लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

भारत रत्न मदर टेरेसा द्वारा अनाश्रित लोगों के आश्रय हेतु चलाए जाने वाली चेरिटेबल मदर्स होम संभवत: देश की ऐसी सबसे बड़ी धर्मार्थ परियोजना है जोकि अपेक्षित बुजुर्गों, बीमारों तथा असहाय लोगों के आश्रय का एक सुरक्षित केंद्र है। आमतौर पर यहां उन लोगों को आश्रय मिलता है जो अपने ही परिजनों द्वारा किसी भी कारण वश अपने घर व परिवार से निष्कासित कर दिए जाते हैं तथा उन्हें लावारिस व बेसहारा अवस्था में अपने जीवन के शेष दिन गुजारने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। उन्हें सहारा देने वाले ‘मदर्स होम’ पर तथा उसकी संचालिका रही भारत रत्न मदर टेरेसा पर देश की सांप्रदायिक शक्तियां यह आरोप लगाती रही हैं कि वह अपने इस धर्मार्थ आश्रय केंद्र की आड़ में धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देती थीं।

मदर टेरेसा पर तथा उनकी चेरिटेबल संस्था पर उंगली उठाने वालों से क्या यह प्रश्न पूछना मुनासिब नहीं है कि क्या मदर टेरेसा ही उन बेसहारा व उपेक्षा के शिकार लोगों के परिजनों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करती थीं कि वे अपने जिगर के टुकड़ों को, अपने माता-पिता, भाई-बहन, बच्चों अथवा अन्य सगे संबंधियों को अपने घरों से बाहर निकाल कर सड़कों पर खुले आसमान के नीचे भटकने के लिए मजबूर कर दें? कुछ वर्ष पूर्व चंडीगढ़ स्थित पी जी आई के मुख्य द्वार के बाहर फुटपाथ पर एक बुजुर्ग व्यक्ति असहाय अवस्था में पड़ा हुआ कराह रहा था। पूछने पर पता चला कि वह पंजाब का रहने वाला है तथा उसका बेटा व बहु उसे इलाज हेतु पी जी आई लाए थे। दवा इलाज व तीमार दारी से तंग आकर यह परिवार अपने बुजुर्ग पिता को अस्पताल के बाहर ही लावारिस अवस्था में छोड़कर चला गया। अच्छी खासी जमीन-जायदाद की हैसियत रखने वाला वह बुजुर्ग स्वयं स्वाभिमानी सा प्रतीत हो रहा था। शायद इसीलिए उसने अपने घर वापस जाने की गुहार किसी से नहीं लगाई। इसके बजाए उसने वहीं बैठे-बैठे अपने जीवन के शेष दिन गुजारने का फैसला किया। अंत में न जाने उस बदनसीब बुजुर्ग का क्या हुआ और वह कहां गया।

यह ख़बर चंडीगढ़ के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थी। कई दिनों तक यह बदनसीब बुजुर्ग पीजीआई के बाहर पड़ा रहा। परंतु उसके पास न किसी जमाअत या संघ का कोई धर्मात्मा आया, न ही किसी परिषद् का कोई धर्मोपदेशक। हां इतना जरूर सुना गया है कि शमशान घाट में किसी लावारिस या गरीब व्यक्ति के मर जाने पर उसे चिता हेतु लकड़ी धर्मार्थ ख़ाते से अवश्य मुहैया करा दी जाती है। अब यदि ऐसी अवस्था में किसी बुजुर्ग को किसी भी धर्म या संप्रदाय से जुड़ा कोई धर्मार्थ मिशन उसे आश्रय देता है, उसे वह प्यार, सहारा तथा सुविधाएं उपलब्ध कराता है जोकि उसके अपने परिजनों का कर्तव्य था तो क्या उस बेसहारा व्यक्ति के हृदय में आश्रय देने वाली संस्था के प्रति सद्भाव उत्पन्न नहीं होगा? और यदि यही सद्भाव उसे अपनी पूजा पद्धति तथा धार्मिक सोच में कुछ परिवर्तन लाने हेतु बाध्य करे या वह स्वेच्छा से ही ऐसा करे तो आंखिर इसके लिए बुनियादी तौर पर पहली जिम्मेदारी किसकी है?

