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बंशीधर मिश्र

अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे

तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब

पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार…

गजानन माधव मुक्तिबोध की ये पंक्तियां कई दशक पहले जिन संदर्भों में लिखी गई थीं, भले वे बदल गए हों पर हालात बिलकुल नहीं बदले। भले ही भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता हो पर असल मायने में यह आजादी किताबी सच बनकर रह गई है। संसद से लेकर सड़क तक सच बोलने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष तमाम पाबंदियां और अनगिनत खतरे हैं। सच बोलना और लिखना आज भी सलीब पर चढ़ने जैसा है। अमूर्त और अदृश्य व्यवस्था पर पोथियां लिखने वाला कोई व्यक्ति जब गली के किसी गुंडे को टोक देता है, तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है। मंत्री के खिलाफ आवाज उठाने वाले की जुबान खींच ली जाती है और नौकरशाह के खिलाफ कुछ लिखने-कहने वाले को जेल में ठूंस दिया जाता है।

भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र माना जाता है। हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था शेर और मेमने को एक साथ रहने, विचरने, आजीविका के साधन ढूंढ़ने की छूट देती है। यहां पर विचारों की आजादी है। आप कुछ भी सोच सकते हैं। मसलन, एक मजदूर को भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने का अधिकार है। उसके भी मत की उतनी ही कीमत है जितनी किसी भी खरबपति उद्योगपति, बड़े नौकरशाह और देश के राष्टÑपति एवं प्रधानमंत्री की होती है। उसे भी अंबानी, टाटा और बिड़ला बनने का संवैधानिक अधिकार है। उसे मुंगेरी लाल के हसीन सपने तो देखने का अधिकार है पर गारंटी किसी भी चीज की नहीं है। वह शाम के वक्त की रोटी किस तरह जुटाएगा, सुबह के वक्त किसी शहर के लेबर चौराहे पर जब वह खड़ा होगा, तो उसके श्रम को खरीदने कोई आएगा या नहीं, इस बात की देश की व्यवस्था के पास कोई गारंटी नहीं।

हमारे देश में कोई भी अकिंचन, मजदूर और किसान भूख से दम तोड़ने की नैसर्गिक आजादी रखता है पर उसे आत्महत्या का अधिकार कदापि नहीं। यह ढोंग भारत ही नहीं, दुनिया के उन तमाम देशों में बदस्तूर कायम है जो अपने को लोकतंत्र और मानवधिकारों का अलमबरदार कहते हैं। अमेरिका में सभी को सब कुछ करने की आजादी है। उसी आजादी का नतीजा है कि वहां बलात्कार और हत्या की दर दुनिया में सर्वाधिक है। पर आधुनिक विश्व में आर्थिक व पहिया का चक्का घुमाने वाले पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे बड़े सौदागर भी वही है। जो जब चाहें जहां चाहें युद्ध की विभीषिका छेड़ दें। दशकों तक चला वियतनाम युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक की तबाही इसी का नतीजा थी।

दरअसल, यह हर पूंजीवादी व्यवस्था की अवश्यंभावी बुराई है। बल्कि यूं कहें कि यह उसका उपोत्पाद है। जान पड़ता है कि लोकतंत्र पूंजीवाद के फलने फूलने की सबसे मुफीद राजनीतिक व्यवस्था है। इसीलिए आर्थिक विषमताओं का ज्वार यहां देखने को मिलता है। भारत में हर साल लाखों लोग भूख से दम तोड़ देते हैं पर दुनिया के सौ सर्वाधिक धनी लोगों में कई भारतीय हैं। अंबानी और टाटा दुनिया के तमाम देशों को खरीद लेने की ताकत रखते हैं।

