लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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विनोद बंसल

श्री अन्ना हज़ारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छेड़ी गई जंग ने चुनाव सुधारों के विषय में भी एक नई बहस को भी जन्म दिया है। आज लोकतंत्र में वोटर बड़ा है या जन प्रतिनिधि, जनता बड़ी है या संसद, जनता के लोकतांत्रिक अधिकार बड़े हैं या सांसद के विशेषाधिकार, चुने हुए प्रतिनिधि के अधिकार बड़े हैं या उसको चलाने वाली पार्टी के मुखिया के अधिकार आदि अनेक प्रश्न हमें झकझोर रहे हैं। न जनता को अपने अधिकारों का पूरा बोध है और न ही जन प्रतिनिधि को अपने कर्तव्यों की चिन्ता। हमारी शासन प्रणाली भी वोट केंद्रित राजनीति की दलदल में फंस गयी है। जनता को अपनी बेहद जरूरी मांग व अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी लम्बे संघर्ष करने पड़ते हैं। अभी हाल ही में बारह दिन तक चला अनशन पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल तो बन गया किन्तु देश की व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन और जनता के संवैधानिक अधिकारों संबन्धी अनगिनत सवाल हम सबके सामने छोड़ गया। एक स्वस्थ शासन प्रणाली विकसित करने के लिये देश के शीर्ष संस्थानों एवं राजनैतिक व्यवस्था में शीघ्र परिवर्तन करने होंगे। एक ओर जहां देश के कर्णधारों(जन प्रतिनिधियों) को जगाना होगा वहीं दूसरी ओर जनता को भी खडा कर उसकी राजनैतिक जिम्मेवारी सुनिश्चित करनी होगी।

निम्नांकित बिंदु इस दिशा में बड़े प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं:-

1. वोट डालने के अधिकार के साथ कर्तव्य-बोध।

2. वोट न डालने पर दण्ड का प्रावधान।

3. यदि चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशी अयोग्य हों तो किसी को भी न चुनने का अधिकार।

4. चुनाव में खड़े होने के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हो।

5. राजनैतिज्ञों के रिटायरमेंट की भी कोई अवधि हो।

6. जाति, मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा, राज्य के आधार पर वोट मांगने वालों के खिलाफ कार्यवाही।

7. सांसदों व विधायकों के द्वारा किये कार्यों का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) कर उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य हो।

8. सदन व जनता से दूर रहने वाले नेताओं पर कार्रवाई हो।

9. देश के राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र हो तथा सदन का नेता हाईकमान के थोपने से नहीं बल्कि चुनाव से तय हो।

10. देश के अन्दर कानून बनाने या उसमें संशोधन करते समय जनता की राय ली जाए तथा सांसदों को उस संबन्ध में स्वतंत्र मत व्यक्त करने का अधिकार हो।

हालांकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आने से वोट डालना कुछ आसान एवं प्रमाणिक तो हुआ है किंतु अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। आज कम्प्यूटर का युग है, हमें ऐसी प्रणालियां विकसित करनी होंगी जिससे देश का प्रत्येक मतदाता, विशेषतया तथाकथित उच्च वर्ग, जिसमें उधोगपति, प्रशासनिक अधिकारी, बुद्दिजीवी व बड़े व्यवसायी इत्यादि आते हैं, अपनी सुविधानुसार मताधिकार का प्रयोग कर सकें। यह वर्ग ही सही मायने में देश को चलाता है, किंतु देखा गया है कि ये अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। घर बैठे ई-वोटिंग जैसे प्रावधानों पर भी विचार करना होगा। जीवनभर देश से हम कुछ न कुछ लेते ही रहते हैं। आखिर एक वोट भी अपने राष्ट्र के लिये समर्पित नहीं किया तो हमारी नागरिकता किस काम की, ऐसा भाव प्रत्येक नागरिक में जगाना होगा। वोट न डालने पर यदि आवश्यक हो तो दंड की व्यवस्था भी की जा सकती है।

