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    Homeराजनीतिएक संत को सेवा-संकल्प का प्रतिफल

    एक संत को सेवा-संकल्प का प्रतिफल

    • श्याम सुंदर भाटिया

    कहते हैं, जितना सोना तपता है, उतना ही निखरता है। किसी तपस्वी के कठोर तप पर भी यह कहावत 100 प्रतिशत खरी उतरती है। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुखिया श्री योगी आदित्यनाथ देशभर के मुख्यमंत्रियों में अव्वल आए हैं तो कोई अजूबे की बात नहीं है। यह योगी को 18-18 घंटे की कर्म-पूजा का ही प्रसाद है। मीडिया के एक बड़े घराने की ओर से कराए गए सर्वे में 24 फीसदी लोगों ने दीगर सूबों की तुलना में योगी के काम को सर्वश्रेष्ठ माना है। आश्चर्य यह है, टॉप 10 में भाजपा शासित किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री दूर-दूर तक नहीं है। नतीजन योगी देश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री साबित हुए। यह सर्वे 19 राज्यों, 97 लोकसभा क्षेत्रों और 194 विधान सभाओं के बारह हजार इक्कीस लोगों से संवाद के जरिए हुआ। योगी पिछले साल भी इस सर्वे में अव्वल थे। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल,बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को पीछे छोड़ते हुए यह दर्शाता है, उनकी कार्यशैली में दम है। इस सर्वे में 15 प्रतिशत लोग दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल को लोकप्रिय मानते हैं। खास बात यह है, सर्वे में जो सात सबसे लोकप्रिय सीएम चुने गए हैं, उनमें से छह गैर- भाजपा और गैर कांग्रेसी हैं। सर्वे में गुजरात के सीएम विजय रुपाणी सबसे निचले पायदान पर हैं।  

    असरदार कामकाज को लेकर 15 से 27 जुलाई के बीच हुए सर्वे में इन लोगों ने माना कि यूपी के सीएम सबसे अच्छा काम कर रहे हैं। सर्वाधिक 24 फीसदी लोगों ने यह मोहर लगाई है। मुख्यमंत्रियों के कामकाज के असर को लेकर इन्हीं सवालों को जनवरी में भी किया गया था, लेकिन योगी जी को तब 18 प्रतिशत लोग पसंद कर रहे थे। इसका मतलब साफ़ है, 06 प्रतिशत पसंदगी में इजाफा यह दर्शाता है, योगी को यह संकल्प, समर्पण और सेवा का प्रतिफल है। एक तपस्वी मुख्यमंत्री में जनता के प्रति गजब का जोश और जुनून है। कोरोना महामारी के दौरान का यह अति महत्वपूर्ण उदाहरण उल्लेखनीय है। मुख्यमंत्री अपने पिताश्री आनंद सिंह बिष्ट के देहावसान पर अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं गए। काम के प्रति जुनूनी एवं कर्मठ मुख्यमंत्री योगी ने अपने पिताश्री के निधन पर शोक श्रद्धांजलि देते हए कहा था, यूपी में कोरोना संकट और लॉकडाउन के चलते पिता के अंतिम दर्शन नहीं कर पाएंगे। उन्होंने परिवार से यह अपील भी की थी कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अंतिम क्रिया संपन्न कराएं। आपको जानकर यह आश्चर्य होगा, मुख्यमंत्री को जब पिता के निधन की जानकारी मिली तो वह कोरोना को लेकर आला अफसरों संग मीटिंग कर रहे थे। वह कुछ देर के लिए स्तब्ध और निःशब्द रह गए। फिर भी उन्होंने मीटिंग जारी रखी। उन्होंने परिवार को एक मार्मिक पत्र भी लिखा- अपने पूज्य पिताजी के कैलाशवासी होने पर मुझे भारी शोक है। अंतिम क्षणों में उनके दर्शन की हार्दिक इच्छा थी, लेकिन लेकिन कोरोना वायरस के खिलाफ देश की लड़ाई को यूपी की 23 करोड़ जनता के हित में आगे बढ़ाने का कर्तव्यबोध के कारण मैं नहीं पहुंच सका। अंतिम संस्कार में लॉकडाउन की सफलता और कोरोना को परास्त करने की रणनीति के कारण भाग नहीं ले पा रहा हूं। यह दुर्लभ उदाहरण योगी को दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग बनाते हैं। इससे साफ़ है, योगी अपने आवाम से कितना कनेक्ट हैं। परिवार के दुःख-सुख की तुलना में सूबे का परिवार फर्स्ट है। कोविद और तालाबंदी के प्रति उनकी संजीदगी जगजाहिर है।