काल मार्क्स के शब्दों में पूंजी चुराया हुआ श्रम है। श्रम की चोरी पर पूंजी का साम्राज्य खड़ा होता है। जब इसके साम्राज्य को कहीं से भी चुनौती मिलती दिखाई पड़ती है, तो पूंजीपति हमलावर हो उठता है। इराक के पूर्व राष्टÑपति सद्दाम हुसैन और अमेरिका के बीच सिर्फ एक बात का झगड़ा था। सद्दाम का तर्क था कि तेल हम पैदा करें, तो फिर उसका दाम अमेरिका क्यों तय करेगा? जार्ज बुश दुनिया की उन पांच बड़ी तेल कम्पनियों के मालिक हैं जो कि पेट्रोलियम पदार्थों पर एकाधिकार रखती हैं। सद्दाम उनकी सत्ता को चुनौती दे रहे थे। इराक पर हमले का मात्र यही एक कारण था। एक समूची सम्यता तबाह कर दी गई। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले देश ने जिस बर्बरता, हैवानियत और दादागीरी का परिचय दिया वह इतिहास में बेमिसाल है। इराकी युद्ध बंदियों के साथ कुत्तों से भी बदतर सुलूक किया गया। यह पूंजीवाद का भयावह साम्राज्यवादी चेहरा है।

भारत में मुंबई शहर में एक साहसी पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या कर दी गई। डे ने मुंबई के तेल माफियाओं पर कई सनसनीखेज खबरें लिखी थीं। उन्होंने अंडरवर्ल्ड की तिलस्मी दुनिया पर भी दो किताबें लिखी थीं। पूंजीपति एक सीमा तक चुनौती को खामोश झेलता है। इसके बाद वह पूंजी की ताकत के बल पर उस चुनौती को जड़ से उखाड़ देता है। कानून बिकाऊ है। सरकारें उनकी सरपरस्त होती हैं। संविधान महज छलावा है। पूरे देश में जेडे की हत्या के विरोध में पत्रकारों और समाजसेवियों की आवाजें मुखर हो रही हैं। पर सरकार और व्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? जंगल में मेमने की आजादी का कोई मतलब नहीं। शेर का निवाला बनना उसकी नियति है। लोकतंत्र में जंगलराज होता है। यहां बड़ी पूंजी और छोटी पूंजी को निगल जाती है। वैश्विक बाजार के हमले में करोड़ों दस्तकार, शिल्पकार इतिहास के पन्नों में दफन हो गए। यहां मत्सय कानून चलता है। यानी बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। क्योंकि वही उसका आहार है। वह मांसाहारी होती है। सच और सच का झंडा उठाने वालों की स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था में मेमने जैसी हो गई है। यही तो युवा संत निगमानंद का हुआ।

साम्यवाद और समाजवादी व्यवस्थाओं में ऐसा नहीं होता। वहां अभिव्यक्ति की आजादी नहीं। उत्पादन को निजी हाथों में रखने की इजाजत नहीं होती। जो कुछ भी है, वह राज्य का है। हर हाथ को काम यानी सभी की आजीविका की गारंटी राज्य की जिम्मेदारी होती है। हर काम राज्य के लिए किया जाता है। इसीलिए हर किसी को उसकी नैसर्गिक क्षमता गुणों और जरूरतों के हिसाब से हक मिलता है। उत्पादन और उसके लाभांश में समान भागीदारी होती है। साम्यवाद का केंद्र आर्थिक समानता और आर्थिक आजादी है जबकि लोकतंत्र की बुनियाद व्यक्ति की आजादी पर गढ़ी जाती है। सैद्धांतिक दृष्टि से दोनों कहीं से एक दूसरे के विपर्यय नहीं लगते पर व्यावहारिक रूप में दोनों कभी एक दूसरे से मिल नहीं पाते। क्योंकि सिर्फ एक व्यक्ति की असीमित आजादी की चाह पूरी धरती के संसाधनों को अपने में समेट लेना चाहती है। मनुष्य जब अपनी इच्छाओं पर लगाम नहीं लगा पाता, तो वह निरंकुश तानाशाह बन जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में पूंजी के स्वामी प्राय: ऐसे हो जाया करते हैं। पंूजी की ताकत अंततोगत्वा राज्य की ताकत पर भारी पड़ने लगती है। बाजार सरकार पर भारी पड़ने लगता है। सरकार भी बाजार की भाषा बोलती है।