किसी भी मतदाता पर यह दबाव न हो कि चुनाव में खड़े हुए किसी न किसी एक प्रत्याशी को तो उसे चुनना ही है, लेकिन यह दबाव ज़रूर हो कि उसे वोट डालना ही है। इसके लिए ईवीएम में प्रत्याशियों की सूची के अंत में एक बटन – ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं’’ भी हो जिससे कि मतदाता यह बता सके कि सभी के सभी प्रत्याशी मेरे हिसाब से चुनने योग्य नहीं हैं। यदि मतदान का एक निश्चित प्रतिशत ‘‘उपरोक्त में से कोई नहीं’’ को चुनता है तो उस चुनाव में खड़े हुए सभी प्रत्याशियों को अगले कुछ वर्षों के लिये चुनावों से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। ऐसा होने से देश के कानून निर्माताओं (सांसद/विधायक) की सूची में से असामाजिक तत्वों व चरित्रहीन व्यक्तियों को अलग रखा जा सकता है। साथ ही मतदाताओं की इस मजबूरी का फायदा राजनेता नहीं उठा पायेंगे कि उन्हें किसी न किसी को तो चुनना ही है। वर्तमान में भी मतदान केन्द्र पर फ़ार्म 49(O) भर कर मतदाता अपने “नो वोट” के इस अधिकार का प्रयोग तो कर सकता है किन्तु उसका यह वोट न तो गिना ही जाता है और न ही गुप्त मतदान के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा ही कर पाता है क्यों कि यह फ़ार्म सभी पोलिंग एजेन्टों के सामने भरा जाता है।

हमें यदि नौकरी की तलाश करनी है या अपना कोई व्यवसाय चलाना है तो विद्यावान होना बहुत जरूरी है। एक अच्छा पढ़ा लिखा व्यक्ति ही एक अच्छी नौकरी पा सकता है। साथ ही उसके काम करने की एक अधिकतम आयु भी निश्चित होती है। बीच-बीच में उसके कार्यों का वार्षिक मूल्यांकन भी होता है। जिसके आधार पर उसके आगे के प्रमोशन निश्चित किये जाते हैं। आखिर ये सब मापदण्ड हमारे राजनेताओं के क्यों नहीं हो सकते? चुनाव में खड़े होने से पूर्व उनकी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, आयु, शारीरिक सामर्थ्य की न सिर्फ जांच हो बल्कि सेवा निवृत्ति की भी आयु सीमा निश्चित हो।

कहीं जाति पर, कहीं भाषा पर तो कहीं किसी विशेष सम्प्रदाय को लेकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं। जो आम तौर पर कहीं न कहीं, किसी न किसी राजनेता के दिमागी सोच का परिणाम होता है क्योंकि उन्हें तो किसी एक समुदाय की सहानुभूति वाले वोट चाहिये। ऐसी स्थिति में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी राजनेता किसी भी हालत में जनता को इन आधारों पर न बांट सके। चुनावों के दौरान प्रकाशित ऐसे आकड़ों या समाचारों को हमें रोकना होगा जिनमें किसी जाति, भाषा, राज्य, मत, पंथ या सम्प्रदाय का ज़िक्र हो।

जन प्रतिनिधियों की जनता के प्रति एक जबाबदेही होनी चाहिए। जिससे यह तय हो सके कि आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई के पैसों का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। प्रत्येक जन-प्रतिनिधि को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कितने घंटे वह जनता के बीच तथा कितने सदन में बितायेगा। उपस्थिति एक न्यूनतम मापदंड से कम रहने पर, आवंटित धन व योजनाओं का समुचित प्रयोग क्षेत्र के विकास में न करने पर या किसी भी प्रकार के दुराचरण में लिप्त पाये जाने पर कुछ न कुछ दण्ड का प्रावधान भी हो।

