कोसी क्षेत्र में हावी है दहेज की कुप्रथा

मोहम्मद शफीउल्लाह

विज्ञान और तकनीक में आश्‍चर्यजनक प्रगति से मनुष्‍य भौतिक सुख सुविधाओं को जुटाने में अधिक सफल हुआ है, लेकिन अपने जीवन को सुदृढ़ बनाने में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। तेजी से हो रहे वैज्ञानिक, तकनीकी और अन्य बदलावों से इतना तो स्पष्‍ट है कि मनुष्‍य तेजी से दौड़ रहा है, पर यह स्पष्‍ट नहीं है कि उसकी दिशा ठीक है या नहीं? आज हमारे सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि महिलाओं के उत्थान के लिए एक न्यायसंगत और खुशहाल समाज बनाने के उद्देश्‍य से उसे हम कैसे जोड़ सकें। समाज में व्याप्त दहेज की कुप्रथा मानवता के लिए बदतरीन और काला सियाह बन चुका है। यह एक ऐसी रस्म है जो समाज के लिए नासूर बनता जा रहा है। यह एक ऐसा कैंसर है, जो अन्त होने की बजाय प्रत्येक दिन मरीज को अपनी ओर आकर्षित कर अपनी चपेट में ले रहा है। जिससे निकलना नामुमकिन नहीं तो कठिन जरूर है। खास बात यह है कि दहेज की यह लानत केवल अनपढ़ वर्ग में ही नहीं बल्कि शिक्षित परिवार भी इससे ग्रसित है। अन्य क्षेत्रों की तरह बिहार के कोसी क्षेत्र में भी दहेज जैसी कुप्रथा तेजी से अपना पांव पसार रही है।

दहेज को बढ़ावा देने में समाज सबसे बड़ा जिम्मेदार हैं। यदि लड़की वाले इच्छानुसार दहेज नहीं देते हैं तो शादी के बाद उनकी बेटी को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगता है और कभी कभी उसकी हत्या तक कर दी जाती है। अपनी लाडली के सुंदर भविष्‍य के लिए लड़की वाले उनकी हर इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार रहते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि दहेज की मांग पूरी नहीं कर पाने के कारण गरीब घर की लड़कियों की शादी समय से नहीं होती है और यही समाज उन्हें घृणित दृष्टि से देखता है और उन्हें बोझ समझा जाने लगता है। आज लड़की के गुण और उसकी शिक्षा को नजरअंदाज़ खुलकर दहेज की मांग की जाती है। जब मन मुताबिक दहेज की मांग पूरी होती नही दिखती है तो कोई बहाना बनाकर चल देते हैं। शायद इसी वजह से तंग आकर कई लड़कियां आत्महत्या भी करने की कोशिश करती हैं या फिर ऐसे रास्ते पर चल पड़ती हैं जिन्हें सामाजिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। दहेज प्रथा को बढ़ावा देने में केवल वर पक्ष ही नहीं बल्कि लड़की वाले भी समान रूप जिम्मेदार हैं। इस संबंध में समाज सेवी रजिया सुल्ताना गौहर के अनुसार दहेज स्टेटस सिंबल बन चुका है। दहेज प्रथा के रस्म को पूरा करने के लिए लोग अपनी जमीन व घर को बेचकर दूसरों से भी ज्यादा खर्च करना चाहते हैं और ऐसा करके लोग अपने मित्र, प्रियजनों के बीच प्रसिद्ध होना चाहते हैं। वहीं दूसरी तरफ समाज की मानसिकता इस कदर विकृत हो चुकी है कि आज के युग में यदि कोई लड़का वाला बिना दहेज के विवाह करने की सोचता है तो लड़की वाले को यह समझ में आता है कि शायद लड़का में कुछ कमी है। कभी कभी लड़के वालों की ओर से दहेज नहीं मांगने पर लड़की वाले शादी से इंकार तक कर देते हैं। इसी वजह से दहेज लेना भी मजबूरी हो जाता है, जो समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण हैं। दहेज के बढ़ते चलन के कारण ही समाज में बेटी की बजाए बेटे की चाहत हावी होती जा रही है। परिणामस्वरूप भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध आम होते जा रहे हैं। यह घृणित कार्य अनपढ़ से ज्यादा शिक्षित और ग्रामीण से अधिक शहरी क्षेत्रों में देखने को मिल जाता है।

पहली बार 1 जुलाई 1961 को दहेज प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाये गये थे। इस कानून में दहेज देना और लेना दोनों के लिए यह कानून बनाये गये थे। 1980 में सरकार ने एक कमिटी गठित की, जिसमें दहेज निषेध अधिनियम पारित किए गये। पुन: 1983, 1984 और 1986 में कुछ संशोधन किए गए। सेक्‍शन 498-ए को इंडियन पेनल कोड और 198-ए को क्रिमिनल प्रोसिजर कोड में वर्ष 1983 में शामिल किया गया। इसपर कितना काम हुआ है, वह हमारे सामने हैं।

दहेज की मांग ने समाज में अनेक कुरीतियों को जन्म दिया है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है। सुख-दुख में साथ निभाने और बड़े बुजुर्गों को सर्वोच्च स्थान देने की जगह उन्हें बोझ समझा जाने लगा है। दहेज के बाजार में बेटे का मूल्य लगाने वालों की शिकायत बेबुनियाद है कि बहु ने उनके बेटे को अलग कर दिया है। जब कोई सामान किसी के हाथ बेच दी जाती है तो उस पर से हमारा अधिकार खत्म हो जाता है। ऐसे में यदि भविष्‍य में वही संतान परिवार से अलग होकर अपना बसेरा बनाना चाहता है तो उसमें उसकी गलती ही क्या है? आखिर उनकी बहु ने उनकी इच्छा से कहीं ज्यादा दहेज देकर उनके बेटे को खरीदा है। (चरखा फीचर्स)

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