आज स्थिति बहुत जटिल हो चुकी है। व्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार पंूजी के हिंसक जाल में फंसकर दम तोड़ रहा है। सरकारें मनुष्य और समाज की नहीं, बाजार और पूंजी की भाषा बोलती नजर आ रही हैं। चेहरा बचाने के लिए सरकार कहती है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनेगा। पर पत्रकार ही क्यों, सच कहने वाले हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं? पर सच तो यह है कि सरकार पूंजी की गुलाम है। व्यवस्था के भीतर सरकार, बाजार, पूंजी, माफिया नेता व अफसरों का गठजोड़ बन गया है। यही गठजोड़ व्यवस्था का नियामक बन गया है। इसको चुनौती देना सूली पर चढ़ने जैसा है। पर जे डे जैसे कुछ तो हैं, जो बिना डरे सूली पर चढ़ते रहेंगे।

3 Responses to “उठाने होंगे अभिव्यक्ति के खतरे”

  1. vimlesh

    Remedy
    पिछले तीन साल में सोनिया की सरकारी ऐश का सुबूत

    मित्रों सोनिया गाँधी के उपर सरकार ने पिछले तीन साल में जीतनी रकम उनकी निजी बिदेश यात्राओ पर की है उतना खर्च तो प्रधानमंत्री ने भी नहीं किया है ..

    एक सुचना के अनुसार पिछले तीन साल में सरकार ने करीब

    एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये

    सोनिया के विदेश दौरे के उपर खर्च किये है ..

    कैग ने इस पर आपति भी जताई तो दो अधिकारियो का तबादला कर दिया गया .

    अब इस पर एक पत्रकार रमेश वर्मा ने सरकार से आर टी आई के तहत निम्न जानकारी मांगी है :

    १- सोनिया के उपर पिछले तीन साल में कुल कितने रूपये सरकार ने उनकी विदेश यात्रा के लिए खर्च की है ?

    २- क्या ये यात्राये सरकारी थी ?

    3- अगर सरकारी थी तो फिर उन यात्राओ से इस देश को क्या फायदा हुआ ?

    4- भारत के संबिधान में सोनिया की हैसियत एक सांसद की है तो फिर उनको प्रोटोकॉल में एक राष्ट्रअध्यछ का दर्जा कैसे मिला है ?

    5- सोनिया गाँधी आठ बार अपनी बीमार माँ को देखने न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में गयी जो की उनकी एक निजी यात्रा थी फिर हर बार हिल्टन होटल में चार महगे सुइट भारतीय दूतावास ने क्यों सरकारी पैसे से बुक करवाए ?

    6-इस देश के प्रोटोकॉल के अनुसार सिर्फ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ही विशेष विमान से अपने लाव लश्कर के साथ विदेश यात्रा कर सकते है तो फिर एक सांसद को विशेष सरकारी विमान लेकर विदेश यात्रा की अनुमति क्यों दी गयी ?

    7- सोनिया गाँधी ने पिछले तीन साल में कितनी बार इटली और वेटिकेन की यात्राये की है ?

    मित्रों कई बार कोशिश करने के बावजूद भी जब सरकार की ओर से कोई जबाब नहीं मिला तो थक हारकर केंद्रीय सुचना आयोग में अपील करनी पड़ी .

    केन्द्रीय सूचना आयोग प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय के गलत रवैये से हैरान हो गया .और उसने प्रधानमंत्री के उपर बहुत ही सख्त टिप्पडी की ..