जन प्रतिनिधियों के कार्य का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) व उसका प्रकाशन अनिवार्य होना चाहिए। इसमें न सिर्फ आर्थिक वही-खातों की जांच हो बल्कि वर्ष भर उसके द्वारा किये गये कार्यों की समालोचना भी शामिल हो। क्षेत्र की जनता को यह पता लगना चाहिए कि उसके जनप्रतिनिधि ने उनके विकास के लिये क्या-क्या योजनायें लागू करवाईं, किन समस्याओं को लोकतंत्र के मंदिर में उठाया, कितने कानून बनाने में या उनके संशोधनों में अपनी भूमिका सुनिश्चित की तथा क्या उन विधायी कार्यों के निस्पादन के समय अपने क्षेत्र की समस्याओं का भी ध्यान रखा। जिस प्रकार नौकरी या स्कूल से एक निश्चित अवधि से अधिक अनुपस्थित रहने पर विद्यार्थी/कर्मचारी को निकाल दिया जाता है। उसी प्रकार संसद या विधान-सभाओं में भी कुछ इसी तरह के प्रावधान हों।

कभी कभी हमारे प्रतिनिधि भी अपनी पार्टी या सरकार के तानाशाही रवैए के कारण अपने आपको असहाय पाते हैं। देश की राजनैतिक पार्टियों के शिखर पर बैठे राजनेता भी वंशवाद व जातिवाद के स्थान पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चयनित होने चाहिए। सदन का नेता भी सिर्फ़ पार्टी हाई कमान के निर्देश पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक पद्धति से चुना जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त विधायी कार्यों के निष्पादन के समय जन प्रतिनिधि को अपनी बात रखने की पूरी आज़ादी हो, न कि पार्टी हाई कमान का डंडा हमेशा उसके सर पर लटका रहे। आम तौर देखा गया है कि अपने पार्टी हाई कमान की अनुमति से ही कुछ चुनिंदा जन प्रतिनिधि ही मीडिया के सम्मुख अपनी बात रख सकते हैं जबकि सभी जन प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए जिससे वे अपनी क्षेत्रिय समस्याओं को इन माध्यमों से भी उठा सकें। इसके अलावा किसी भी नये कानून को सदन में पारित करने से पूर्व जनता की राय ली जाए।

इस प्रकार जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वच्छंद रूप से राष्ट्रीय जिम्मेदारी समझते हुए एक योग्य व्यक्ति को अनिवार्य रूप से मतदान कर सदन में भेजेगा तथा जन-प्रतिनिधि बिना किसी भय या वोट के लालच के जनहित में रुचि लेगा तथा विधायी कार्यों का निष्पादन निष्पक्षता पूर्वक करेगा तभी होगा सही मायने में भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण।

