कोरोना का चमत्कार तब्लीगी हुए बेनकाब

इतिहास में ऐसी अनेक घटनाएं मिलती हैं जिनसे यह ज्ञात होता रहा हैं कि बुराईयों में भी अच्छाईयां छिपी होती हैं।आज भारत सहित विश्व के अधिकांश देश कोरोना रूपी महामारी का शिकार हो रहे हैं। इस आपदा में तब्लीगी जमातियों का निज़ामुद्दीन मरकज से निकल कर देश के विभिन्न भागों में जाना और वहां कोरोना वायरस को फैला कर उससे अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करने का दु:साहस क्या संकेत देता हैं? क्या कोरोना के रूप में आये जैविक जहर का चमत्कार उसे शस्त्र बनाने वाले तब्लीगियों की जिहादी मानसिकता को बार-बार बेनकाब नहीं कर रहा हैं?
यह कैसा भयावह संयोग हैं कि आज दुनिया के लगभग समस्त देशों को एक अदृश्य चमत्कारी शत्रु के समक्ष जूझते रहने को विवश होना पड़ रहा हैं। साथ ही इसके सारथी बने तब्लीगी बेनकाब हो रहे हैं।  सभ्य समाज जो कि सदियों से इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित हैं, उसने भी अभी तक तब्लीगियों के ऐसे दुराचारी व अत्याचारी रूप को कभी नहीं देखा होगा। उदारवादी समाज ऐसे हठधर्मियों की थूकने, छींकने व मल-मूत्र आदि द्वारा आक्रमण करने की इतनी अधिक घृणित व शत्रुतापूर्ण मनोवृत्ति वाले आचरण को देख कर बार-बार स्तब्ध हो रहा है।

वर्षों पूर्व श्री प्रकाश सिंह (पूर्व डीजीपी उ.प्र.) जब 1963-73 में केंद्रीय गुप्तचर विभाग में कार्यरत थे तब उन्होंने केंद्र सरकार को इस जमात से जुडी विशेष गोपनीय सूचनाएं दी थी। लेकिन दुर्भाग्यवश मुस्लिम परस्त नीतियों के कारण उन गम्भीर राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बंधित गुप्त सूचनाओं की अनदेखी होती रही। पिछले दिनों एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में छपे समाचार से ज्ञात होता हैं कि श्री प्रकाश सिंह के कथनानुसार “जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का एक बडा कारण जमात है। यहां संस्था के लोग दो दशक से लोगों का मन परिवर्तित करते आ रहे हैं। यह इस्लाम के नाम पर युवाओं को देश की संस्कृति से दूर करके ग्लोबल जिहाद का नारा देकर इस्लामिक स्टेट और हरकत-उल-मुजाहिद्दीन जैसे खतरनाक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित कर रहे हैं। सीमापार आतंकी संगठनों में भर्ती के लिये घाटी के युवा जाते हैं तो उनसे सबसे पहले यही पुछा जाता हैं कि क्या तब्लीगी जमात में प्रशिक्षण लिया हैं? हाँ कहने वाले युवाओं को आतंकी संगठनों में वरीयता पर शामिल  किया जाता हैं।” समाचार के अनुसार उन्होंने वर्तमान स्थिति पर चिंता करते हुए कहा कि “कोरोना के कारण ही इन तब्लीगी जमातियों का असली रूप सामने आया हैं। वह जिस तरह से चिकित्सकों और पुलिसकर्मियों के साथ पेश आ रहे हैं, यह बताने के लिये काफी है कि जमातियों को न तो देश से प्रेम है और न यहां के कानून से। सरकार को अब इनसे इन्हीं की भाषा में बात करनी होगी। पूरे देश में तब्लीगियों से जुड़े लोगों का पुराना रिकार्ड खंगाला जाए।”

यह कैसी विडम्बना है कि करोड़ों-अरबों रुपया व्यय करने वाले गुप्तचर विभाग द्वारा देश को आतंकवादियों से सुरक्षित करने के लिये किये गये कठिन परिश्रम को मुस्लिम तुष्टीकरण की भेंट चढा दिया जाता हैं।
इस वर्ष के आरम्भ से ही कोरोना वायरस का प्रकोप फैलने लगा था। फिर भी तब्लीगियों ने इस महामारी की चुनौतियों की अनदेखी करते हुए अपने धार्मिक सम्मलेन सप्तरी (नेपाल, 15-17 फरवरी)  कुआलालम्पुर (मलेशिया, 27 फरवरी से 1मार्च), लाहौर (पाकिस्तान,11-12 मार्च)  व दिल्ली (13-15 मार्च)  में आयोजित किये। क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि ये धार्मिक उन्मादी आपदा को बढाने में सहायक बने ? विश्व में तब्लीगी जमात से जुड़े लगभग एक सौ देशों के 8 करोड़ से अधिक सुन्नी देवबंदी मुसलमान सक्रिय हैं। क्या यह कहना सर्वथा उचित नहीं होगा कि दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर पश्चिमी अफ्रीका तक सुन्नी मुसलमानों के देशों में इन तब्लीगियों ने कोरोना संक्रमण को पहुंचाया है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में कोरोना विस्फोट के सर्वाधिक दोषी अरबों की सम्पत्ति अर्जित करने वाला
निजामुद्दीन मरकज व तब्लीगी जमात का प्रमुख मौलाना साद को बार-बार नोटिस दिया जाने के उपरांत भी उस पर अभी तक कोई ठोस कार्यवाही न होने से ऐसा संदेह होता हैं कि शासन किसी राजनैतिक दबाव में विवश हो रहा हैं। जबकि देश के विभिन्न प्रदेशों में इन भागने व छिपने वाले देशी-विदेशी तब्लीगियों की अनेक आपराधिक धाराओं में धरपकड़ जारी हैं। कांग्रेस के एक प्रमुख नेता श्री अभिषेक सिंघवी ने भी पिछ्ले दिनों ट्विट किया है कि “जानबूझ कर वायरस फैलाने वालों पर न केवल आईपीसी की धारा 269-271 के अन्तर्गत कार्यवाही करनी चाहिये बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एन.एस.ए.) में भी नापा जाना चाहिये, तभी वे मानेंगे।”