पिछले दिनों इसी प्रकार की एक रिपोर्ट देखने को मिली जिससे पता चला कि बैंगलोर होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ने वाले जंगलों के बीच के कुछ किलोमीटर के क्षेत्र में देश के विभिन्न इलांकों से आकर तमाम लोग अपने परिवार के उन जिगर के टुकड़ों को छोड़ आते हैं जो शारीरिक या मानसिक रोगों से ग्रस्त होते हैं। इनमें बच्चे, युवा व महिलाएं भी शामिल होती हैं। जरा कल्पना कीजिए सुनसान सड़क, कभी अंधेरी रात तो कभी बारिश। पूरी तरह लावारिस व्यक्ति, न रोटी, न पानी, न किसी प्रकार का सहारा। हां यदि ‘शुभचिंतक’ के रूप में कभी कोई आते भी हैं तो वे हमारे ही समाज के वह दरिंदे जोकि उन शारीरिक व मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं के साथ बलात्कार कर अपनी वासना की भूख मिटाकर उन्हें फिर वहीं छोड़ देते हैं। उन्हें यह लोग एड्स अथवा गर्भवती होने जैसा ‘वरदान’ तो जरूर दे देते हैं।

परंतु वे न तो इनकी पेट की भूख मिटाते हैं, न ही इन्हें पैसा या आश्रय देने की कोशिश करते हैं। इनके परिवार के लोग इन्हें ऐसे दर्दनाक व भयावह माहौल का सामना करने के लिए जंगलों में छोड़ कर अपने घर वापस आकर चैन की नींद सोते हैं। तथा सुबह-शाम अपने-अपने अल्लाह अथवा इष्ट देव को याद करने, उसे खुश करने तथा उसपर धूप बत्ती, आरती व भजन आदि का शानदार पाखंड पूर्ववत रचने में व्यस्त हो जाते हैं। है कोई किसी संघ, परिषद् या जमाअत का फायर ब्रांड धर्म उपदेशक जिसे इन बेसहारा लोगों की सुध लेने की फिक्र हो?

जी हां यहां भी एक ईसाई समाज सेविका ने अपना एक आश्रय होम केवल इन्हीं हमारे व आपके परिवार के उपेक्षित सदस्यों की सहायता, उपचार तथा संरक्षण हेतु शुरु कर दिया है। कल इस होम पर भी धर्म परिवर्तन कराए जाने का आरोप लगाया जाना निश्चित है। परंतु यह धर्म परिवर्तन न हो इसके लिए देश का कोई मिशन, कोई संस्था, किसी भी संप्रदाय का कोई धर्मगुरु ऐसा नहीं है जो हमारे समाज को यह सद्बुद्धि दे सके कि वे अपने परिवार के ऐसे मजबूर, विक्षिप्त, विकलांग, मंदबुद्धि तथा असहाय लोगों को इस प्रकार लावारिस छोड़ने की कोशिश कदापि न करें। वैसे कलयुग के इस दौर में हमारा यह सोचना भी कभी-कभी अप्रासंगिक सा प्रतीत होता है। कारण यह है कि जिन धर्म उपदेशकों, धार्मिक प्रवचन कर्ताओं,धार्मिक ठेकेदारों तथा धर्माधिकारियों से हम इस प्रकार की सद्बुध्दि बांटने की उम्मीद रखते हैं। प्राय: आजकल वही तथाकथित धर्म के ठेकेदार स्वयं ही किसी न किसी संगीन आरोप से घिरे दिखाई दे जाते हैं। ऐसे में इनसे सामाजिक व पारिवारिक सद्भावना की शिक्षा बांटने की उम्मीद करना ही बेमानी सा प्रतीत होता है।