3 Responses to “चुनाव सुधारों से होगा भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण”

  1. Satyarthi

    अधिकतर विचारक इस बात पर सहमत हैं की देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्रोत हमारी निर्वाचन प्रणाली है. ऐसा माना जाता है की एक लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए कई करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं कुछ पार्टियाँ तो उन्ही प्रत्याशियों को टिकट देती हैं जो पार्टी को एक करोड़ अर्पित करें. चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा दस लाख रूपए निर्धारित है पर यह नियम केवल कागजों पर ही रहता है ऐसे में कोई निस्वार्थ जनसेवक कैसे चुनाव लड़ सकता है. और जो जीत कर आते हैं वह पहले खर्च की भरपाई,अगले चुनाव के लिए तैयारी और अपने तथा परिवार,सम्बन्धिओन,मित्रों,सहयोगिओं अदि तथा पार्टी फंड के लिए पैसा इकठ्ठा करने में जुट जाते हैं. चुनाव खर्च को एक निर्धारित सीमा में नियंत्रित करना पहलां कदम होना चाहिए. चुनाव सम्बन्धी सुधारों की सूची काफी लम्बी है जिसमें पार्टिओं की संख्या कम करना प्रत्यशिओन की योग्यता तथा अयोग्यता निर्धारित करना ,भ्रष्ट सांसदों को संसद से निकालने की प्रक्रिया मुख्य हैं.
    वैसे तो यह भी कहा जाता है की अभी लागू कानूनों का ही यदि ईमानदारी से पालन किया जाये तो भ्रष्टाचार पर पर्याप्त अंकुश लग सकता है. आवश्यकता है की देश के शासन तंत्र के न्याय तथा विधि से सम्बंधित सभी अंग अपना अपना कार्य निष्पक्षता,निष्ठां, तथा कुशलता पूर्वक करें और मुकद्दमों का निपटारा करने में देरी न हो. दुर्भाग्य से हमारे शासकों ने संविधान की मर्यादा का निरंतर उल्लंघन करते हुए संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया जो सत्ताधरिओन के हितों को सर्वोपरि मान कर कार्य करें पुलिस को स्वतंत्रता दिए जाने के सभी प्रयत्न निष्फल सिद्ध हुए. सुप्रीमकोर्ट के आदेशों की भी राज्य सरकारों ने अनदेखी कर दी .ऐसा लगता है की जब तक हमारे राजनेताओं की मानसिकता स्वार्थसाधन को त्याग कर सत्यनिष्ठा तथा न्याय के प्रति समर्पित नहीं होगी कोई भी कानूनी सुधार देश का कल्याण नहीं कर सकता. आवश्यकता है एक अत्यंत शक्तिशाली जनांदोलन की जो राजनेताओं को यह विश्वास दिला सके की भारत की जनता किसी प्रकार के अन्याय,भ्रष्टाचार ,दुराचार ,अकर्मण्यता अथवा कौशलहीनता को बर्दाश्त नहीं करेगी. .
    साथ वर्षों के बाद यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है की क्या ब्रिटिश प्रणाली पर आधारित संविधान हमारे विशाल,विविधता वाले देश के उप युक्त है. काफी समय से हमारे देश में गठबंधन शासन की परंपरा चल पड़ी है जिसमें छोटे छोटे दल जिनके पास दो चार सदस्य हों सर्कार को बनाने या गिराने की शक्ति रखते हैं और किसी पार्टी या गठबंधन को समर्थन देने के लिए सत्ता में अनुपात से बहुत अधिक की भागीदारी प्राप्त कर लेते हैं.क्या आप इसे लोकतंत्र कहेगे. दूसरी ओर देखा गया है की राजनितिक दल बहुमत बनाये रखने या सत्तापक्ष का बहुमत तोड़ने के लिए तरह तरह के हथकंडों का प्रयोग करते हैं सांसदों को खरीदने बेचने के कई मामले उजागर हो चुके हैं. क्या इस प्रकार बनाया गया बहुमत न्यायसंगत है ? शायद अमेरिकी प्रणाली जिसमे देश का मुख्य कार्यकारी अधकारी प्रेसिडेंट होता है,और सीनेट तथा हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेन्तातिव्स के अलग अलग अधिकार हैं तथा प्रेसिडेंट अपनी पसंद के मंत्री चुनता है हमारे देश के लिए अधिक उपयुक्त हो.
    सबसे महत्त्वपूर्ण बात जनता में जाग्रति की है .यदि जनता में उचित प्रकार की जाग्रति हो जाये तो जनतंत्र भी सुधर जायेगा

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  2. Anil Gupta,Meerut,India

