लेखक परिचय

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

कनिष्ठ अनुसंधान फैलो लोक प्रशासन व स्थानीय स्वशासन विभाग नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर

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अप्रैल 2011 से लेकर आज तक जन लोकपाल विधेयक के समर्थन पर देश के स्वयं सेवी संगठन, भ्रष्टाचार से ग्रसित व्यक्ति ने अन्ना भाई को निरन्तर समर्थन करते देखे जा रहे हैं लेकिन ये राजनैतिक दल के लोग इस पर खीचातानी करने में कभी भी पीछे नहीं रहते। उसी तरह योग गुरू रामदेव बाबा द्वारा काला धन वापस के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। प्रस्तावित इस लोकपाल विधेयक को लेकर गतिरोध एक बार पुनः जन्म ले लिया है और अन्ना भाई ने इसके लिए पुनः सड़कों पर उतरने की धमकी दे दी है। प्रश्न यह उठ रहा है कि वास्तव में हम लड़ई किसके लिए कर रहे हैं? और किसके बल के बादौलत? यह विधेयक जिन प्रतिनिधियों पर नजर रखने के लिए लाने का प्रयास किया जा रहा है उन्हें भी जन आन्दोलन की दरकार है। ऐसा तो नहीं कि दांया हांथ, बांये हाथ से लडने की कोशिश कर रहा हो? प्रस्तावित इस जन लोकपाल विधेयक में तल्लीन अगुआ को गत दिनों जन समर्थन मिला। यहां स्पष्ट दिखता है कि जनता में अपने प्रतिनिधियों को लेकर जबर्दस्त नाराजगी है, किन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों के विरोध में लड़ाई लड़ने वालों का रास्ता साफ ही होगा। अन्ना भाई एवं उनके कार्यकर्ताओं के विरोध में पिछले दिनों मीडिया के माध्यम से जो खबरें मिली है उसने कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। मीडिया में उनसे संबंधित खबरों के छपने से भ्रष्ट प्रतिनिधियों का दोष तो कम नहीं हो जाता। अन्ना भाई ने तो समयानुसार मांग की थी और कर रहे है लेकिन ये तो सीधे डांका डालने का कार्य कर रहे है। आज हम देख रहे है कि प्रचीन काल का कल्प वृक्ष कहा जाने वाला आम का फल अब भ्रष्टाचार का दैंत्यकार रूप धरण कर चुका है, लेकिन इसकी जड़ें हम गरीबों के भीतर ही है। हम सभी ने मिलकर उसे खादपानी देकर परवरिस की है। हम सभी को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि हममे से कितने लोग ऐसे है जो बहती गंगा में स्नान करना नहीं चाहते अर्थात भ्रष्टाचार करने से चूकते हैं और अपने आसपास के छोटेमोटे भ्रष्ट व्यक्तियों को जानते हुए भी उनका समाजिक बहिस्कार करते हैं? नहीं, हमारे समाज में उन्हे बडा की खास व्यक्ति कहा जाता है, और झट से कह देते है कि जैसा समय हो वैसा अपने आप को  लेना चाहिए। अन्ना भाई के पास समस्या इस बात की है कि देश में इस विधेयक का मसौदा बनाने से लेकर लोक सभा एवं राज्य सभा से पारित करवाना कोई बच्चों का खेल नहीं है क्योंकि हम आप सभी जानते है कि कुछ ऐसे विधेयक हैं जिन्हें पारित करने के बाद हमारे इन चोर भाईयों के गर्दन में तलवार लटकने जैसे होगा, इसलिए ये चोर भाई इस तलवार में धार आने से पूर्व ही तलवार व उसकी म्यान को कानून के रूप में आने नहीं देना चाहते है। उदाहणार्थ विधान सभा एवं लोक सभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण, जन लोकपाल विधेयक आदि। लेकिन वर्ममान में जन लोकपाल विधेयक की बात है जन लोकपाल विधेयक पारित करवाने के बाद लोकपाल की नियुक्त करके हम इस वृक्ष की कुछ डालियों को काटने में सक्षम तो होगें लेकिन उनकी जडें़ खोदना और स्वयं को झांकना होगा, लेकिन यह भी सच है कि हम ऐसा नहीं करेंगे। कानून बनाने वाला कोई और नही  हमारे वृक्ष की जड़े ही होगी, क्या वे अपने आप को बचाने की कोशिश नही करेगीं?

इस भ्रष्ट वृक्ष की जड़ों को खोदने के लिए स्वयं सेवी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, संत महात्माओं एवं आम जनता को एक होकर देश की नैतिकता को बचाने के लिए जन जागरण करके इसे जड़पेड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प करना चाहिए। वृक्षों के तनों को काटने से कुछ नहीं होगा वल्कि वे आकर्षक को केन्द्र बन जाएगें। यदि इन जड़ों को खोदकर बाहर करना है तो नींव का पत्थर बनना होगा। जब तक हम ऐसा नीव का पत्थर निमार्ण नहीं कर पायेगें तब तक इस विधेयक को कानून और कानून का कि्रयान्वयन सही ंग से नहीं होगा और भ्रष्टाचार का वृक्ष अपनी जड़े फैलाकर फलताफूलता रहेगा।

अन्ना  हजारे भाई, योग गुरू रामदेव बाबा व अन्य देश के स्वाभिमान व नैतिकता के चिन्तक

हम और हमारा समूह आपके साथ रहेगा,

क्योकि हमारे देश का स्वाभिमान व नैतिकता हर व्यक्ति का होगा,

इसे बचाने के लिए हम सभी का कर्तव्य है।

One Response to “जन लोकपाल की खीचातानी कब तक?”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    वर्षों पहले की मेरी एक रचना है, जो हाल हीं में प्रवक्ता में प्रकाशित हुई है.उसके कुछ अंश यों हैं;
    “विचार आया ,
    हम भी कहीं,वही नाली के कीडे तो नही.
    जी रहे हैं गन्दगी में.
    तन की गन्दगी ,मन की गन्दगी.
    सांस ले रहे हैं दुषित वायु में,
    और प्रसन्न हैं.
    कही मौत हमारी भी तो नही हो जायेगी,
    जब हम बढेंगे स्वच्छता की ओर,
    सादगी ओोर सत्यता की ओर.”
    ऐसे तो प्रवक्ता में हीं मेरा नाली के कीड़े शीर्षक से एक सामयिक लेख भी प्रकाशित हुआ है,जो इसी विचार धारा को और स्पष्ट करता है,तो मेरे विचार से तो स्थिति सचमुच ऎसी है की हम्मे से अधिकाँश या तो उसी भ्रष्ट तन्त्र के पुर्जें है या यथास्थिति से खुश हैं.यह ऐसा विरोधा भास है की हम असल में दुश्चक्र में फंसी हुई स्थिति में हैं और वहां से निकलने के लिए एक जूट कोशिश न करके एक दूसरे को खाने की कोशिश कर रहें हैं और व्यक्तिगत वर्चश्व सिद्ध करने की चक्कर में दलदल में ज्यादा हीं धंसते जा रहे हैं.

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