    मुख्यमंत्रियों के कामकाज की सर्वे के जरिए पड़ताल में दिल्ली के सीएम श्री अरविन्द केजरीवाल 15% अपने पक्ष में राय पाकर दूसरे नंबर पर रहे जबकि 11% लोगों ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी की वर्किंग को पसंद किया। सर्वे में वह तीसरे नंबर पर रहे। इस सर्वे में 67% ग्रामीण जबकि शेष 33% शहरी जनता थी। सर्वे में यूपी के अलावा  दिल्ली, बिहार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, असम, आंध्रप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु के लोगों से किया गया। सर्वे में 52% पुरुष और 48% महिलाएं शामिल थीं। सर्वे के सैंपल में काश्तकार, नौकरीपेशा, व्यापारी, बेरोजगार, छात्र आदि को शामिल किया गया था।

    सीएम योगी आदित्य नाथ का मूल नाम श्री अजय सिंह बिष्ट है। उनका जन्म 05 जून, 1972 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर के पंचूर गांव में हुआ। गणित में एमएससी की पढ़ाई करने के दौरान 1993 में गुरु गोरखनाथ पर शोध करने गोरखपुर आए। अंततः वह महंत जी शरण में चले गए और दीक्षा ले ली। 1994 में अजय सिंह बिष्ट पूर्ण सन्यासी बन गए। अजय सिंह बिष्ट से अब उनका नाम योगी आदित्य नाथ हो गया। 12 सितंबर, 2014 को गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैधनाथ के देहावसान के बाद इन्हें यहां का महंत बनाया गया। दो दिन बाद इन्हें नाथ पंथ के पारम्परिक अनुष्ठान के अनुसार मंदिर का पीठाधीश्वर बनाया गया।

    योगी आदित्य नाथ का नाम लोक सभा में पहुँचने वाले सबसे कम सांसदों की सूची में शुमार है। गोरखनाथ के मंदिर के महंत अवैधनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। इसके बाद 1998 में वह संसद चुने गए। बाहरवीं लोक सभा में जब वह संसद बनकर पहुंचे तब उनकी आयु मात्र 26 बरस थी। 1998 से 2014 तक हुए संसदीय चुनाव में लगातार पांच बार गोरखपुर से संसद चुनकर जाते रहे हैं। 19 मार्च, 2017 में उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक दल की बैठक में योगी आदित्यनाथ को विधायक दल नेता चुना गया। अंततः वह मुख्यमंत्री के पद पर काबिज हो गए।

    बतौर मुख्यमंत्री साढ़े तीन साल में वह अपनी एंग्री मैन की छवि को विकास पुरुष के तौर पर तब्दील कर चुके हैं। योगी आदित्यनाथ भारतीय जनता पार्टी के पास एक बेशकीमती हीरे के मांनिद हैं। भारतीय जनता पार्टी के यूपी से एमएलसी डॉ. जयपाल सिंह व्यस्त कहते हैं, यूपी के इतिहास में कोई संत पहली बार सीएम बना है। संत जैसा व्यक्तित्व, कृतित्व और चरित्र उनके कामकाज में साफ-साफ़ परिलक्षित होता है। योगी जी के सांसद के तौर पर गोरखपुर में उनके विकास कार्यों और कार्यशैली को मैंने बतौर शिक्षक बहुत करीब से देखा है। अंततः उनका ध्येय उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना है। केंद्र और सूबे की कल्याणकारी योजनाओं का प्रमाणिकता के साथ क्रियांवयन ही योगी जी को सर्वोत्तम सीएम बनाता है। मुख्यमंत्री का पशु प्रेम किसी से ढका-छुपा नहीं है। बदमाशों के प्रति उनके तल्ख तेवरों का नतीजा है, सूबे की कानून बंदोबस्त चुस्त-दुरुस्त है।  मुख्यमंत्री साफ़ कहते हैं, या तो बदमाश जेल में होंगे या फिर उन्हें प्रदेश छोड़कर जाना होगा। डॉ. व्यस्त बताते हैं, मुख्यमंत्री ने गरीबों के हित में सर्वाधिक कार्य किए हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि हो या जन-धन खाता, सभी खातों में केंद्र की सहयोग राशि समय पर पहुंची है। कोरोना संकट के समय कोटा में फंसे यूपी के छात्रों के संग-संग प्रवासी मजदूरों के लिए की गई पहल बेमिसाल है।                    

    श्याम सुंदर भाटिया
    श्याम सुंदर भाटिया
    लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। रिसर्च स्कॉलर हैं। दो बार यूपी सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान और पत्रकारिता में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए बापू की 150वीं जयंती वर्ष पर मॉरिशस में पत्रकार भूषण सम्मान से अलंकृत किए जा चुके हैं।

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