    श्री विनोद जी का लेख कुछ बुनियादी सवाल कहदे करता है लेकिन उनके उत्तर सतही प्रतीत होते हैं. मेरे विचार में केवल चुनाव सुधारों से ही देश का भला नहीं हो सकता, हमारी बहुत सी समस्याएं उधर ली गयी शाशन पद्धति के कारन हैं. जो कुछ अंग्रेजों ने १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, १९३५ में कहा, कमोबेश वही हमने लगभग ढाई साल की मशक्कत और बहस के बाद भारत के संविधान के रूप में अपना लिया. जो कुछ अपना हो सकता था उसे मजबूरी मान कर डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी के अध्याय में दाल दिया. जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने यद्यपि मौलिक अधिकारों की तरह ही महत्वपूर्ण माना है तथापि उन्हें मानने के लिए सरकार को बाध्य नहीं किया जा सकता है. उदाहरन के लिए अनुच्छेद ४८ में गोवंश, दुधारू व भारवाहक पशुओं के संरक्षण, संवर्धन की व्यवस्था है लेकिन आज मांस निर्यात के लिए यांत्रिक कत्लगाहों में लाखों गोपशुओं, दुधारू व भारवाहक पशुओं का कटान हो रहा है और इसके विरुद्ध आवाज उठाने पर तुरंत साम्प्रदायिकता भड़काने के आरोप चालू हो जाते हैं. ऐसे ही और भी अनेकों उदहारण हैं. सभाओं व समितिओं के माध्यम से नियम बनाने के उदाहरण वैशाली, लिच्छवी और अनेकों अन्य गणतंत्रों में मौजूद हैं. लेकिन हमारे अंग्रेजीदां संविधान निर्माताओं ने वेस्त्मिन्स्टर से प्रेरणा लेकर स्वतंत्र भारत का संविधान रचा जिसमे ‘स्व’ का सामन्यतया आभाव है. कई देशों के संविधानों की खिचड़ी बनाकर परोस दी गयी. मेरे विचार में केवल चुनाव सुधार की बजाय संविधान की अब तक की प्रगति यात्रा और उसके किर्यान्वयन पर भी एक विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है. संविधान में आर्थिक लोकतंत्र के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है. निकम्मे जन प्रतिनिधियों के विरुद्ध असली मालिक अर्थात ‘वी’ याने लोक या सामान्य जन को कोई अधिकार नहीं है.न्याय व्यवस्था अत्यंत खर्चीली है जो न्याय केन्द्रित न होकर वकील केन्द्रित है. जिसमे सच्चाई की बजाय ‘सबूत’ ज्यादा महत्व पूर्ण है. हजारों की संख्या में आज बजी ऐसे कानून मौजूद हैं जो उपनिवेशिक शाशकों ने हम पर अपनी हुकूमत के लिए बनाये थे और जिनकी स्वतंत्र, संप्रभुतासंपन्न भारत में कोई आवश्यकता नहीं थी. तो मेरे विचार में केवल चुनाव सुधार नहीं बल्कि सम्पूर्ण व्यवस्था ‘सुधार’ की आवश्यकता है. वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था ने निचले स्टार तक भी समाज को भ्रष्ट कर दिया है.मेरा सुझाव है की पंचस्तारिया व्यवस्था हो. ग्राम स्टार पर ग्राम पंचयत, खंड स्तर पर खान्द्पंचायत, जनपद स्तर पर जनपद पंचायत, प्रान्त स्तर पर प्रान्त-पंचायत, और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय पंचायत हो.ग्राम पंचायत में सीधे निर्वाचन हो और सभी ग्राम वासियों का , जो पंद्रह वर्ष से अधिक हो, वोट डालना अनिवार्य हो. उससे ऊपर के सभी चुनावों में केवल एक तिहाई सीटें सीधे चुनाव से भरी जाएँ. एक तिहाई सूची पद्धति से व शेष एक तिहाई निचले स्तर की पंचायत द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से. चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनानेवालों की सात पीढ़ियों को चुनाव के लिए अयोग्य घोषित करने की व्यवस्था हो ताकि हर कोई पाने साथ अपनी आने वाली सात पीढ़ियों को कलंक के भर से मुक्त रखने के लिए गलत आचरण से पूर्व एक हजार बार सोचेगा. देश में नेतिक मूल्यों की स्थापना के लिए ये अति आवश्यक है की हमारे हुक्मरान उच्च नेतिक आदर्श प्रदर्शित करके आम लोगों के सामने अनुकर्णीय उदाहरण प्रस्तुत करें.मतदान के लिए ऐ टी एम् टाइप की पोलिंग मशीनें हों जिनमे पूरे देश के मतदाताओं का डाटा भरा हो. वोटर कार्ड बायोमीट्रिक फीचरयुक्त हो जिसे देश के किसी भी कोने में वोटिंग मशीन में डालने पर उससे सम्बंधित छेत्र का मतपत्र सामने आ जाये और मतदाता इच्छानुसार वोट डाक सके.दो बार लगातार वोट न डालने पर कुछ डिसइंसेंटिव लागू हों.ये केवल रेंडम विचार हैं. विद्वान् लोग और भी सुझाव दें ताकि ये बहस एक मुहीम का रूप ले सके.

