य जी ने अपना प्रवचन आरम्भ करते हुए कहा कि आप जो कार्य करते हैं उसकी परीक्षा किया करें कि आप उसे और अच्छा व सफल किस प्रकार से कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम 24 घंटे ऋषि के उद्देश्य व पथ पर चल रहे हैं जिसका उद्देश्य है कृण्वन्तो विश्मार्यम् एक आर्यसमाज ही ऋषि दयानन्द का ध्वज फहराने में सक्षम है। आचार्य जी ने कहा कि 4,500 आर्यसमाजें मेरे प्रदेश में हैं। यदि यह सभी आर्यसमाजें प्रचार प्रसार में समर्पित हो जायें तो सारा देश भगवा नजर आये।आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने कहा कि जो व्यक्ति आर्यसमाज, ऋषि दयानन्द व राष्ट्र के लिये कुछ काम करना चाहते हैं, वह मुझसे व्यक्तिगत सम्पर्क करें। मेरे पास उनके लिये बहुत योजनायें हैं। आचार्य जी ने कहा जिस व्यक्ति ने योजना बनाकर काम किया और सफल हुए, उस महापुरुष का नाम है योगेश्वर श्रीकृष्ण। श्रीकृष्ण जी का आर्यों व हिन्दुओं ने उचित रीति से प्रचार प्रसार नहीं किया। योगेश्वर श्रीकृष्ण के बारे में बहुत सा गलत प्रचार हुआ है। आचार्यजी ने कहा है कि लोगों ने श्रीकृष्ण जी पर अप्रामाणिक अनेक जाल ग्रन्थों की भी रचना की है। भागवत पुराण श्रीकृष्ण जी जैसे महान पुरुष के विषय में सबसे अधिक गलत प्रचार करने वाला ग्रन्थ है। आचार्य जी ने श्रोताओं को केवल प्रामाणिक ग्रन्थ ही पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने भागवत पुराण से कुछ उदाहरण भी दिए और कहा कि भागवत पुराण में राजा परीक्षित की कथा आती है। राजा परीक्षित के बारे में उसमें भविष्य वाणी का उल्लेख है कि उसे सांप डस लेगा। इस कारण वह राजपाठ छोड़कर वन में साधना करने चला गया। वहां उसने सुखदेव जी के उपदेश सुने व सत्संग किया जिससे वह तर गया। आचार्य जी ने कहा कि महाभारत में भी सुखदेव जी का उल्लेख है। महाभारत के वर्णन के अनुसार तो उनका महाभारत युद्ध से पूर्व ही निर्वाण हो चुका था। महाभारत में युधिष्ठिर जी भीष्म पितामह से सुखदेव जी के विषय जानने की इच्छा करते हैं। आचार्य जी ने श्रोताओं से पूछा कि जब सुखदेव जी युधिष्ठिर जी से बहुत पहले मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे तो उन्होंने युधिष्ठिर के नाती राजा परीक्षित को कथा कैसे सुनाई?आचार्य जी ने महर्षि दयानन्द जी के श्रीकृष्ण जी के प्रशंनीय चरित्र को दूषित करने वाले भागवत पुराण के प्रति कहे शब्दों को प्रस्तुत किया। ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि यदि भागवत पुराण का कर्ता अपनी मां के गर्भ में ही मर गया होता तो कृष्ण जैसे महापुरुष पर मिथ्या दोष नहीं लगते। आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित महाभारत के 6 खण्डों की चर्चा की और कहा कि श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने महाभारत का एक जिल्द में ही प्रकाशन किया है। यह शुद्ध महाभारत है जो प्रक्षेपों से मुक्त एवं श्रीकृष्ण जी के विषय में मिथ्या वचनों से रहित है। आचार्य जी ने आगे कहा कि गीता प्रेस से 6 खण्डों में जो महाभारत प्रकाशित किया जाता है, वह महर्षि व्यास जी ने नहीं लिखा था। उन्होंने कहा कि व्यास जी ने ‘‘जय नाम छोटा ग्रन्थ बनाया था जिसमें मात्र 4,500 श्लोक थे। व्यास जी के शिष्यों ने इस मूल ग्रन्थ का विस्तार करके पहले इसके 8,000 और फिर 24,000 श्लोक कर दिये। इसका नाम भी जय से बदल कर भारत कर दिया। श्लोक वृद्धि का क्रम रूका नहीं और यह बढ़ते-बढ़ते एक लाख श्लोक हो गये और इसका नाम भी भारत से महाभारत हो गया। आाचार्य जी ने कहा कि महाभारत को विवेकपूर्वक पढ़ना चाहिये। ऋषि दयानन्द के पूना प्रवचनों के संग्रह ‘उपदेश मंजरी; को पढ़ने की भी विद्वान आचार्य ने सलाह दी। आचार्य जी ने कहा कि महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में श्रीकृष्ण आप्त पुरुष थे। श्रीकृष्ण जी ने अपने जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त कोई गलत काम नहीं किया था। आचार्य जी ने युधिष्ठिर जी के राजसूय यज्ञ की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि भीष्म पितामह ने राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण जी का नाम सबसे अग्रणीय पुरुष के रूप में सबके द्वारा उनका सम्मान किये जाने के लिए प्रस्तुत किया था। द्रोणाचार्य जी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। शिशुपाल की चर्चा कर आचार्य जी ने कहा कि शिशुपाल श्री कृष्ण का धुर विरोथी था। उसने भी श्री कृष्ण जी पर गोपियों वा स्त्रियों से व्यभिचार का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने यह नहीं कहा कि श्रीकृष्ण जी महिलाओं के साथ रास रचाता है। आर्यसमाज के विद्वान आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने कहा कि जब शिशुपाल श्रीकृष्ण जी को व्याभिचारी नहीं कहता तो हमें भी भागवत पुराण की ऐसी मिथ्या बातों को नहीं मानना चाहिये।