देश के विभिन्न क्षेत्रों से नित्य आने वाले समाचारों में मुख्यतः एक ओर कोविड -19  महामारी व दूसरी ओर तब्लीगी जमात के ही चर्चे हैं। जिससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि कोरोना वायरस से संक्रमित तब्लीगियों व उनके सम्पर्क में आने वाले तब्लीगी जमातियों को एक समान पाठ पढाया गया हैं। इनके साथ उचित व्यवहार व उपचार करके इनके जीवन को सुरक्षित करने के लिए समर्पित स्वास्थकर्मियों, डॉक्टरों, सफाईकर्मियों व सुरक्षाबलों से असभ्य व्यवहार करने वाले ये तब्लीगी जिनको धर्म उपदेशक भी कहा जाता है, क्या मानवीय संवेदनाओं से शून्य हैं? ऐसे तब्लीगियों व इनको भगाने व छिपाने वाले जमातियों व उनके सहायकों पर जब प्रशासकीय कार्यवाही होती है तो उन पर थूकना, छींकना व गाली-गलौच करते हुए आक्रामक हो जाना क्या न्यायसंगत हैं ? यह कितना विचित्र है कि आप अपने जीवन को संकट में डाल कर छूआछूत रूपी महामारी के जीवाणू से ग्रसित किसी के जीवन को सुरक्षित करना चाहते हैं परन्तु  वह उल्टा आपको भी इस मौत में अपना साथी बनाने के लिये हमलावर हैं। यह भी चिंतन करना होगा कि आज जिस प्रकार से कोरोना योद्धाओं पर देशवासी पुष्प वर्षा करके और देश की सशस्त्र सेनाएं विभिन्न प्रकार के आयोजन करके उनका आभार व्यक्त कर रहीं हैं, वहीं ये तब्लीगी जमाती अपनी दूषित मनोवृत्ति के वशीभूत विष वमन करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

अगर निजामुद्दीन मरकज, नई दिल्ली में मार्च में हुए लगभग 65 देशों से आये तब्लीगियों के सम्मेलन के बाद से यदि 40 दिनों के ही समाचारों को उलट-पलट कर देखा जाए और उनका उल्लेख किया जाय तो इनकी जिहादी सोच पर एक पूरी पुस्तक बन सकती हैं। अत: यहां सूक्ष्म में यह लिखना ही पर्याप्त होगा कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगभग सम्पूर्ण देश में एक समान दुराचार किस मानसिकता का दुष्परिणाम है? क्या इसके पीछे अपने को श्रेष्ठ मानने वाले शान्तिप्रिय समुदाय के तब्लीगियों का कोई सुनियोजित षड्यंत्र तो नहीं ? नि:सन्देह जब यह स्पष्ट है कि यह महामारी समान रूप से सभी का संहार कर रही है तो फिर तब्लीगियों ने इसका आत्मघाती बम के समान दुरूपयोग क्यों किया? क्या यह विचार करना अनुचित होगा कि धर्म विशेष की जिहादी सोच के वशीभूत उन्हेें ऐसा करने को उकसाया गया। इन तब्लीगियों को चमत्कार के रूप में मिला कोरोना वायरस क्या वैश्विक जिहाद में अब तक के सबसे बडे नरसंहार का कारण बनेगा? 

यह शाशवत सत्य है कि करोड़ों-करोड़ों देशवासियों के अथक परिश्रम से राष्ट्र का निर्माण होता है और यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया हैं। इसमें बाधक धर्मान्ध तब्लीगियों, जिहादियों व देशद्रोहियों का केवल एक सूत्री लक्ष्य है भारत का विध्वंस। जब तक ऐसे विद्रोही तत्वों पर राष्ट्रद्रोह जैसे अपराध आरोपित नहीं किये जायेंगे, तब तक राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पित देशभक्तों के जीवन को सुरक्षित कैसे रखा जा सकेगा? अत: आज जब यह सत्य है कि “जहां-जहां जमाती वहां-वहां कोरोना” मौत की महामारी बन कर तांडव कर रहा है तो देश-विदेश में फैले हुए इन तब्लीगी जमातियों को कठोर कानूनों के बन्धन में जकडना आवश्यक हो गया है। कोरोना के इस चमत्कार ने तब्लीगियों को बेनकाब करके मानवतावादी समाज को उनसे सतर्क रहने का स्पष्ट संदेश दिया है। ध्यान रहे कि उदारता और सहिष्णुता का अर्थ राष्ट्र के अस्तित्व की रक्षार्थ मौन रहकर अत्याचार सहना नहीं होता।

विनोद कुमार सर्वोदय

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