न जाने कौन सा टेलीफोन तलाक बन जाएगा ?

राकेश कुमार आर्य
लोकसभा ने एक बार फिर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की अमानवीय  प्रवृत्ति से मुक्ति दिलाने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया है। जब उसने तीन तलाक संबंधी विधेयक को लोकसभा में पारित कर दिया। इस समय कांग्रेस, राजद ,सपा जैसी कई पार्टियों ने अपना चरित्र दिखाते हुए लोकसभा से वोटिंग के समय बहिष्कार भी किया और उन्होंने इस विधेयक के विरोध में अपनी भाषणबाजी की । इस सब के उपरांत भी लोकसभा में इस विधेयक को लेकर जिस प्रकार की गंभीर चर्चा हुई उससे सदन को ऊंचाई अवश्य मिली।  यह बहुत ही अच्छी बात है कि लोकसभा में पक्ष विपक्ष के नेता अपने – अपने विचार रखें और तार्किक आधार पर एक दूसरे की बातों को काटने का प्रयास करें। इसी का नाम लोकतंत्र है । संसद को जाम करना और सरकारी कार्य में व्यवधान डालना किसी भी प्रकार से लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। हमारे जनप्रतिनिधि लोकसभा में एक न्यायाधीश की भांति बैठें तो अच्छा है और प्रत्येक विषय की गंभीरता पर अपना चिंतन प्रकट करें। यदि वह लोकसभा का बहिष्कार करते हैं और बहिर्गमन कर अपना विरोध व्यक्त करते हैं तो लोकतंत्र की राजनीतिक प्रणाली में इसे स्वीकार तो किया जा सकता है परंतु इसे पूर्णतया लोकतांत्रिक भी नहीं कहा जा सकता । जैसे न्यायाधीशों की कोई पीठ किसी निर्णय पर असहमति व्यक्त करने वाले न्यायाधीश के विचारों को भी संकलित करती है और उसे अपने विचार व्यक्त करने का वहां पूरा अधिकार होता है ,वैसे ही संसद में भी पूरी गंभीरता के साथ अपनी बात रखने का अधिकार प्रत्येक जनप्रतिनिधि को होता है। परंतु सरकारी कार्य में व्यवधान डालने की प्रवृत्ति से सभी जनप्रतिनिधि बाज रहे तो अच्छा है।इस्लामिक जगत में बहुत से लोगों को  तीन तलाक संबंधी विधेयक को ऐसे परिभाषित करके दिखाया गया है,   जैसे नरेंद्र मोदी सरकार  मुस्लिमों के  निजी  मामलों में हस्तक्षेप कर रही है और उन्हें इस देश में  जीने नहीं दे रही है ,  जबकि यह बात पूर्णतया निराधार है।   वास्तविकता यह है कि स्वयं कुरान भी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा  करने के लिए कई प्रावधान करती है । इस्लामिक जगत के कई विद्वान  इस बात से सहमत हैं और जो वास्तविक अर्थों में प्रगतिशील विचारधारा के मुस्लिम विद्वान हैं  वह इस बात के पक्षधर भी हैं कि किसी भी महिला को  तलाक के नाम पर अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार ना होना पड़े । इस विषय पर  कुरान  की व्यवस्था क्या है ? – इस पर थोड़ा इस लेख में विचार करते हैं । सूरह निसा के अनुसार अगर औरत की नाफ़रमानी और बददिमागी का खौफ़ हो तो उसे नसीहत करो और अलग बिस्तर पर छोड़ दो। अगर किसी औरत को अपने शौहर की बददिमागी और बेपरवाही का खौफ़ हो तो बीवी को भी शौहर को मौका देना चाहिए, न कि फ़ौरन कोई फ़ैसला करना चाहिये। घर को बरबादी से बचाने के लिए अगर उसके हक मे कोई कमी हो तो उसे भूल कर हर हाल मे घर को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर शौहर बीवी की सारी कोशिशें नाकाम हो जाएं, तो भी तलाक देने मे जल्दबाज़ी की जगह एक और रास्ता यह है कि दोनों के खानदान से एक-एक समझदार और हकपरस्त व्यक्ति को शामिल कर रास्ता निकालना चाहिए।यही नहीं अगर फिर भी तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो जाएं तभी दोनो को एक दूसरे से अलग हो जाने की इजाज़त है। क़ुरान में एकतरफ़ा, एक ही वक़्त में या एक ही बैठक में तलाक देना गैर-इस्लामी माना गया है।