लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू तो कर दिया लेकिन उसका कितना लाभ हो सकेगा…. यह बड़ा प्रश्न है। कानून को राज्य में लागू करने में तमाम राज्य सरकारें अपनी-अपनी परेशानियां गिनाने लगीं हैं। कहीं धन का अभाव है तो कहीं और कुछ आड़े आ रहा है। इससे कानून के निचले स्तर तक लागू होने में पर सवाल खड़े होने लगे हैं। कानाफूसी हो रही है कि कहीं इसका भी हाल सर्व शिक्षा अभियान की तरह न हो जाए।

………चलो मान लिया जाए की यह कानून सभी राज्यों में लागू हो भी जाएगा। लेकिन उसके दायरे में प्रत्येक बच्चा कैसे आएगा यह मेरी समझ से परे है। बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं? इस पर सोचना जरूरी है। सरकार ने अभी तक जो भी इंतजाम बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए किए वो सफल होते नहीं दिखे, वे या तो स्वत: ही समाप्त हो गए या फिर मात्र ढकोसला बनकर रह गए हैं। ऐसा एक उदाहरण है मिड डे मील। मिड डे मील बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए एक अच्छा विकल्प था। लेकिन भूख से भी बड़ी होती है प्यास। जिससे मिड डे मील का खाना भी बच्चों को स्कूल तक नहीं खींच सका। जिन बस्तियों के बच्चे सुबह से ही साइकिल पर चार-चार बरतन बांध कर पानी की तलाश में कोसों दूर तक जाते हों वे स्कूल तक कैसे पहुंचेंगे यह समझना जरूरी है।

……….मैंने उन बस्तियों के बच्चों के माता पिता से पूछा कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भिजवाते हो। तब उनके सीने में छिपा दर्द बोल उठा-भैया जी कैसे भेजे बच्चों को स्कूल, ऐसी महंगाई में एक अकेले के कमाने से काम नहीं चलता। पेट भरने के लिए सबको काम पर निकलना पड़ता है। कई दफा मुझे और मेरी पत्नी को काम नहीं मिलता ऐसे में बच्चा जो कमाकर लाता है उसी से हम सबके पेट की आग बुझ पाती है। ऐसा नहीं है कि हम बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते बल्कि हम तो चाहते हैं कि हमारे बेटे पढ़-लिख कर साहब बने। पर एक समस्या हो तो सुलझाएं।

फिर मैंने उनसे पूछा और क्या समस्या है? इस पर उसने माथे को सकोड़ा तो उसके माथे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आईं। अब चाहे ये चिंता की लकीरें हो या फिर भरी जवानी में अधिक काम के बोझ से आई कमजोरी की लकीरें हों। उसने कहा कि- भैयाजी आप तो देख ही रहे हैं, गरीब के लिए जीना कितना मुश्किल हो रहा है। मेहनत मजूरी करके हम दो वक्त की रोटी की जुगाड़ तो फिर भी कर लेते हैं लेकिन पीने के लिए पानी की जुगाड़ कहां से करें। नल में पानी आता नहीं नेताजी लोग कुछ करते नहीं। बड़े घर वाले लोगों के यहां तो वो बोरिंग करवा कर या फिर टैंकर भेज कर पानी की खूब व्यवस्था कर देते हैं। पर हम लोगों की कौन सुनता है भैयाजी। पानी के लिए हम पूरे परिवार के साथ सुबह से निकलते हैं तब जाकर कुछ पानी का इंतजाम हो पाता है। इसी फेर में हमारे बच्चे सुबह के वक्त भी स्कूल नहीं जा पाते। अब आप ही बताइये कि किस वक्त और कैसे हमे अपने बच्चों को स्कूल भेज दें।

………अब मैंने उन लोगों के बच्चों से भी बात की तो समझ आया कि उनमें से भी अधिकांश पढऩा लिखना तो चाहते हैं लेकिन जाएं कैसे ये उन्हें भी समझ नहीं आता। उन्होंने कहा-भैया हम लोग सुबह पानी भरने निकल जाते हैं और दोपहर में काम पर अब कब जाएं स्कूल? मेरे पास उनके किसी सवाल का जवाब नहीं था।

पूरी स्थिति को समझने के बाद यह बात निकलकर मेरे सामने आई कि सरकार को पहले लोगों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। तभी उसकी योजनाएं धरातल पर भी पहुंचेंगी और सफल भी हो सकेंगी। किसी महान आत्मा ने ठीक ही कहा है कि-

भूखे पेट भजन न होए गोपाला।

ये ले अपनी कंठी माला।।

अब इसे थोड़ा और मॉडरेट कर लिया जाए तो कोई बुराई नहीं-

सूखे कंठ भजन न होए गोपाला।

ये ले अपनी कंठी माला।।

-लोकेन्द्र सिंह राजपूत

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