परंतु इन सब के बावजूद अभी भी हमारे इसी देश व समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ अथवा पूर्वाग्रह के तथा बिना किसी धर्म प्रचार जैसे मिशन को संचालित करने के पूर्णतया निस्वार्थ रूप से ऐसे बेसहारा लोगों की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित किए हुए हैं। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में एक छोटा सा गांव है जहां कुछ निराली प्रवृति के ऐसे लोग रहते हैं जो रचनात्मक रूप से तो पूरी तरह धार्मिक व सामाजिक हैं। परंतु इन चीजों क़ा न तो वे ढोंग करते हैं न ही ढोल पीटते हैं। इस आलेख में जिस प्रकार बैंगलोर के समीप के हाईवे का जिक्र किया गया है ठीक उसी प्रकार मिर्जापुर में भी इसी प्रकार के तमाम लोग अपने परिवार के विक्षिप्त सदस्यों को जाकर छोड आते हैं। यहां पूरा गांव ऐसे बेसहारा विक्षिप्त लोगों की सेवा में हर समय स्वयं को समर्पित रखता है। उनके रहने, खाने-पीने, दवा इलाज, मनोरंजन तथा उनके नख़रे व क्रोध आदि को सहने का पूरा प्रबंध गांववासियों द्वारा सहर्ष व स्वेच्छा से किया जाता है। इस गांव की भी चर्चा चूंकि बैंगलोर की ही तरह काफी क्षेत्रों में फैल चुकी है इसलिए यहां भी विक्षिप्त लोग अपने परिजनों द्वारा निरंतर पहुंचाए जाते रहते हैं।

दिलचस्प बात तो यह है कि बैंगलोर का धर्मार्थ होम तथा मिर्जापुर का उक्त गांव दोनों ही जगहों से कांफी विक्षिप्त लोग ठीक व स्वस्थ भी हो जाते हैं। परंतु इसके बावजूद तमाम परिजन या तो उन्हें वापस अपने घर लाना ही नहीं चाहते या फिर वहां के प्रेम व सद्भाव पूर्ण वातावरण में वे इतना घुलमिल जाते हैं कि ठीक हो जाने पर यह लोग स्वयं अपने तथाकथित परिवार में वापस आने की ख्वाहिश ही नहीं रखते। जाहिर है दु:ख, संकट व बीमारी के समय में जो लोग अपने ख़ून के सगे रिश्तों को लावारिस व बेसहारा छोड़कर चले जाते हैं उन्हें आख़िर अपने परिवार का सदस्य या अपना ख़ून कैसे कहा जा सकता है? वास्तव में उनका असली परिवार तो वही है जहां रहकर उन्हें अपनापन मिला, संरक्षण मिला, सुरक्षा मिली तथा स्वास्थय लाभ मिला। उनके वास्तविक रिश्तेदार भी वही लोग हैं जो उसके प्रति सहानुभूति तथा दयाभाव रखते हैं। ऐसे कई मानसिक व शारीरिक विक्षिप्त लोगों के स्वास्थय लाभ के बाद बेशक उनके मुंह से उनके परिवार व परिवार की बिसरी यादों के किस्से सुनने को जरूर मिलते हैं। परंतु साथ ही साथ उनके मायूस चेहरे यह भी सांफ बयान करते हैं कि उनके साथ उनके अपने ख़ून ने ही धोखा किया है, दंगा किया है, अधर्म किया है। तथा साथ ही साथ उनके चेहरे यह भी बयान करते हैं कि उन्हें सहारा देने वाले मिशन तथा इसे संचालित करने वाला परिवार ही उनका अपना सच्चा परिवार व वही सगे रिश्तेदार हैं। ऐसे में स्वास्थय लाभ प्राप्त होने के बाद या उस दौरान उसे स्वयं ही यह सोचना व तय करना है कि वह किस धर्म की परंपराओं पर अमल करे। उनका जिन्होंने उसे ठोकर मारकर घर से निकाल दिया या फिर उनका जिन्होंने अवतार का रूप धारण कर उन्हें संरक्षण, सुरक्षा व स्वास्थय लाभ देकर नया जीवन दिया।