ऐसी स्पष्ट और मानवीय व्यवस्था के होने के उपरांत भी  यदि मुस्लिम  मौलवियों ने  कुरान की तलाक संबंधी मनमानी व्याख्या की है तो उसे  न केवल कुरान विरोधी कहा जाएगा ,अपितु  मानवीय मूल्यों और मानव अधिकारों के विरुद्ध भी कहा जाएगा । ऐसी स्पष्ट व्यवस्था के होने के उपरांत भी महिलाओं के साथ  तलाक के नाम पर किया जाने वाला आज तक का  अपराध  इस्लाम  किसके ऊपर रखेगा ? – इस पर भी आज के इस्लामिक विद्वानों को गंभीरता से चिंतन करना चाहिए । तलाक की अमानवीय व्यवस्था  पर  संसद में बोलते हुए बीजेपी  की सांसद मीनाक्षी लेखी ने  बहुत सुंदर  शब्दों का प्रयोग किया ।  उन्होंने कहा कि —  औरतों के लिए तुम्हारा चलन निराला क्यों है?  जो कहते हो कि धर्म साफ है तो यह नियम काला क्यों है ?  शिकायत मस्जिदों से नहीं पर फतवों से है मुझे,  तुमने औरतों को अपने धर्म से निकाला क्यों है ? यह बहुत ही दुखपूर्ण और हास्यास्पद स्थिति बन चुकी थी कि कोई भी  मुस्लिम शौहर अपनी पत्नी को मोबाइल तक पर भी तलाक  दे रहा था, किसी छोटे से छोटे अपराध पर भी तलाक की स्थिति आ जाती थी  । जिससे कितनी ही मुस्लिम बहनें  पीड़ित होती रही हैं ।  यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस्लाम के दृष्टिकोण में औरत केवल औरत है।  वह बहन या बेटी क्यों नहीं है? – जबकि प्रत्येक औरत औरत से पहले बहन और बेटी है, मां है।  ऐसे में इस्लामिक विद्वानों को भी यह सोचना चाहिए कि उनकी अपनी मां , बहन और बेटी के साथ यदि ऐसा अमानवीय व्यवहार हो तो उन्हें कैसा लगेगा ? – वैदिक संस्कृति में तो यह कहा गया है कि —   ” आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत ” —  अर्थात जो तुम्हें अपने साथ दूसरे के द्वारा किया गया वव्यवहार बुरा लगे,  उसे दूसरों के साथ मत करो । यह एक नैतिक व्यवस्था ही नहीं है , बल्कि हिंदू समाज का ,वैदिक संस्कृति का एक कानून है , एक विधि है , धर्म है, एक व्यवस्था है।  एक नैतिकता है ,और हम इसी धर्म से अनुशासित और शासित होते हैं। इस्लाम को भी इस पर विचार करना चाहिए कि प्रत्येक मां ,बहन और बेटी के साथ यदि हमें कोई  किया गया व्यवहार बुरा लगता है तो उसे हम दूसरों की मां , बहन , बेटी के साथ भी ना करें। मीनाक्षी लेखी ने ही अपने एक दूसरे शेर से इस बात को स्पष्ट किया—  कभी संगीन कभी मजाक बन जाएगा।  मिट्टी का शरीर खाक बन जाएगा। जरा एहतियात बरत रकीब मेरे, न जाने कौन सा टेलीफोन तलाक बन जाएगा।।कुछ लोग तलाक के बाद औरत को हासिल होने वाली मेहर की रक़म का हवाला देकर कहते हैं कि उससे औरत अपनी बाकी की ज़िन्दगी का इंतजाम कर सकती है, लेकिन क्या मेहर की छोटी रक़म से भी कहीं ज़िन्दगी कटती है किसी की ? कथित इस्लामी विद्वानों द्वारा तीन तलाक को लागू करते वक़्त क़ुरान की व्याख्या में कहीं कुछ गलती अवश्य हुई है। इस्लामिक जगत में  पुरुष प्रधान  रहा है ।  घर से लेकर सत्ता तक उसने अपना वर्चस्व स्थापित किया है ।  यही कारण रहा है कि इस्लाम के  धर्म ग्रंथ कुरान  की व्यवस्थाओं के विपरीत जाकर उसने अपने आप को प्रभावशाली स्थिति में  स्थापित कर लिया है।  जिसके चलते  पिछले  14 सौ से अधिक के समय में  महिलाओं का उत्पीड़न होता रहा है ।यह पुरुषवादी सोच और नज़रिए की वज़ह से हुआ है।