नरेंद्र मोदी के सामने अर्थव्यवस्था की चुनौतियां

-नरेन्द्र देवांगन-
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आम चुनावों में देश के मतदाताओं ने कांग्रेस की कार्यशैली को पूरी तरह से नकार दिया है। पिछले एक दशक में अपनी सरकार के दौरान कांग्रेस ने देश को अच्छी विकास दर दी थी। एक समय तो यह दर 7.8 प्रतिशत से भी अधिक हो गई थी। लेकिन सरकार के अंतिम दो वर्षों में विकास दर में खासी कमी आई। इसकी वजह थी वैश्विक मंदी और सरकार की लोकलुभावन नीतियों के कारण हुई पूंजी की बरबादी। यूपीए के दस वर्ष के कार्यकाल में भारत की जीडीपी 700 अरब डॉलर से बढ़कर 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गई, लेकिन लोग फिर भी आर्थिक विकास की सुस्त दर और सरकार की कार्य संस्कृति से नाराज थे। उन्होंने चुनावों में पोलिंग बूथों पर अपनी नाराजगी जाहिर की और नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को एक ऐतिहासिक जनादेश दिया।

शासन-प्रक्रिया में सुधार कैसे होगा? लोक प्रशासन पर होने वाला व्यय आज जीडीपी के 8 फीसद के बराबर हो गया है। अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने के बजाय आज वह अर्थव्यवस्था पर ही बोझ बनता जा रहा है। फिर सर्वव्यापी भ्रष्टाचार है। पुलिस में रिपोर्ट लिखाने के लिए पैसा देना पड़ता है। जाम नालियां दुरूस्त करवाने के लिए पैसा देना पड़ता है। सेवाएं सुस्त हैं। सुप्रशासन का मतलब होता है सरकार को अधिक सिटीजन-फ्रेंडली और सेवा उन्मुख बनाना। सुधारों को गति देने के लिए सरकार को बहुत अनुशासित और तत्पर होना पड़ेगा और यह आसान नहीं है। इसके लिए जिस कुशलता की आवश्यकता होती है, वह आसानी से अर्जित नहीं की जा सकती। फिर औद्योगिक विकास के लिए कटिबद्ध सरकार को पर्यावरण के मानकों का भी ख्याल रखना होगा। भारत में यह एक गंभीर मसला है। फिर पर्यावरण के मानकों का ख्याल रखते हुए नया बुनियादी ढांचा एक महंगा सौदा भी है। इसके लिए पैसा कहां से आएगा?

मोदी और भाजपा की जीत का कॉरपोरेट जगत ने भी स्वागत किया है। शेयर बाजार ने संभावित नतीजों की आस में नई बुलंदियों को छुआ। रूपए की कीमत को मजबूती मिली। भारतीय कॉरपोरेट जगत और शेयर बाजार में मौजूद घरेलू विदेषी निवेषक ‘सक्षम व्यक्ति‘ और कारोबार में सहायक सरकार के आने पर जश्न मना रहे हैं, यह जरूरी नहीं है कि ‘मोदी के अर्थशास्त्र‘ का यह पहलू भाजपा को मत देने वाले सभी मतदाताओं को समझ में आए। मोदी ने आर्थिक विकास, नौकरियों का सृजन और प्रभावषाली प्रषासन के मुद्दे पर जोर-षोर से चुनाव प्रचार किया। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को वोट देने वाले मतदाताओं में लगभग 50 प्रतिशत का मानना रहा कि मोदी इन वादों को पूरा करेंगे। हालांकि यहां भी कुछ विरोधाभास बने हुए हैं। खासकर ऐसे क्षेत्रांे में, जहां कॉरपोरेट जगत की उम्मीदों को पूरा करना हो।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा पर शेयर बाजार की अच्छी प्रतिक्रिया इसलिए रही कि गुजरात सरकार का अनुभव बहुत बढ़िया रहा है। लोगों को उम्मीद है कि अब देष में कई अटके हुए कामों को गति मिल सकेगी। दूरसंचार क्षेत्र में भी कई तरह की कानूनी अड़चनें सामने आई हैं, जिनके निराकरण की दरकार है। परियोजनाओं को पर्यावरण से संबंधित मंजूरियां मिलने में काफी दिक्कतें आती हैं। इस तरह की अधूरी परियोजनाओं में पांच लाख करोड़ रूपए तक की पूंजी फंसी होने का अनुमान है। लोगों को उम्मीद है कि मोदी ऐसी समस्याएं सुलझाएंगे और लटकी हुई परियोजनाएं शुरू हो पाएंगी, ताकि इनमें फंसी पूंजी काम आ सके।