8 Responses to “धर्म परिवर्तन को न्यौता देती यह दरकती संवेदनाएं”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    बहन निर्मल जी,
    बड़े कमाल की बात है की केवल इसाई पंथ वालों द्वारा की सेवा ही हमको , मीडिया को दिखाई देती है. बाबा आमटे द्वारा की सेवा की कहीं कोई तुलना है ? जग्गन्नाथ पुरि द्वारा चलाये जारहे सेवा कार्य क्यों उपेक्षित रह जाते हैं ? सबसे बड़ी बात तो यह है कि सनातनियों, सिखों, बौधों द्वारा सेवा कि जाती है तो कभी किसी कि जाती, धर्म नहीं पूछा जाता .. कभी किसीका धर्म परिवर्तन नहीं किया जाता. ऐसी संकीर्ण सोच केवल ईसाईयों कि ही क्यों है? इस अमानवीय सोच का विरोध क्यों नहीं किया जाना चाहिए ? ऐसा अनैतिक व्यवहार करनेवालों को श्रेष्ठ मानना सही नहीं होसकता, एक शरारत, एक षड़यंत्र होसकता है. अनगिनत प्रमाण हैं जिनसे पता चलता है कि भारत को कमजोर बनाने के लिए धर्मांतरण का इस्तेमाल किया जारहा है.
    बहन निर्मल जी और कुछ नहीं तो भारत के ईसाईकरण पर गाँधी जी के विचार ही पढ़ लीजिये, फिर इन विदेशी धर्म प्रचारकों कि प्रशंसा का नैतिक साहस आप नहीं कर पाएंगी.

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    ४) यहां George Mason University, Virginia, में कुछ ४-५ वर्ष पहले, एक “Conversion and Conflict Resolution” Conference हुयी थी। इस टिप्पणीकार को सनातन हिंदू धर्म के २ प्रतिनिधियोमें स्थान मिला था। हिंदू और बुद्धधर्म (कुल ४ प्रतिनिधि) उस Coference में कुछ ऐसे छा गये, कि उस Conference की Proceedings को Publish करनेके प्रस्तावपर, इसाइ प्रतिनिधीयोंके(जिनकी संख्या लगभग ३५-४० थी) विरोधके कारण —वे publish नहीं हो पायी।
    (५) लेकिन एक बात मैं भी मानता हूं, कि सारे समाजको मिलकर इस धर्मांतरण को सीमित करनेके लिए एकजूट होना पडेगा। नहीं तो “विश्व बंधुत्व” में विश्वास करनेवाला, “सर्वेपि सुखिनो संतु….”का उच्च रवसे घोष करनेवाला, भारतीय कहीं, कल “हिंदुओंको नर्कमें भेजनेवाला” ना बन जाए।
    फिर आप जिस सर्व धर्म समभावका आधार लेकर अपना धर्म स्वीकारका अधिकार रखती हैं, वही आधार खोकर अपरिवर्तनीय धर्ममें सदाके लिए श्वेच्छासे मत मतांतरका अपना अधिकार गवां बैठे? या क्या, आप अपनी इस स्वतंत्रता को खोनेके लिए तैयार हैं? वह भी किसी छोटी मोटी भौतिक सुविधा के लिए ?
    (६) क्या आपको पता नहीं है? कि हमारे इतिहासमें, दो नन्हे मुन्ने बालकोनें दिवारोमें चुन जाना स्वीकार किया था, पर धर्मांतरण नहीं? या वे बालक आपकी दृष्टिमें मूरख थे, जो मामूली धर्म जैसी छोटी चीज पर प्राण गवां बैठे? और यदि धर्म इतनीही छोटी चीज है, तो फिर मिशनरी धर्म परिवर्तनपर इतना बल क्यों देते हैं? जिसका फिर आप समर्थन भी क्यों करती हैं?
    (७) १९५६ में धर्मांतरित इसाइयों ने ही पूर्वोत्तर भारतमें राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसादको काले झंडे दीखाए थे। यहां भी कुछ धर्मांतरित इसाई(सारे ऐसे नहीं) ही भारतकी बुराई करते हुए पाए गए हैं।भारतकी कबर खोदते हैं।
    (८) इस लेखकको नोबेल और अन्य पारितोषिकोंके के बारेमें भी अंतर्राष्ट्रीय कूट नीतिका सकारण संदेह है।
    भारतको जिसने हीन दीखानेका प्रयास किया, उसे ऐसे पुरस्कार प्राप्त होनेकी संभावना बढ जाती है।मदर टेरेसा के कारण भारतका गौरव बढा हो, ऐसा तो नहीं दीखाई देता, फिर क्या बेगानी शादीमें अब्दुल्ला दिवाना हो गया है?