यह सही है कि तलाक का यह तरीका बेहद आसान और एकांगी होने के बाद भी अपने देश के मुस्लिमों के बीच तलाक का अनुपात कम है। मात्र 0.5 अर्थात आधा प्रतिशत। परंतु इस व्यवस्था ने भारत के हिंदू समाज को भी प्रभावित किया है  । जहां पर पत्नी को छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं था , वहां पर भी लोगों ने देखा – देखी तलाक की व्यवस्था को अपना लिया है और अब हमारे हिंदू समाज के पढ़े लिखे जोड़ें बहुत  शीघ्र तलाक का निर्णय ले लेते हैं। पढ़े-लिखे और जागरूक मुस्लिम तीन तलाक का प्रयोग शायद ही कभी करते है। इसका प्रचलन अनपढ़ और नशे के आदी लोगों में ही ज्यादा है। इसका प्रयोग बिना आगे-पीछे सोचे क्षणिक गुस्से और भावावेश में ही ज्यादा होता रहा है। इसके बावज़ूद अपने देश में लैंगिक समानता के आदर्श के आलोक में इसमें संशोधन कर इसे कुछ और कठोर बनाने की आवश्यकता दीर्घ काल से अनुभव की जाती रही है।इसके उपरांत भी, एक बार में तीन तलाक का तरीका आज के समय में अप्रासंगिक ही नहीं,स्वयं पवित्र क़ुरान की भावनाओं के विपरीत भी है। क्षणिक भावावेश से बचने के लिए तीन तलाक के बीच समय का थोड़ा-थोड़ा अंतराल ज़रूर होना चाहिए। यह भी देखना होगा कि जब निकाह लड़के और लड़की दोनों की सहमति से होता है, तो तलाक़ का अधिकार केवल पुरुष को ही क्यों दिया जाता है? उसमें स्त्री की सहमति या कम से कम उसके साथ विस्तृत संवाद भी निश्चित रूप से सम्मिलित किया जाना चाहिए। यह भी कि निकाह जब दोनों के परिवारों की उपस्थिति में होता है तो तलाक एकांत में क्यों?क़ुरान के अनुसार भी तलाक तभी  उचित है जब तलाक देते समय पति और पत्नी व उन  दोनों के परिवारों के सदस्य बीच-बचाव के लिए उपस्थित हों और दोनों के मध्य समझौते के सारे प्रयास असफल सिध्द  हो गए हों । भारत से बाहर पाकिस्तान सहित 22 इस्लामिक देशों में तीन तलाक की अन्यायपूर्ण परम्परा को या तो समाप्त कर दिया गया है, या समय के अनुरूप उसमें कई संशोधन हुए हैं। आगे भी होते रहेंगे। केवल अपने भारत में ही इसे लेकर हठधर्मी है।1986 में शाहबानो प्रकरण के समय केंद्र की राजीव सरकार ने मुस्लिम समाज के साथ अन्याय करते हुए मुस्लिम पर्सनल ला को भारत के संविधान और भारत के कानून पर वरीयता देकर बहुत बड़ी गलती की थी । यह सुधारात्मक दृष्टिकोण न  होकर वोट बैंक को मजबूत करने की राजनीति का एक घृणास्पद स्वरूप था । शासक वर्ग को वोट बैंक को मजबूत करने का अपना अधिकार होता है , परंतु इस सब के उपरांत भी जहां किसी वर्ग विशेष के गले पर छुरी चलने वाली बात हो तो वहां पर राजनीति को राष्ट्र नीति में परिवर्तित होने में देर नहीं करनी चाहिए । यह हमारे लिए बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान सरकार चाहे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की संरक्षा और सुरक्षा करते हुए अपने वोट बैंक को मजबूत करने की ओर भी दृष्टि गड़ा रही हो , परंतु उसने इतना नैतिक साहस तो किया है कि वह किसी बड़े वर्ग की आधी आबादी के लिए चिंतित हो रही है । उसकी चिंता पूर्णतया लोकतांत्रिक है , क्योंकि वह उस आधी आबादी को पूरे अधिकार दे देना चाहती हैं ,या या उसके अधिकारों का रक्षा कवच तैयार कर देना चाहती है जो इस धरती पर पिछले 14 वर्ष से अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य है।मीनाक्षी लेखी ने संसद में अपने भाषण में एक और शेर का प्रयोग किया । हम भी अपने इस लेख को उसी शेर के साथ समाप्त करना चाहते हैं —-  हर मील के पत्थर पर लिख दो यह इबारत । मंजिल नहीं मिलती नाकाम इरादों से ।।

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