ड्रैगन को झटका दर झटका

  • श्याम सुंदर भाटिया

संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत ने चीन को एक बार फिर जबर्दस्त पटखनी देते हुए अपनी विजय पताका फहरा दी है। 193 सदस्यों में अपने समर्थकों के बूते भारत ड्रैगन को वैश्विक मंच पर उसकी हैसियत बार-बार बता रहा है, जबकि भारत जय हो उद्घोष के साथ शांति और मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता को सिद्ध करते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है। भारत ने एलएसी पर जारी विवाद के बीच हिंदी दिवस पर संयुक्त राष्ट्र में शिद्दत से अपनी ताकत का अहसास कराकर चीन को आईना दिखा दिया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ़ वूमेन- सीएसडब्ल्यू चुनाव में चीन को हराकर सदस्यता हासिल कर ली है। यह विश्व निकाय संकाय लिंग समानता को महिला सशक्तिकरण पर काम करता है। ऐसी वर्ष भारत को सुरक्षा परिषद का आठवीं बार अस्थाई सदस्य भी चुना गया। 193 में भारत के पक्ष में 184 वोट पड़े थे। चीन भारत की सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता को लेकर भी हमेशा पुरजोर विरोध करता रहा है। उल्लेखनीय है, भारत अपनी साफ छवि के बूते वैश्विक मंच पर लगातार अपना परचम लहराया रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने हाल ही में डब्ल्यूएचओ एग्जीक्यूटिव बोर्ड के चेयरमैन का प्रभार ग्रहण कर चुके हैं।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में चीन को पटखनी देते हुए आर्थिक और सामाजिक परिषद-ईसीओएसओसी की संस्था में जगह बना ली है। भारत अब अगले चार साल के लिए महिलाओं की स्थिति को लेकर बने आयोग ‘सीएसडब्ल्यू’ का सदस्य बन गया है। इस संस्था का सदस्य बनने के लिए चीन के अलावा भारत और अफगानिस्तान इस दौड़ में थे। चीन को इस मुकाबले में कुल मतों के आधे भी नहीं मिल सके हैं। भारत के पक्ष में कुल 38 मत मिले जबकि चीन 27 मत पाक आवश्यक बहुमत पाने में नाकाम रहा है। अफगानिस्तान 39 वोट लेने में कामयाब रहा। पहले ही कई मोर्चे पर शिकस्त खा रहे चीन को इस मुकाबले में करारी हार का सामना करना पड़ा। ईसीओएसओसी में एक वक्त में 45 सदस्य होते हैं। 11 सदस्य एशिया से चुने जाते हैं, जबकि 9 लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों, 8 पश्चिमी यूरोप से और चार पूर्वी यूरोप से होते हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने इस बारे में जानकारी देते हुए ट्वीट किया कि भारत ने यूएन की एक अहम काउंसिल ईसीओएसओसी की सीएसडब्ल्यू समिति में जगह बनाई है। यह बताता है, लैंगिग समानता और महिला सशक्तिकरण को लेकर हम कितने गंभीर प्रयास कर रहे हैं।  हम समर्थन देने वाले देशों के शुक्रगुजार हैं। यूएन में इन नतीजों को चीन में महिलाओं के समानता और सशक्तिकरण के खराब रिकॉर्ड के संकेत के रुप में देखा जा रहा है, जबकि भारत की जीत इसीलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के कई देश मानते हैं, भारत में महिलाओं की बेहतरी के लिए काम किए जा रहे हैं।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहर लाल नेहरु कहते थे, लोगों को जगाने के लिए, महिलाओं का जागृत होना जरुरी है। एक बार जब वे अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है। भारत में, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाले इन सभी राक्षसी सोच को मारना जरुरी है, जैसे दहेज प्रथा, अशिक्षा, यौन हिंसा, असमानता, भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, बलात्कार, वैश्यावृति, मानव तस्करी आदि। लैंगिक भेदभाव राष्ट्र में सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अंतर देश को पीछे की ओर ढकेलता है। लैंगिक असमानता भारत में मुख्य सामाजिक मुद्दा है, जिसमें महिलाएँ पुरुषवादी प्रभुत्व देश में पिछड़ती जा रही है। पुरुष और महिला को बराबरी पर लाने के लिये महिला सशक्तिकरण में तेजी लाने की जरुरत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का उत्थान राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिये। महिला और पुरुष के बीच की असमानता कई समस्याओं को जन्म देती है, जो राष्ट्र के विकास में बड़ी बाधा के रुप में सामने आ सकती है। ये महिलाओं का जन्मसिद्ध अधिकार है, उन्हें समाज में पुरुषों के बराबर महत्व मिले। महिला सशक्तिकरण में यह ताकत है कि महिलाएं समाज और देश में बहुत कुछ बदल सकती हैं।