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    (३)सनातन धर्मशास्त्र कहते हैं,–> यः तर्केण अनुसंधते स धर्मॊऽवेद न इतरः। अर्थ है–> (जो तर्कसे प्रमाणित किया जाता है, वही धर्म जानो, दूसरा नहीं) पर इसाईयत कहती है (यः धनेन विक्रीयते स रिलीजनोऽ न इतरः।)–> क्यों कि उसके पास तर्क नहीं है।<– नीचे बानगीके रूपमे जिन्होने श्वेच्छासे हिंदू धर्मका स्वीकार किया, विवशतासे नहीं, ऐसे कुछ ही विद्वानोंकी सूचि प्रस्तुत करता हूं।आप देखेंगी कि, यह सारे पढे लिखे ही नहीं ख्यातनाम विद्वान है।
    बहनजी, आज पश्चिममें योग, क्रिया योग, ध्यानयोग, अष्टांग योग, पतंजलि योगदर्शन, इत्यादिका ज्ञान आदर और सत्कार पा रहा है। पुनर्जन्म, वेदांत, और —-हर गांवमें यहां "योगा" का प्रचार हो चुका है।यह सारे जानकार वैज्ञानिक, अधिवक्ता, प्राध्यापक, अध्यापक, फिलसूफ, लेखक, चिंतक, विद्वान, कवि, …….. पंडित इत्यादि हैं। परिस्थितिसे विवश, निःसहाय, निर्धन, अल्पपठित, परिस्थितिकी मार खाई हुयी हताश जनता नहीं, जिन्हे लालच दे कर हिंदुओंने उन्हे इन विचारोंको स्वीकार करने पर मज़बूर किया हो।

    * Chantal Boulanger – French anthropologist,
    * Job Charnock – British trade agent,
    * Alice Coltrane (raised Baptist but became a follower of Satya Sai Baba)- American jazz pianist, organist, harpist, and composer
    * Russell Brand – British actor,
    * Bhagavan Das (born Kermit Michael Riggs) – Western Yogi
    * Roy Eugene Davis – American Kriya Yoga teacher
    * Krishna Dharma – British author and convert to Gaudiya Vaishnavism under ISKCON
    * David Frawley – author on Hinduism, Yoga and Ayurveda
    * George Harrison – popular English musician, best known as a member of The Beatles]
    * Christopher Isherwood – Anglo-American novelist
    * Swami Kriyananda (born J. Donald Walters)
    * Timothy Leary – Harvard professor,