 

आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने कहा कि महर्षि व्यास जी ने श्री कृष्ण जी के लिये प्रशंसनीय वचन कहे हैं। उन्होंने लिखा है कि श्री कृष्ण कहीं का राजा नहीं है। उन्होंने जिस राजा को मारा व मरवाया वह राजा अनैतिक, अधार्मिक व अराष्ट्रीय था। उन्होंने विजित किसी राज्य का अधिग्रहण नहीं किया अपितु उसी राजा के पुत्र को उसके पिता का राज्य दिया। श्री कृष्ण जी चोरी व व्यभिचार के विरोधी हैं। आचार्य जी ने कहा कि भागवत पुराण में लिखा है कि श्री कृष्ण जी की 16,108 रानियां थीं और उन सबके दस-दस बच्चे थे जिसमें सबकी एक-एक कन्या भी थी। आचार्य जी ने दो पुस्तकों महाभारत के कृष्ण और ‘पुराणों के कृष्ण’ को पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि महाभारतकार के अनुसार श्रीकृष्ण जी की केवल एक धर्मपत्नी रुकमणी थी। आचार्य जी ने कहा कि कि भागवत पुराणकार ने कृष्णजी के विषय में यह मिथ्या वर्णन किया है कि श्रीकृध्ण जी कुब्जा के घर पर गये, कुब्जा ने पान चबाया, उसे श्री कृष्ण जी को दिया आदि। आचार्य जी ने कहा कि महर्षि व्यास श्रीकृष्ण जी को ब्रह्मचारी बतातें हैं जिससे भागवत पुराण की इस प्रकार की सभी मिथ्या बातों का खण्डन हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि व्यास जी के अनुसार कृष्ण जी धनुर्धर थे जिनकी सभी युद्धों में विजय हुई। आचार्य जी ने कहा कि योगेश्वर कृष्ण ज्ञान का पर्याय हैं और अर्जुन कर्म का पर्याय है। आचार्य जी ने श्रोताओं को कहा कि आप कृष्ण एवं अर्जुन के समान अपने आप को बनाईये तो कभी पराजय को प्राप्त नहीं होंगे। आचार्य जी ने यह भी बताया कि जरासन्ध 100 राजाओं की बलि चढ़ाने वाला था। श्री कृष्ण जी ने उसकी उस निन्दनीय योजना को अपनी बुद्धिमत्ता से विफल किया।

 

योगेश्वर कृष्ण की नीतियों को आर्यों के गौरव वीर शिवाजी और महाराणा प्रताप ने अपनाया। श्री कृष्ण जी की नीतियों व विचारों को ऋषि दयानन्द ने भी यथावत् समझा। उन्होंने कहा कि परतन्त्रता के दिनों में भारत के लोगों की यह आस्था बन गई थी कि हमारा देश आजाद नहीं हो सकता। दयानन्द जी ने अपने समय में वेदों के आधार पर देशवासियों में ज्ञान व वीरता का संचार किया था। इसी के साथ आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री जी ने अपने वक्तव्य को विराम दिया। इसके बाद हिण्डोन सिटी के प्रसिद्ध बैण्ड मास्टर श्री युसुफ आजाद ने अपनी टीम के साथ अपने वीणा के समान यन्त्र से प्रसिद्ध देश भक्ति के गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी’ को बहुत ही श्रद्धाभक्ति के साथ सुनाया जिसे सुनकर सभी श्रोता मन्त्रमुग्ध हो गये और उन्होंने उन्हें अपनी ओर से 100 व 500 रुपये देकर सम्मानित किया। संचालक महोदय ने यह भी बताया कि श्री युसुफ आजाद विदेश जाने वाले भारत के सांस्कृतिक प्रतिनिधि मण्डल में सम्मिलित किये गये हैं। कार्यक्रम में एक अपंग बालक जिसने लगभग 65 प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे, उसका भी सम्मान किया गया। आर्यसमाज ने उसके भविष्य की शिक्षा का भार स्वयं वहन करने का भी वचन दिया।

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