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  3. Shailendra Saxena

    हम होंगे कामयाब एक दिन …………

    आजकल राजनीति मैं सुधार की बातें चल रही हैं .
    अनेक प्रकार के विचारक अपने -अपने विचार
    दे रहें हैं .
    परन्तु ऐसा लगता है कि राजनेतिक दलों को इससे कोई सरोकार नहीं है
    भारत के सारे दल जो संसद मैं भ्रस्टाचार समाप्त करने के लिए अन्ना जी या राम देव जी या फिर
    किसी अन्य विचारक का समर्थन करते हैं वे सारे अन्दर ही अन्दर डरें हुए हैं
    उन्हें लगता है कि यदि अन्ना जी का जन लोकपाल बिल पास हो गया तो उनकी चलती हुई दूकान बंद हो जायेगी
    अभी तो अन्ना जी का अनशन समाप्त करना था इसलिए सारे नेता एक ही स्वर से बोलने लगे लेकिन जब
    वोटिंग की बात आएगी तब सबकी पोल खुलती नजर आएगी
    यदि सभी राजनेतिक पार्टियाँ वास्तव मैं भ्रस्टाचार ख़त्म करना चाहती हैं तो वे सबसे पहले यह तय कर लें कि एक नेता को
    एक ही बार या फिर विशेष परिस्थति मैं केवल दो बार ही टिकिट दिया जाएगा उसके रिश्तेदारों को मलाईदार पद नहीं दिए जायेंगे .
    प्रत्येक चुनाब मैं नए उम्मीदवारों , पढ़े लिखे नोजवानो को टिकिट दिया जाएगा .
    चुने हुए जन प्रतिनिधि यदि अच्छा काम नहीं करते तो उन्हें जनता द्वारा रिजेक्ट कर दिया जाएगा .
    जो लोग चंदा देकर चुनाब मैं टिकिट खरीदने की बात करें उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा
    जो लोग अपराधी किस्म के हैं तथा रोव के बल पर जनता को डराकर अपनी फिल्म ज़माना चाहते हैं
    उन्हें टिकिट नहीं दिया जाएगा .
    एक बात समझ नहीं आती की संगठन का पद तो दो वर्ष का होता है (लगभग सभी दलों मैं यही प्राबधान है )
    पर सत्ता का पद पांच वर्ष का होता है
    हम देखते हैं की कोई भी दल का संगठन का पदाधिकारी दो वर्ष के लिए बनाया जाता है पर जो नेता संगठन के नेताओं के
    पैर छु छु कर या अपने आकाओं की चमचागिरी कर के या फिर उनको गिफ्ट अथवा पैसा देकर टिकिट लेने की जुगाड़
    करता है वह पांच वर्ष तक शासन करने का अधिकारी हो जाता है
    कब दूर होगी यह राजनेतिक विषमता ..?
    क्या कोई पार्टी अथवा नेता मेरे इस प्रश्न का जवाब देगा .?
    मैं अच्छी तरह जानता हूँ की इस प्रश्न का जवाब देने की हिम्मत कोई नहीं करेगा क्योकि सच कडवा होता है
    इसलिए मैं यह प्रश्न और इसका उत्तर देश की एक अरब इक्कीस करोड़ जनता पर ही छोड़ रहा हूँ
    जनता ही तय कर ले क़ी वह किसी भी नेता को चाहे वह किसी भी दल का क्यों ना हो एक या फिर विशेष परिस्थिति
