राजनेताओं की पहली पसंद हैं बाहुबली !

संजय सक्सेना 

उत्तर प्रदेश में सभी सियासी दल दोहरा मापदंड रखते हैं।उनकी नजरों मे राजनीति के खेल में महिलाएं फिट नहीं बैठती है। यही वजह है विधान सभा चुनाव के समय टिकट देने और विधान परिषद में भेजते समय विभिन्न राजनैतिक दलों के आकाओं द्वारा महिलाओं को तरजीह नहीं दी जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न सियासी दलों ने एमएलसी बनाते समय महिलाओं को पीछे रखा। उत्तर प्रदेश में विधानमंडल दल के सौ सदस्यों वाले उच्च सदन (विधान परिषद) में मात्र सात महिलाओं का चुना जाना इस बात का घोतक है,यह और बात है कि इसमें से एक मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और वह सबसे धनवान विधायक भी हैं। जबकि इससे उल्ट जिस सदन में बुध्दिजीवियों,साहित्यिक मनीषियों कार् वचस्व होना चाहिए वहां अपराधियों और बाहुबलियों का वर्चस्व है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के वर्तमान सदन में 25 प्रतिशत ऐसे सदस्य हैं जा आपराधिक पृष्ठभूमि के है। जिनमें से आठ पर तो हत्या और हत्या के प्रयास जैसे संगीन मामले दर्ज है। विधान सभाओं की तरह विधान परिषद में भी अपराधियों ने घुसपैठ बना ली हैं,इस ओर सियासी दलों का ध्यान भले ही न गया हो लेकिर उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ( एडीआर) ने अपनी पहली रिपोर्ट में इस बात का खुलासा कर दिया है।इस खुलासे से यही लगता है कि बाहुबली आज भी विभिन्न राजनैतिक दलों की पहली पसंद हैं।

एडीआर ने हालम में ही उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्यों की पृष्ठभूमि उनकी वित्तीय स्थिति और आपराधिक विवरणों की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट पेश की है। यह किसी राज्य के उच्च सदन के सदस्यों पर आधारित अपनी तरह की पहली रिपोर्ट हैं। विभिन्न प्रत्याशियों द्वारा नामांकन भरते वक्त पेश हलफनामों में दिए गये विवरणों पर आधारित इस रिपोर्ट के मुताबिक बुध्दिजीवियों के सदन में 25 प्रतिशत सदस्य आपराधिक छवि के हैं, जिनमें से आठ फीसदी पर गंभीर आपराधिक मामले लम्बित हैं।

उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच ने राज्य विधान परिषद के 90 निर्वाचित सदस्यों में से 87 के विवरण का विश्लेषण करने पर पाया है कि उनमें से 22 सदस्यों यानि 25 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। आपराधिक प्रवृत्ति के इन सदस्यों में से 17 सदस्य सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के, समाजवादी पार्टी के तीन, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का एक-एक सदस्य शामिल है।विधान परिषद में भले ही सिर्फ सात महिला सदस्य ही हैं, लेकिन करोड़पति सदस्यों की फेहरिस्त में मुख्यमंत्री मायावती सबसे ऊपर है। उनकी घोषित सम्पत्ति 87 करोड़ 27 लाख 42 हजार रूपए है। विधान परिषद के सदस्यों की औसत सम्पत्ति करीब चार करोड़ रूपए है।विश्लेषण में यह भी पाया गया है कि 23 सदस्यों ने अपने परमानेंट अकाउंट नंबर(पैन) की जानकारी नहीं दी है। इनमें चंद्र प्रताप सिंह यादव, अतहर खान, राजदेव सिंह, लेखराज, जितेन्द्र यादव ( सभी बसपा के) और विवेक बंसल ( कांग्रेस ) के रूप में करोड़पति सदस्य भी शामिल हैं।

रिपोर्ट में विधानमंडल के निचले सदन यानी विधानसभा के बारे में मुख्य बिंदुओं का जिक्र करते हुए बताया कि 403 सदस्य वाले इस सदन में 139 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले लम्बित हैं। इनमें बसपा के कुल 201 विधायकों में से 69 के खिलाफ, सपा के 95 में से 35 के विरूध्द, भाजपा के 50 में से 14 के खिलाफ, कांग्रेस के 22 में से आठ के विरूध्द और राष्ट्रीय लोकदल के 10 में से चार के खिलाफ आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं।

बहरहाल, विभिन्न राजनैतिक दलों की मनमानी से नाराज यूपी इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्मस ने आने वाले विधान सभा चुनावों से पहले उसमें सुधार की कवायद शुरू कर दी हैं। इलेक्शन वॉच ने चुनाव आयोग और केन्द्रीय कानून मंत्री से मांग की है कि वह इस बार चुनाव में किसी को वोट न देने का विकल्प शुरू करे। साथ ही राजनीतिक दलों से मांग की है कि वह पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बढ़ावा देने का काम करें। सरकार से विधायक निधि बंद करने की भी मांग इलेक्शन वॉच करेगा।

नेशनल इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक एलायंस के नेशनल कोआर्डिनेटर अनिल बैरवाल के अनुसार उन्होंने कानून मंत्री को को एक ज्ञापन पहले दिया था,जल्द ही रजानीतिक दलों को सुधार के सुझाव भेजे जाएंगे।उनका कहना था यूपी के मंत्रियों को सालाना संपत्ति घोषित करनी चाहिए। यूपी इलेक्शन वाच की ओर से पूर्व डीजीपी आईसी द्विवेदी ने कहा कि वर्ष 2003 से शपथ पत्र देने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू हुई थी। इससे प्रत्याशियों का आपराधिक इतिहास व सम्पत्ति पता चल जाता हैं। उन्होंने कहा कि अब वह वोट देने के लिए जागरूकता फैलाने पर जोर देंगे।

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