लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारत में शिक्षा के अधःपतन की आज एक नई खबर आई है। एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश करनेवाले छात्रों की संख्या दुगुनी हो गई है जबकि हिंदी माध्यम की पाठशालाओं में भर्ती सिर्फ एक-चाथाई बढ़ी है। याने अंग्रेजी माध्यम हिंदी माध्यम के मुकाबले चार गुना ज्यादा बढ़ा है। हिंदी माध्यम के छात्र 8.4 करोड़ से 10.4 करोड़ हुए हैं जबकि अंग्रेजी माध्यम के छात्र डेढ़ करोड़ से तीन करोड़ हो गए हैं। अंग्रेजी माध्यम के छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा कहां बढ़ी है? हिंदी राज्यों में! हिंदी राज्यों में बिहार, उ.प्र., हरयाणा और झारखंड आदि में अंग्रेजी-माध्यमवाले छात्रों की संख्या कहीं 50 गुना, कहीं 47 गुना, कहीं 25 गुना और कहीं 20 गुना बढ़ गई है।
क्यों बढ़ रही है, यह संख्या? क्या इसलिए कि अंग्रेजी बहुत सरल, बहुत वैज्ञानिक, बहुत समृद्ध भाषा है? नहीं बिल्कुल नहीं। अंग्रेजी का व्याकरण, उसकी शब्दावली, उसके उच्चारण उसके अर्थ इतने अटपटे हैं कि उसके सुधार के लिए अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार बर्नार्ड शॉ ने एक न्यास की स्थापना की थी। भारत में अंग्रेजी सिर्फ इसलिए पढ़ी जाती है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में वह अनिवार्य होती है। यदि अंग्रेजी को भर्ती परीक्षाओं में एच्छिक कर दिया जाए तो बेचारी अंग्रेजी अनाथ हो जाएगी। उसे कौन पूछेगा? अभी गरीब लोग भी अपना पेट काटकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में इसीलिए पढ़ाते हैं कि वे नौकरी दिलाने में मददगार होंगे। ज़रा सोचिए बिहार-जैसे प्रांत में यह भगदड़ क्यों मची है? इन हिंदी प्रांतों में इन स्कूलों की दशा क्या है? यह सबको पता है।
अंग्रेजी माध्यम से विभिन्न विषयों की शिक्षा देने का अर्थ है, बच्चों की बुद्धि को ठप्प करना! मैं दुनिया के लगभग 80 देशों में गया हूं। सिर्फ भारत-जैसे पूर्व-गुलाम देशों को छोड़कर किसी भी संपन्न और विकसित देश में बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से नहीं पढ़ाया जाता है। सबसे ज्यादा बच्चे किस विषय में फेल होते हैं? अंग्रेजी में! सबसे ज्यादा समय और श्रम किस विषय को सीखने में लगता है? अंग्रेजी को। यदि भारत को महाशक्ति बनना है तो उसे अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा। यदि कोई छात्र स्वेच्छा से अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाएं पढ़ना चाहें तो उन्हें पूरी छूट मिलनी चाहिए लेकिन अंग्रेजी का थोपा जाना एकदम बंद होना चाहिए।

6 Responses to “अंग्रेजी माध्यम पर प्रतिबंध लगे”

  1. इंसान

    “अंग्रेजी माध्यम पर प्रतिबंध लगे” शीर्षक ने ही मेरी भर्त्सना और मेरे आक्रोश को आमंत्रित कर मुझे सोचने को बाध्य कर दिया है कि लेखक मानसिक रूप से अस्वस्थ है। अभी तो सार्वजनिक हित लेखक द्वारा इस विषय पर कहने लिखने पर प्रतिबन्ध अवश्य लगाना चहिये।

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  2. मनोज ज्वाला

    manoj jwala

    अय्यर जी, आपकी बातों में विरोशाभाष है / वैदिक जी की बातों विरोध करते हुए आप भी तो वही कह रहे हैं जो वैदिक जी ने कहा है / आप कह रहे रहे हैं- ” जरुरत होगी तो लोग मजबुरन हिन्दी पढेंगे , हम जरुरत तो पैदा करें “/ जरुरत पैदा करने के लिए ही तो जरुरी है कि सरकारी नौकरियों में भर्ती सम्बन्धी अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की जाए / वैदिक जी का सुझाव अंग्रेजी को पंगु करने नहीं है, बल्कि देश की गतिशीलता को तेज करने का है / रही भाषा के प्रवाह की बात, तो सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो जाने के बाद भी अगर कोई अंग्रेजी पढना चाहे तो वैदिक जी उसे पढने अथवा पढाये जाने से मना कहां कर रहे हैं / सरकारी कामकाज में हिन्दी को भी अंग्रेजी की तरह ही अहमियत मिलने के बाद भाषा-प्रवाह का हाल कैसा होगा, इस ओर वैदिक जी ने इशारा किया है, जबकि आप हिन्दी को अंग्रेजी के समान राजकीय संरक्षण दिए बगैर अंग्रेजी को प्रवाहमान बता रहे हैं /