    मैं दो बार से अधिक मोका नहीं देगी .
    यदि कोई विधायक या सांसद के पद पर दूसरी बार खड़ा होता है तो उसे हरा कर किसी नए व्यक्ति को ईमानदार को मोका देगी
    यकीं मानिए यदि इस देश की समझदार जनता यह संकल्प ले लेती है तो आधा भ्रस्टाचार तो स्वत ख़त्म हो जाएगा
    नेता खुद नहीं चाहते की कोई सामान्य व्यक्ति आगे बढे ,कोई योग्य व्यक्ति आगे बढे. कोई आम व्यक्ति अच्छा व्यक्ति आगे बढे ?
    यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्यों हर बार टिकिट पाकर
    एन केन प्रकारेण जीतकर विधान सभा मैं या फिर संसद मैं बार बार विधायक व सांसद बनना चाहता है व जनता को ठगना चाहता है .
    इतिहास गवाह है की कई दलों के सांसद व विधायक वर्षों से अपने पद पर जमे बेठे हैं ऐसे मैं वे मिलकर भ्रस्टाचार नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?
    सारे दलों के बड़े नेता मिले हुए हैं .
    क्या कोई नेता ने यह कहा है कि पार्टी का धन्यवाद जो मुझे सांसद बनाया ,विधायक बनाया, नगरपालिका अध्यक्ष बनाया ,जनपद अध्यक्ष बनाया
    या फिर किसी महत्वपूर्ण पद पर बिठाया अब मैं जनता की सेवा करूँगा एक कार्यकर्ता की भांति या फिर एक समाज सेवी की भांति जन हित के कार्य करूँगा
    मुझे नहीं लगता की पुरे देश मैं दो चार ऐसे नेता मिल जायेंगे जो मेरी इस बात को कह सकें
    अन्ना जी व उनके सहयोगियों को भी आम व्यक्ति का समर्थन आने वाले चुनाब मैं करना चाहिए , युवा उम्मीदवारों का समर्थन करना चाहिए तभी उनको भी देश मैं सम्मान
    प्राप्त होगा यदि भे भी किसी की चाल मैं आ गए तो फिर सुधार की संभावना … का भगवान् ही मालिक है …
    पर अभी जो माहोल निर्मित हुआ है उसे देखकर लगता है की विवेकानंद जी के सपनो का भारत का निर्माण होने जा रहा है ..
    युवा शक्ति अब जाग गई है ….भ्रष्ट लोगों को अब अपने बोरिया बिस्तर बाँध ही लेना चाहिए .
    मैं आपके माध्यम से देश भर के सभी सुधारवादियो , परिवर्तन चाहने वालों व सशक्त भारत देखने वालों से,इश्वर वादियों से आदर सहित निवेदन करना चाहता हूँ कि
    परिवर्तन प्रकृति का नियम है … इस उक्ति को स्वीकार करें ,समर्थन दें तथा रास्त्र निर्माण मैं ऋषि दधिची जी के सामान बलिदान होने कि भावना रखते हुए
    अपने देश भक्त होने का परिचय अवश्य दें. मन मैं विश्वास पूर्वक यह भाव रखें कि हम होंगे कामयाब एक दिन …….अपनी भावना व राय से अवगत कराना ना भूलें .
    शैलेन्द्र सक्सेना “आध्यात्म”
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