काँग्रेस पार्टी के लोग आजकल कहने लगे हैं कि उनपर वंशवाद का आरोप व्यर्थ में
लगाया जाता है क्योंकि सभी राजनैतिक पार्टियों अपने के नेताओं के बेटे बहुओं, बेटियों
दामादो, नाती पोतों को चुनावी टिकट दे रही हैं। हाँ,जी, वंशवाद तो उ.प्र. का समाजवादी
पार्टी का भी ग़जब का था। सब यादव ही यादव… बेटा बहू, भाई, भाई भतीज़े चाचा ताऊ
सभी मिलकर उत्तर प्रदेश को चला रहे थे ।शिवसेना का वंशवाद भी भरोसे का है बाल
ठाकरे फिर उद्धव ठाकरे ,ठाकरे.ही…. ठाकरे ….. और भी अंसख्य उदाहरण मिल
सकते पर क्या वाकई ये वंशवाद है?
जब तक माता या पिता की कुर्सी सीधे सीधे उनके बच्चों को न मिले वंशवाद नहीं होता।
दूसरी बात कि निर्णय लेने का अधिकार परिवार का होता है। यों तो अमिताभ
बच्चन का बेटा भी फिल्मों मे है पर अमिताभ बच्चन की जगह तो नहीं है, उनसे कोसों दूर
है।सुनील गवास्कर का बेटा भी क्रिकेट खेलता रहा पर अपने पिता के आसपास भी नहीं
पंहुचा। ये वंशवाद नहीं है।
कांग्रेस का वंशवाद तो वंशवाद से भी एक क़दम आगे है।ऐसा उदाहरण तो ढूँढने से भी देश
के इतिहास मे नहीं मिलेगा, जहाँ बिना एक परिवार के सदस्य की छत्र छाया के पार्टी
निरीह और असहाय महसूस करती है।जहाँ बिना कुर्सी के भी लोग सत्ता मे रहते है। जहाँ
एक परिवार के व्यक्ति के मुख से निकला हर वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है,उनकी पूजा होती
है।जहाँ प्रधानमंत्री राजमाता के निर्देश पर फैसले लेते रहे थे, जहाँ राजकुमार कैबिनेट के
लिये फैसले को फाड़कर रद्दी की टोकरी मे फेंक सकताहै, जहाँ ख़ुफिया सूचना गृह मंत्री
या प्रधानमंत्री से पहले राजकुमार या राजमाता तक पहुँचती रही हो।
खैर ये सब तो पुरानी बाते हैं। कॉग्रेस की करारी हार के बावजूद राहुल गाँधी
के दबदबे में कोई अंतर नहीं आया है। वंशवाद का यह अर्थ नहीं है कि किसी
संस्थान में एक परिवार के दो या तीन लोग हों वह वंशवाद हो जायेगा। कुछ

राजनैतिक पार्टियों में वंशवाद की कोशिशें हुईं पर जो सफलता कॉग्रेस को मिली
किसी को नहीं मिली। लालू ने पत्नी को बिहार का मु. मं. बना दिया, फिर बेटों
को सत्ता सौंपने का नाकामयाब प्रयत्न किया। मुलायम ने बेटे को सत्ता सौंपी तो
ख़ुद बेदख़ल हो गये, वंशवाद बढ़ नहीं पाया। काग्रेस में नरसिम्हाराव या
मनमोहन सिंह तो केयरटेकर प्रधानमंत्री ही रहे। हारें या जीते पार्टी नेहरू गाँधी
परिवार की प्रइवेट लिमिटिड कंपनी ही रहेगी, जब तक वारिस मिलेगा … अब
नेहरू गाँधी के साथ वाद्रा जोड़ने का समय भी आ गया है क्योंकि वारिस तो
वहीं से मिलेगा…….. प्रियंका पहले ही सक्रिय राजनीति में आ गईं है तो वारिस
वाद्रा भी हो सकता है या राहुल को विवाह बंधन में बंधना होगा तब तक कोई
केयरटेकर….. नहीं तो आख़िरी मुग़ल वाज़िदअलीशाह की तरह इतिहास उन्हे
याद रखेगा….. उनके भोले से चेहरे और प्यारे से डिंपल की वजह से…….

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