डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी  

डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए

अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें

यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ

इक बार जो गयी तो फिर न आएगी

यहाँ शौक महँगा है लबों पे हँसी रखने का

अपनी आबरू का ख़याल जो न रख सके तो

मरना भी है बेकार किसी को जिंदगी देकर

तूफ़ान में पहुंची है कश्ती साहिल तक मेरी

‘राहत’ बुज़ुर्गों की दुआ-ए-सलामती का असर है

 

3 thoughts on “दुआ-ए-सलामती

  1. किसको सराहूं, डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ की प्रस्तुति “दुआ-ए-सलामती” अथवा उस पर की गई श्री हरी बिंदल जी की प्रतिक्रिया? यह बुजुर्गों की दुआ-ए-सलामती ही थी जो सदियों से अतिक्रमियों, आक्रमणकारियों, फिरंगियों तथा विशेषकर तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात से ही दशकों कांग्रेस-राज स्वरूप तूफानों में से हो कर आज हिन्दू बहुसंख्यक भारत में युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व के अंतर्गत राष्ट्रीय शासन स्थापित हुआ पड़ा है|

    बहादुर शाह ज़फर के शब्द “दो गज जमीन भी न मिली कूए यार में” वतन की याद दिलाते दिल को दहला देते हैं| उर्दू को और अच्छी उर्दू और हिंदी को और अच्छी हिंदी और इस तरह किसी अन्य भारतीय मूल की भाषा को और अच्छी भाषा बनाने में ही हिंदुत्व झलकता है| बिंदल जी से मेरा निवेदन है कि भाषा में व्यक्त किये विचारों में परिपक्वता और भाषा की गुणवत्ता को देखें जो हमारे जीवन का आधार बन हमें सभ्य सुशील सशक्त व समृद्ध नागरिक बनाती है| विडंबना तो यह है कि कांग्रेस राज में एक बहुत घिनौने व भयंकर षड्यंत्र के अंतर्गत समस्त भारतीय जनसमूह को एक डोर से बांधने में समर्थ हिंदी भाषा को रुचिकर बनने ही नहीं दिया गया| मीडिया द्वारा रोमन लिपि में लिप्यंतरण हिंदी भाषा की आत्मा, देवनागरी, को ही नष्ट किये हुए है| यहीं प्रवक्ता.कॉम पर बहुत से लेखकों द्वारा शुद्ध साहित्यिक हिंदी का प्रयोग मुझ बूढ़े पंजाबी को विश्वास दिलाता रहेगा कि हिंदी भाषा को कभी आंच न आने पाएगी|

  2. चिंता है, लिखने वाले लिखनेमें और प्रवक्ता उर्दु की शायरी छापने को इतना बढावा दे रही है। क्यों ? पहले ही हिंदी का इतना ह्रास हो रहा है,यदि ह्रास बचा नही सकते तो कम से कम उर्दू को इतना बढावा न दें ।देश स्वतंत्र होने तक इक्का दुक्का उर्दू के शव्द सुनने को मिलते थे,अब सारी हिंदी उर्दू शब्दो से भरी पडी है । क्रिपया ध्यानदें।

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