केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।

डॉ नीलम महेंद्र

पुरानी यादें हमेशा हसीन और खूबसूरत नहीं होती। मी टू कैम्पेन के जरिए आज जब देश में कुछ महिलाएं अपनी जिंदगी के पुराने अनुभव साझा कर रही हैं तो यह पल निश्चित ही कुछ पुरुषों के लिए उनकी नींदें उड़ाने वाले साबित हो रहे होंगे और कुछ अपनी सांसें थाम कर बैठे होंगे। इतिहास वर्तमान पर कैसे हावी हो जाता है मी टू से बेहतर उदाहरण शायद इसका कोई और नहीं हो सकता।
दरअसल इसकी शुरुआत 2006 में तराना बुरके नाम की एक 45 वर्षीय अफ्रीकन- अमेरिकन सामाजिक कार्यकर्ता ने की थी जब एक 13 साल की लड़की ने उन्हें बातचीत के दौरान बताया कि कैसे उसकी मां के एक मित्र ने उसका यौन शोषण किया। तब तराना बुरके यह समझ नहीं पा रही थीं कि वे इस बच्ची से क्या बोलें। लेकिन वो उस पल को नहीं भुला पाईंजब वे कहना चाह रही थीं , “मी टू”यानी मैं भी”लेकिन हिम्मत नहीं कर पाईं।
शायद इसीलिए उन्होंने इसी नाम से एक आंदोलन की शुरुआत की जिसके लिए वे 2017 में टाइम परसन आफ द ईयर” सम्मान से सम्मानित भी की गईं।
हालांकि मी टू की शुरुआत 12 साल पहले हुई थी लेकिन इसने सुर्खियाँ बटोरी 2017 में जब 80 से अधिक महिलाओं ने हॉलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे वाइंस्टीन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया जिसके परिणामस्वरूप 25 मई 2018 को वे गिरफ्तार कर लिए गए।
और अब भारत में मी टू की शुरुआत करने का श्रेय पूर्व अभिनेत्री तनुश्री दत्ता को जाता है जिन्होंने 10 साल पुरानी एक घटना के लिए नाना पाटेकर पर यौन प्रताड़ना के आरोप लगाकर उन्हें कठघड़े में खड़ा कर दिया। इसके बाद तो मी टू” के तहत रोज नए नाम सामने आने लगे। पूर्व पत्रकार और वर्तमान केंद्रीय मंत्री एम जे अकबरअभिनेता आलोक नाथरजत कपूरगायक कैलाश खेरफिल्म प्रोड्यूसर विकास बहललेखक चेतन भगतगुरसिमरन खंभाफेहरिस्त काफी लम्बी है।
मी टू सभ्य समाज की उस पोल को खोल रहा है जहाँ एक सफल महिला, एक सफल और ताकतवर पुरुष पर आरोप लगा कर अपनी सफलता अथवा असफलता का श्रेय मी टू को दे रही है। यानी अगर वो आज सफल है तो इस “सफलता” के लिए उसे बहुत समझौते” करने पड़े। और अगर वो आज असफल हैतो इसलिए क्योंकि उसने अपने संघर्ष के दिनों में “किसी प्रकार के समझौते” करने से मना कर दिया था।
यह बात सही है कि हमारा समाज पुरुष प्रधान है और एक महिला को अपने लिए किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है।
लेकिन यह संघर्ष इसलिए नहीं होता कि ईश्वर ने उसे पुरुष के मुकाबले शारीरिक रूप से कमजोर बनाकर उसके साथ नाइंसाफी की है बल्कि इसलिए होता है कि पुरुष स्त्री के बारे में उसके शरीर से ऊपर उठकर कभी सोच ही नहीं पाता। लेकिन इसका पूरा दोष पुरुषों पर ही मढ़ दिया जाए तो यह पुरुष जाति के साथ भी नाइंसाफी ही होगी क्योंकि काफी हद तक महिला जाति स्वयं इसकी जिम्मेदार है।
इसलिए नहीं कि हर महिला ऐसा सोचती हैं कि वे केवल अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर सफल नहीं हो सकतीं किन्तु इसलिए कि जो महिलाएँ बिना प्रतिभा के सफलता की सीढ़ियाँ आसानी से चढ़ जाती हैं वो इन्हें हताश कर देती हैं।
इसलिए नहीं कि एक भौतिक देह जीत जाती है बल्कि इसलिए कि एक बौद्धिक क्षमता हार जाती है।
इसलिए नहीं कि शारीरिक आकर्षण जीत जाता है बल्कि इसलिए कि हुनर और कौशल हार जाते हैं।
इसलिए नहीं कि योग्यता दिखाई नहीं देती बल्कि इसलिए कि देह से दृष्टि हट नहीं पाती।
आज जब मी टू के जरिए अनेक महिलाएं आगे आकर समाज का चेहरा बेनकाब कर रही हैं तो काफी हद तक कटघड़े में वे खुद भी हैं। क्योंकि सबसे पहली बात तो यह है कि आज इतने सालों बाद सोशल मीडिया पर जो “सच” कहा जा रहा है उससे किसे क्या हासिल होगाअगर न्याय की बात करें तो सोशल मीडिया का बयान कोई सुबूत नहीं होता जो इन्हें न्याय दिला पाए या फिर आरोपी को कानूनी सज़ा। हाँ आरोपी को मीडिया ट्रायल और उससे उपजी मानसिक और सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि की पीड़ा जरूर दी जा सकती है। लेकिन क्या ये महिलाएं जो सालों पहले अपने साथ हुए यौन अपराध और बलात्कार पर तब चुप रहीं इनका यह आचरण उचित हैनहींये तब भी गलत थी और आज भी गलत हैं। क्योंकि कल जब उनके साथ किसी ने गलत आचरण किया था उनके पास दो रास्ते थे। उसके खिलाफ आवाज उठाने का या चुप रहने कातब वो चुप रहीं।