यदि आप चाहते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से आगे बढ़े और इस क्षेत्र में रोजगार के मौकों में बेहतर इजाफा हो तो श्रम कानून की समीक्षा करनी ही होगी। देश में फिलहाल श्रम संबंधी कानून बहुत कड़े हैं। इस वजह से काफी लोग यहां कारखाने खोलने में हिचकिचाते हैं, क्योंकि ट्रेड यूनियन बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। देश की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नियंत्रण में है। भारतीय मजदूर संघ श्रम सुधारों और यथास्थिति में बदलाव लाने के पक्ष में नहीं रहता। संगठित क्षेत्र की दूसरी ट्रेड यूनियनों का भी यही हाल है। इसके चलते उत्पादन क्षमता पर असर पड़ता है। मोदी सरकार के लिए ये चुनौतियां आसान नहीं रहेंगी।

नई सरकार के सामने आर्थिक दवाब में चल रहे बैंकिंग सेक्टर की चुनौती है। मौजूदा आर्थिक माहौल के कारण काफी कंपनियां अपने ऋण वापस नहीं कर पा रही हैं। भारत में 10 बड़ी कंपनियां ऐसी हैं, जिन्हें ब्याज चुकाने में ही काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। इन पर बैंकों की बड़ी राषि बकाया चल रही है। ऋणों का भुगतान नहीं करने के कारण देष में सात बड़े बैंक काफी दबाव में हैं। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया तो करीब-करीब दिवालिया ही हो गया था। दो हजार करोड़ रूपए देकर उसे बचाया गया। दरअसल, बैंकिंग सेक्टर के लिए पी. चिदम्बरम के दौर में री-कैपिटलाइजेशन की नीति रही है। इसका परिणाम यह रहा है कि सबसे ज्यादा दिक्कत में आज बैंक ही हैं। उनमें सरकारी हिस्सेदारी 80 फीसदी के आसपास हो गई है। इसलिए नई सरकार के सामने बैंकिंग में सुधार का काम बड़ी चुनौती होगी।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राजकोषीय अनुशासन के साथ मुद्रास्फीति दर काबू में आएगी, तभी भारतीय रिजर्व बैंक भी ब्याज दरें कम कर सकेगा। तभी जाकर निवेष में बढ़ोतरी होगी। एक बड़ी चुनौती नई सरकार के समक्ष यह होगी कि केंद्रीय बजट बनाने के लिए उसके पास सिर्फ छह सप्ताह ही होंगे। जून के अंत तक नई सरकार को यह बजट पेष करना होगा। नए वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था की काफी चुनौतियों से निपटना होगा।
मुद्रा बाजार के संदर्भ में उम्मीद की जा रही है कि मोदी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रूपए की विनिमय दर संभालने के मामले मंे भारतीय रिजर्व बैंक के साथ सहयोग करेंगे। पिछले दो साल में हमने दो तरह के हालात देखे हैं। या तो रूपया बहुत मजबूत होता है, जिससे निर्यातकों को परेशानी होती और उनका फायदा कम होता है। इसके उलट यदि रूपया कमजोर हुआ, तो आयात करना बहुत महंगा पड़ता है। आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन के लिए रूपए की विनिमय दर बड़ी चुनौती है। ऐसे में लोगोें को उम्मीद है कि नई सरकार रिजर्व बैंक के साथ सहयोग करेगी।

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