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    (१) आदरणीया बहन निर्मलाजी।आप के लेखका सार है, कि, किसीको दुःखदायी अवस्थामें सहायता देनेपर आपको उसकी निष्ठा/श्रद्धा को भी खरीदनेका अधिकार प्राप्त होता है। आप ही के इस तर्क को क्षणभर स्वीकार कर मैं पूछता हूं, कि, किसी महिलाको, कोई पराया पुरूष, उसकी विपन्नावस्थामें आर्थिक सहायता करता हैं, तो उस पुरूषको क्या अधिकार है, कि उस महिलाकी निष्ठाओं को छीनकर उससे वह जो चाहे, वह करवा सके? धार्मिक निष्ठा और दंपति निष्ठा दोनोभी तो, निष्ठाएं ही है।और किसीके लिए, धर्म निष्ठा, दंपति निष्ठाके समान ही हो सकती हैं। सचमें दम्पति निष्ठा धर्म निष्ठा का ही एक पहलु है।

    (२) य़ुरप और अमरिकामें ईसाइयतका र्‍हास हो रहा है। क्यों कि आज तर्कका युग चल पडा है। रविवारीय चर्च प्रवचनोमे सम्मिलित श्रोताओंकी संख्या निरंतर घट रही है। कुछ वर्ष पहले पढा था, कि सैंकडो चर्च बिक रहे हैं। इस क्षतिकी पूर्ति करनेके लिए फसल {“rich harvest of souls in the third millennium in Asia–पोप २”,} कटाई एशियामें करो, ऐसा निर्देश स्वतः पोप-२ ने दस वर्ष पहले दीया था, यह सर्व विदित है।
    चीन और सभी इस्लामिक देशोमें धर्मांतरणपर प्रतिबंध है। तो सारी फसल भारतमें ही काटनी पडेगी, ऐसा इस निर्देशका अर्थ होता है।

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  5. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    hindu dharm ke logo ko dharm ko “dhandha” nahi banana he,agar ap kisi bhi vykti ki kisi bhi prakar se sahayata karate ho or badale me kuchhh bhi chahate ho to ese “dhandha” hi kahate he “seva” nahi.apako kya pta kitane sahayta kendra khol rakhe he hinduo ne???sabse jyada hindu sangatano ne hi khol rakhe he na ki “dhandha” karane vale missinaries ne,visvas nahi hota to savym chechk kar lijiyega.

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  6. mansoor ali hashmi

    निर्मलाजी आपके सवाल अनुत्तरित ही रहने वाले है, हम लोगों को इंसानों से ज़्यादा अपने-अपने धर्मो से प्यार है. धर्मो को हम नहीं बचा सके तो अगली नस्लों के पास लड़ने के लिए कुछ बचेगा नहीं, जीवन नीरस हो जाएगा.

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  7. wani ji

    aadarniya Nirmal ji, aap ka lekh bahut achchha hai…par kuchh sawal jaroor hai mere … 1. kya bina dharm parivartan karaye seva nahi ki ja sakti 2. kya vo paise jo mother teresa upayog karti thi(is punit ishwariya karya me) vo unhone apani jeb se lagaya tha ya Misionaries aur cristian NGO se daan me mila 3. ye log kahte hai ki yesu ne hame prem karna sikhaya hai(mai khud sun chuka hu) to kya baki dharmo ne gala dabane ki shiksha di hai. 4. Bharat ke zande me 3 rango ka kya matlab hai ye bachha bhi janta hai to fir ye log safed rang ko isaiyat ka pratik kyu batlate hai 5. kya kewal hindu dharm ke garibo ko hi seva ya dharm parivartan ki avashyakta hai? kya kabhi misionaries dwara Arab desho me dharm parivartan ki khabar suni hai? ya bharat ke anya dharmo me dharm parivartan karane ki khabar suni hai? ( Suresh chiplunkar ji ka aankhe kholane wala lekh unke blog par avashya pade “Mother teresa ek gadhi gayi sant” ) Is desh ki vidambana kah lo ya durbhagya ki hinduo ke paksh me bolne wale sampradayik karar diye jate hai…aur kuchh hindu hi samaj sudharne ke nam par dusare dharmo ki anargal bakwas yaha paroste hai

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