 आज भी उनके पास दो रास्ते थेचुप रहने का या फिर मी टू की आवाज़ में आवाज़ मिलाने काऔर उन्होंने अपनी आवाज उठाई। वो आज भी गलत हैं। क्योंकि सालों तक एक मुद्दे पर चुप रहने के बजाय अगर वो सही समय पर आवाज उठा लेतीं तो यह सिर्फ उनकी अपने लिए लड़ाई नहीं होती बल्कि हजारों लड़कियों के उस स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ाई होती जो उन पुरुषों को दोबारा किसी और लड़की या महिला के साथ दुराचार करने से रोक देता लेकिन इनके चुप रहने ने उन पुरुषों का हौसला बढ़ा दिया। उस समय उनकी आवाज इस समाज में एक मधुर बदलाव ला सकती थी लेकिन आज जब वो आवाज़ उठा रही हैं तो वो केवल शोर बनकर सामने आ रही हैं। वो कल भी स्वार्थी थींवो आज भी स्वार्थी हैं। कल वो अपने भविष्य को संवारने के लिए चुप थीं आज शायद अपना वर्तमान संवारने के लिए बोल रही हैं। यहाँ यह समझना जरूरी है कि यह नहीं कहा जा रहा ये महिलाएँ गलत बोल रही हैं बल्कि यह कहा जा रहा है कि गलत समय पर पर बोल रही हैं। अगर सही समय पर ये आवाजें उठ गई होती तो शायद हमारे समाज का चेहरा आज इतना बदसूरत नहीं दिखाई देता। केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा। गीता में भी कहा गया है कि अन्याय सहना सबसे बड़ा अपराध है।

3 thoughts on “केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।

  1. Very balanced article. Seeking fairness for all, men and women. Avenue is not social media but the established legal channels. If the situation is dealt with promptly than postponing too far, will strengthen fairness in our society.
    often the happening of wrong things is not a one way traffic, men or women only. The society need to rise to the cause of fairness to all in addition to the legal pathways.
    shrinarayan chandak

  2. केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा में “महिला होना कुछ खास होता है।“ की लेखिका द्वारा मी टू मूवमेंट के विषय पर प्रस्तुत उनका अपने में अलौकिक दृष्टिकोण स्वाभाविक होते हुए भी भारतीय नारी को फिर से प्रश्नों के कटघरे में ला खड़ा कर देता है| अर्थात शोषित भारतीय नारी पहले भी अकेली थी और आज दूसरों के साथ स्वर मिला उसके बोलने पर लेखिका उसे अकेले छोड़ देना चाहती हैं| क्यों? बता दें कि भारत में सात वर्ष से ऊपर आयु की 51,06,32,022 कन्याओं में सफलता प्राप्त कर चुकी भारतीय नारियों को अंगुली पर गिना जा सकता है! शेष बहुसंख्यक भारतीय महिलाएं किस भाषा में कहें और क्या कहें कि उनकी आवाज इस समाज में एक मधुर बदलाव ला सके?