कानूनी अधिकार के साथ महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये संसद की ओर से बराबर पारिश्रमिक एक्ट 1976, दहेज रोक अधिनियम 1961, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1956, मेडिकल टर्म्नेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1987, बाल विवाह रोकथाम एक्ट 2006, लिंग परीक्षण तकनीक (नियंत्रक और गलत इस्तेमाल के रोकथाम) एक्ट 1994, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन शोषण एक्ट 2013 पारित किए गए हैं। इसके अलावा महिला एंव बाल विकास कल्याण मंत्रालय और केंद्र सरकार की ओर से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना, महिला हेल्पलाइन योजना ,उज्जवला योजना, सपोर्ट टू ट्रेनिंग एंड एम्प्लॉयमेंट प्रोग्राम फॉर वूमेन (स्टेप), महिला शक्ति केंद्र सरीखी योजनाएं चल रही हैं। भारतीय सरकार पंचायती राज प्रणाली में 33% सीट महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान पहली ही कर चुकी है। महिला सुरक्षा से संबंधित कानूनों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया है। खास-तौर पर निर्भया केस को ध्यान में रखकर पुराने जुवेनाइल कानून 2000 को बदलते हुए नए जुवेनाइल जस्टिस-चिल्ड्रेन केयर एंड प्रोटेक्शन बिल 2015 को लागू किया। इस कानून के अंतर्गत अब 16 से 18 साल के बीच किशोर भी शामिल हो गए हैं।  

प्राचीन काल में महिला को देवी का दर्जा देने के बाद भी उनकी हालत किसी राजा-महारजा की दासी के समान थी। सैद्धांतिक रूप से भले ही महिला को समाज में ऊँचा स्थान दिया गया था पर व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह मात्र एक औपचारिकता से ज्यादा कुछ न था।इसमें कोई शक नहीं मुग़ल साम्राज्य के दौरान तो हालात और भी ख़राब थे। महिलाओं को सती प्रथा और परदे में रहने जैसे बंधनों में बंधकर रहना पड़ता था। मुगल काल के बाद ब्रिटिश राज में भी हालत नहीं सुधरे थे बल्कि उसके बाद तो व्यवस्था और भी बिगड़ गयी थी, लेकिन महात्मा गाँधी ने बीड़ा उठाया और महिलाओं से आह्वान किया कि वे भी आजादी के आन्दोलन में हिस्सा लें। इसके बाद ही सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित और अरुणा आसफ़ अली जैसी महान नारियों का उदय हुआ, जिन्होंने खुद महिलाओं की दशा सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही व्यापक स्तर पर महिलाओं के विकास पर जोर दिया जाने लगा। इंदिरा गाँधी खुद अपने आप में ही महिलाओं के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा का स्रोत थीं। इतिहास गवाह है, इंदिरा गाँधी के साथ-साथ विजयलक्ष्मी पंडित, एनी बेसंट, महादेवी वर्मा, सुचेता कृपलानी, पी.टी उषा, अमृता प्रीतम, पदमजा नायडू, कल्पना चावला, राजकुमारी अमृत कौर, मदर टेरेसा, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि ने महिलाओं की जिंदगी के मायने ही बदल कर रख दिए है। आज नारी बेटी, माँ, बहन, पत्नीं के रूप में अलग अलग क्षेत्र जैसे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा, विज्ञान और विभागों में अपनी सेवाएं दे रही हैं।  

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख श्री एंतोनियो गुतारेस कहते हैं, लड़कियां और महिलाएं जब तक हिंसा और असुरक्षा से रहित तथा बेखौफ़ नहीं होतीं तब तक दुनिया निष्पक्षता और बराबरी का गुमान नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा वैश्विक है और हर ओर होती है। उन्होंने कहा,  इसके मूल में यह है, महिलाओं के खिलाफ हर रुप में हिंसा का मतलब सम्मान की बेहद कमी होना है। महिलाओं की बुनियादी समानता और मान को पहचान देने में पुरुष विफल रहे हैं। उल्लेखनीय है, भारत 2021 से लेकर 2025 तक इस कमीशन का सदस्य रहेगा। कोरोना वायरस संकट के कारण आलोचना का निशाना बने चीन के लिए इस हर को बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। चीन को यह झटका उस समय लगा है, जब वह इस साल लोकप्रिय बीजिंग वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस ऑन वूमेन (1995) की 25वीं सालगिरह मना रहा है।  

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