एकलव्य अपना अंगूठा मत देना

महाभारत में प्रसंग आता है कि एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया तो गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया जब एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य कि मूर्ति के सम्मुख स्वयं के अभ्यास से धनुर्विद्या में प्रवीणता हासिल कर ली तो गुरु द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिना के बदले एकलव्य का अंगूठा मांग लिया ताकि भविष्य में एकलव्य कभी भी राजकुमार अर्जुन को चुनौती न दे सके और राजकुमार अर्जुन विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन सके भोला एकलव्य इस चाल को न समझा और उसने अपना अंगूठा तुरंत काट कर गुरु द्रोणाचार्य को भेंट कर दिया

 

भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है बस एकलव्य, अर्जुन और द्रोणाचार्य बदल गए है भारत की आम जनता एकलव्य हो गयी है, तो भ्रष्टाचारी लोग राजकुमार अर्जुन बन बैठे है जिनकी रक्षा गुरु द्रोणाचार्य की भूमिका में भ्रष्ट राजनेता कर रहे है.

भारत की भोली, गरीब और लाचार जनता ने भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर जब सरकार से भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने के विषय में कानून बनाने अनुरोध किया तो सरकार कोई न कोई बहाना बना कर उसे टालती रही और जब जनता ने बिना सरकार की सहायता के “जन लोकपाल बिल” तैयार कर लिया और उसे लागू कराने के लिए अन्ना हजारे के उपवास के माध्यम से सरकार पर चौतरफा दबाव बनाया तो सरकार को जनता की बात माननी पड़ी और एक “लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी” का गठन किया गया परन्तु कुछ लोग “लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी” के जन प्रतिनिधियों को लगातार किसी न किसी प्रकार से निशाना बना रहे है और उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करके भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई की धार को कुंद करने में लगे हुए है ताकि भ्रष्टाचारी लोगों का बोलबाला कायम रह सके.

हमें इस सत्य को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि भ्रष्टाचारी लोग न तो कभी ये स्वीकार करेंगे कि उन्होंने कुछ गलत किया है और न ही उनकी गलती बताने वाले या पकड़ने वाले किसी व्यक्ति या कानून को वे आगे बढ़ने देंगे और वे कमेटी में शामिल जन प्रतिनिधियों पर हमला करते हुए उन्हें बदनाम करके अपने निहित स्वार्थों कि रक्षा में लगे रहेंगे जो की वो कर भी रहे है किन्तु कमेटी में शामिल जन प्रतिनिधियों पर लगाये गए कुछ आरोप गंभीर है और उनमे कुछ सत्यता भी हो सकती है परन्तु हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि इस भ्रष्ट समाज में शत प्रतिशत भ्रष्टाचार मुक्त व्यक्ति को ढूँढना लगभग असंभव है और यदि कमेटी के किसी प्रतिनिधि ने कोई भ्रष्टाचार किया है तो कानून अपना काम करेगा यदि आप सचमुच भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के पक्षधर है तो आप उस भ्रष्टाचारी को सही माध्यम से सजा दिलाने का काम करे न कि सिर्फ बयान बाज़ी करके भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही लड़ाई को कमज़ोर करे

“लोकपाल बिल” किसी धर्म, जाति और लिंग से जुडा हुआ मुद्दा भी नहीं है इस लिए धर्म, जाति और लिंग के सवाल उठाकर कुछ राजनेता केवल मात्र अपने क्षुद्र राजनितिक स्वार्थों कि पूर्ति करते हुए केवल इसके व्यवहारिक होने में ही अडंगा डालने का काम कर रहे है आम जनता को इस बात पर भी विचार करना चाहिए की जब इतनी बड़ी और समझदार संविधान सभा द्वारा बनाए गए संविधान में कुछ परिवर्तनों की गुंजाइश रह सकती है तो यदि धर्म, जाति और लिंग के कारण “लोकपाल बिल” में किसी कारण कोई कमी रह जायेगी तो उसमे भी आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जा सकते है इस लिए हमारा सारा ध्यान केवल एक व्यवहारिक और ठोस “लोकपाल बिल” पर होना चाहिए न कि कंही और…

दूसरी ओर यदि जनप्रतिनिधि अपने उद्देश्य से किंचित मात्र भी विचलित होते है तो इतिहास और ये जनता जिसने इस आन्दोलन के लिए अप्रत्याशित समर्थन दिया है वह इस कमेटी के सदस्यों को कभी माफ़ नहीं करेगी और यह भविष्य में होने वाले जनांदोलनो के लिए भी घातक होगा जो कि भ्रष्ट लोग चाहते है इसलिए जनप्रतिनिधियों का यह परम और एकमात्र कर्तव्य बन जाता है कि वे अपने ऊपर लगने वाले हर आरोप का समुचित और सटीक उत्तर दे और व्यर्थ कि बातों में न उलझकर अपनी एकाग्रता को बनाए रखे उन्हें चाहिए की वे किसी भी प्रकार के दबाव में आए बिना निष्पक्ष रूप से अपना काम करे और एक ठोस एवं कारगर लोकपाल विधेयक का निर्माण करे इसके निर्माण के दौरान उन्हें उन गंभीर विषयों और आलोचनाओ एवं टिप्पणियों के विषय में भी विचार करना चाहिए जो समय समय पर कुछ विद्वान् लोगो द्वारा इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम को और मज़बूत करने के विषय में कि जाती रही है क्योंकि अच्छे विचारों का सदैव स्वागत होना चाहिए

क्योंकि इस देश की समस्त जनता की भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई भी अब “लोकपाल बिल” के जनप्रतिनिधियों पर निर्भर है और कमेटी के लगभग सभी सदस्यों पर एक साथ कोई न कोई आरोप लगना भी किसी साजिश कि तरफ इशारा करता है इसलिए जनप्रतिनिधियों को विशेष रूप से सजग और सतर्क रहना होगा और बिना किसी ब्लैक मेलिंग का शिकार हुए ऐसा प्रभावशाली और व्यवहारिक “लोकपाल बिल” बनाना होगा कि अब कोई भ्रष्टाचारी द्रोणाचार्य अंगूठा मांगने की हिम्मत न कर सके तभी सच्चे अर्थों में देश, जनता और सत्य की विजय होगी

1 thought on “एकलव्य अपना अंगूठा मत देना

  1. आपका लेख अति श्रेष्ठ है वत्स जी लेकिन उपमा अतार्किक है. अर्जुन से अच्छा धनुर्धर एकलव्य न बन जाये इस कारन उसका अंगूठा द्रोणाचार्य ने नहीं माँगा था अपितु उसे विद्या चोरी के अपराध का दंड दिया था.उस समय चोरी का दंड दोनों हाथ काट कर देने का कानून था परन्तु द्रोणाचार्य ने उस पर दया करके मात्र उसका अंगूठा ही माँगा. उस ब्राम्हण की दया दिखाने का ये परिणाम हुआ कि महाभारत के युद्ध में उस नीच shoodr ने अधर्मी कौरवों का sath दिया. विदेशी कुत्सित मानसिकता वाले अंग्रेजों के द्वारा लिखित मिथ्या इतिहास को न मान कर विवेक बुद्धि का prayog करें

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