  3. सच है :——- केवल पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।——–
    ( एक गीत याद आ रहा है – “ हसीनों से अहले वफा मांगते हो, बड़े नासमझ हो ये क्या मांगते हो !” और सबको अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने की आजादी होनी चाहिए पर — उनका अंतिम लक्ष्य ” सर्वे भवन्तु सुखिन: ” भी होना चाहिए — जिस तरह पुरुष अपनी क्षमता-शक्ति का सदुपयोग पूरे परिवार-समाज की भलाई के लिए करता है ( कुछ अपवादों को छोड़कर ) उसी तरह महिलाओं को भी समाज-परिवार का ध्यान रखना चाहिए जैसे कि बहुत हद तक मुस्लिम महिलाएं करती हैं ( तराइन के युद्ध में गोरी की पत्नी अपने पिता से कहकर पूरी ईरानी फौज गोरी की मदद में ले आई थी पर संयोगिता ने ऐसा नहीं किया जबकि सामूहिक बलात्कार उन्हें ही झेलना पड़ा —- )— बाबा लोगों को छोड़ भी दिया जाए ( जबकि बाबाओं के यहां सबसे पहले महिलाओं की ही भीड़ बढ़ती है )आज भी अभिनेत्रियां सीमा पर जूझ रहे सैनिकों पर इल्ज़ाम लगा रही हैं , एक मेजर की पत्नी की शिकायतों पर १९ जेसीओ रैंक के अधिकारी बर्खास्त कर दिये गये हैं, आईएएस मुकेश कुमार व कानपुर के आईपीएस मिस्टर दास को आत्महत्या करनी पड़ी है, एक डीआईजी की बेटी के कारण क्वांटम थ्योरी पर रिसर्च करने वाले भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह एम्स अस्पताल दिल्ली में पड़े हुए हैं — उनकी पत्नी न मदद में आ रही हैं- न तलाक दे रही हैं ( जो महिलाएं और समितियां सोशल मीडिया पर बड़ी- बड़ी बातें करती हैं ये उनकी नैतिक-सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि भारत के महान वैज्ञानिक को बचा लें ) अन्य तात्कालिक उदाहरण गोंडा उत्तर प्रदेश से है , 82 साल के एक बुजुर्ग शिक्षक का रास्ता उनके बगल में रहने वाली पुलिस की एक विधवा ने बंद कर रखा है ( ये रास्ता चकबंदी अधिकारी द्वारा प्रदत्त है – जब तक उस महिला के पति थे सब ठीक ठाक था ) आसपास के सभी दबंग और अविवाहित उस विधवा के साथ हैं क्यों मत पूछिएगा , दूसरी पुलिस की विधवा ने बाहर से आए हुए जमाल नामक व्यक्ति की सहायता से एसडीएम के स्टेऑर्डर के बावजूद उस बुजुर्ग दंपति के खेत में मकान बनवा लिया है और सभी अधिकारियों को मिलाकर ( कैसे नहीं कह सकता क्योंकि कुछ तथाकथित एडवांस जन को अभद्रता की बू आने लगेगी ) CM portal से आई इंक्वायरी जो स्थानीय लेखपाल के खिलाफ थी- डीएम साहब ने उस विधवा सुंदरता में पड़कर उसी लेखपाल को बर्खास्त करने के बजाय इंक्वायरी अफसर बना दिया- निश्चित ही है रिपोर्ट गलत आनी थी – गलत रिपोर्टिंग की चिंता के कारण कचहरी में ही बुजुर्ग शिक्षक को ब्रेन हैमरेज हो गया है पर अभी तक उस पुलिस की विधवा का दिल नहीं पसीजा है– अस्पताल ले जाने के लिए भी उसने रास्ता नहीं खोला है – गड्ढे से होकर जाते समय ऑटो पलटने से बुजुर्ग को भी चोट लगी – उनकी 80 साल की वृद्ध पत्नी का पैर कट गया है – बहू के हाथ में चोट आई है पर उस पुलिस की विधवा ने निर्दयता की हदें पार कर दी हैं और अभी भी रास्ता नहीं खोला है गांव में तनाव है — द्रौपदी की तरह ये दोनों खूबसूरत विधवाएं कभी भी आज का महाभारत करवा सकती हैं , जिन्हें इस समाचार पर संदेह लगे वो बुजुर्ग की पत्नी से ( 9451838619, 6388221888) पर खुद बात कर सकते हैं — ये खूबसूरत विधवाओं के वर्तमान के कारनामे हैं —– मुझे पूरा यकीन है फोन पर बात करने के बाद आप यही कहोगे :———– “ शैतान के दरवाजे पर जिंदगी की भीख नहीं मांगी जाती —– “

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