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    • M. R. Iyengar

      मनोज जी,
      मेरे लेख में विरोधाभास नहीं बल्कि आपके समझने में फेर है. मैंने कहा है कि हिंदी सीखने की जरूरते पैदा करके तो मजबूरन लोग हिंदी सीखेंगे. लेकिन आप का अभिप्राय लग रहा है कि कानून के दबाव से मजबूरियाँ पैदा की जा सकती हैं. यदि ऐसा होता तो राम मंदिर कब का बन गया होता. हिंदी राजभाषा ही क्यों राष्ट्रभाषा भी बन गई होती. गाँधी जी भी प्रयास करके हार गए. फिर किसी की क्या मजाल कि मजबूरी तैयार कर दे. इसका एक ही सरल व निष्कंटक उपाय है कि अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा में उपलब्ध ज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराया जाए. दूसरी भाषा की सारी सुविधाएं हिंदी में ही उपलब्ध कराई जाएं. हमारे लोग अमेरिका कनाड़ा जाकर जो प्रोग्राम बनाते हैं वे मजबूर किए जाएं कि सारे प्रोग्राम हिंदी में भी बनाए जाएँ. तभी यह संभव हाय यदि डं़े के ल पर भाषा पर जोर आजमाना चाहते हैं तो प्रयास कीजिए मुँह की खाएँगे. समाज- भाषा की धारा को कानून से बदला नहीं जा सकता. क्या आप आज आ रहे पश्चिमी फेशन को कानून से रोक पाएंगे??? कृपया पुनर्विचार करें कि आपने जो टिप्पणी की है वह कितनी हास्यास्पद है.

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  3. विकास कुमार साह

    मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ, सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन से कार्य करने को कहा जाता है। राशी भी दी जाती है पर कार्य नहीं होता।अब वक्त आ गया है कि हिन्दी का जो विरोध करे अथवा अँग्रेजी ही उसे ज्ञान की भाषा लगे वे यूरोपीय देश जहाँ अँग्रेजी बोली जाती हो वहाँ अपने बाल बच्चों समेत जा कर बस जाए। बनारस में रहना है तो बाबा जी (बाबा विश्वनाथ) का सहना है वैसे ही भारत में रहना है तो हिन्दी को सहना है।वैसे भी हिन्दी प्राथमिक राजभाषा (Primary Official Language) है अँग्रेजी (Secondary Official Language) है पर कोई काम करने नहीं देता।इनसे इनकी सत्ता छीन जाएगी, इसलीए अँग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखो और हिन्दी का नौटंकी किए जाअो। अब प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं केवल और केवल दबाब। मोदी सरकार को हिन्दी भाषीयों ने वोट दिया है न की तमिल, बाँगला या अन्य भाषा भाषीयों ने, मोदी जी हिन्दी को बदौलत प्रधानमंत्री बने है और वे मानते भी है इस बात को ,फिर हिन्दी को लागू करने में ये राजनीतीक हिचक कैसी।यथाशिघ्र हिन्दी को संयुक्त राष्ट संघ और भारत में पूरी बुलंदी के साथ स्थापित किया जाए। जय भारत , जय हिन्दी ।

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    • M. R. Iyengar

      विकास जी,

      मैंने पहली बार पढ़ा है कि हिंदी को प्राथमिक राजभाषा व अंग्रेजी को सेकंडरी ऑफिशियल लेंग्वेज कहा है. कृपया संविधान के उस पृष्ट को यहां उद्धृत करं या मेरे निजी मेल में भेज कर ज्ञान वर्धन करें. मेरा मेल laxmirangam@gmail.com है. आपकी एक और दुर्भावना को दूर करना चाहता हूँ कि मोदी को हिंदी भाषियों ने वोट दिया है. ऐसा प्रचार ना करें अन्यथा मोदी के लिए अगला चुनाव दूभर हो सकता है.

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  4. M. R. Iyengar

    वैदिक जी,
    आपके अंग्रेजी के प्रति द्वेष ने तो निरुत्तर ही कर दिया. डॉ. ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी ने सिखाया था कि किसी की लकीर को छोटा करना हो तो उससे बड़ी एक लकीर खींचो, न कि खींची हुई लकीर को मिटाकर कम करो. शायद आप इससे सहमत नहीं हैं. भाषा प्रवाह को रोकना जन मानस की बात है किसी अधिकार तले यह संभव नहीं है. हिंदी को समृद्ध बनाकर ही इसमें सुधार हो सकता है, अंग्रेजी को पंगु बनाकर नहीं. जरूरत होगी तो लोग मजबूरन हिंदी सीखेंगे . हम जरूरत तो पैदा करें. देश में उतनी नौकरियाँ नहीं हैं जितने पेशेवर पैदा किए जा रहे हैं. इसलिए पलायन होगा ही और पलायन के लिए अँग्रेजी जरूरी है.

    ऐसी भावोत्तेजक लेख से हिंदी का भला होना तो रहा – वे लोग जो हिंदी के प्रति जुझारू हैं – अपना मुँह मोड़ने लगेंगे.

    अयंगर

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