    केन्द्रीय सूचना आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी दौरों पर उस पर खर्च हुए पैसे को सार्वजनिक करने को कहा है। सीआईसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को इसके निर्देश भी दिए हैं। हिसार के एक आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय से सोनिया गांधी के विदेशी दौरों, उन पर खर्च, विदेशी दौरों के मकसद और दौरों से हुए फायदे के बारे में जानकारी मांगी है।

    26 फरवरी 2010 को प्रधानमंत्री कार्यालय को वर्मा की याचिका मिली, जिसे पीएमओ ने 16 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय को भेज दिया। 26 मार्च 2010 को विदेश मंत्रालय ने याचिका को संसदीय कार्य मंत्रालय के पास भेज दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय के इस ढ़ीले रवैए पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सूचना आयुक्त सत्येन्द्र मिश्रा ने निर्देश दिया कि भविष्य में याचिका की संबंधित मंत्रालय ही भेजा जाए। वर्मा ने पीएमओ के सीपीआईओ को याचिका दी थी। सीपीआईओ को यह याचिका संबंधित मंत्रालय को भेजनी चाहिए थी।

    आखिर सोनिया की विदेश यात्राओ में वो कौन सा राज छुपा है जो इस देश के ” संत ” प्रधानमंत्री इस देश की जनता को बताना नहीं चाहते ?

    अरे भाई है कोई पढ़ा लिखा जो इस अनपढ़ को बताये की अपनी सोनिया भौजी ने जो रकम उड़ाई (एक हज़ार आठ सौ अस्सी करोड रूपये) है वह अंको में किस प्रकार लिखी जाएगी
    इस गरीब का तो दिमाग ही चकरा रहा है i

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    “इसीलिए हर किसी को उसकी नैसर्गिक क्षमता गुणों और जरूरतों के हिसाब से हक मिलता है। उत्पादन और उसके लाभांश में समान भागीदारी होती है। साम्यवाद का केंद्र आर्थिक समानता और आर्थिक आजादी है” काश !यह वास्तविकता होती?पर ऐसा है नहीं.साम्यावाद के बहाने राज्य ने केवल व्यक्तियों का शोषण किया है और उसी के फल स्वरूप हालत यह हो गयी है की कुछ वर्षों बाद कार्ल मार्क्स केवल पुस्तकों तक सीमित हो जायेंगे.

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  3. vimlesh

    भ्रस्ताचारियो की माया है कही धुप कही छाया है

    इस भ्रस्ताचार को मिटने में १ और मर गया तो कौन सा फाड़ टूट गया यही देश के निति निर्माताओ की सोच है
    .
    स्विस बैंकिंग ऐसोसिएशन की 2008 की रिपोर्ट, जो अब जारी की गई है के अनुसार स्विट्जरलैंड से मिले आंकड़ों के अनुसार विश्व के सभी देशों के काले धन से ज्यादा अकेले भारत का काला धन स्विस बैंकों में जमा है। स्विस बैंकों में कुल जमा भारतीय रकम 66,000 अरब रुपए(1500 बिलियन डॉलर) है। भारत के बाद काला धन जमा करने में रूस, 470 बिलियन डॉलर, ब्रिटेन, 390 बिलियन डॉलर और यूक्रेन 100 बिलियन डॉलर का नंबर है। इन देशों के अलावा बाकी विश्व के अन्य सभी देशों का मिला जुला काला धन 300 बिलियन डॉलर है।
    भारत से लंबे समय से विदेशों में पैसा जमा किया जाता है। स्विट्जरलैंड तो केवल एक देश है, इसके अलावा कई देशों में भारतीयों का धन जमा है। ये देश वे देश हैं जहां सरकारें खुद इस तरह की कमाई को जमा करने के लिए प्रोत्साहन देते हैं।
    यह काला धन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, आईएएस, आईपीएस और उद्योगपतियों का माना जाता है। यह रकम भारत पर कुल विदेशी कर्जे का 13 गुना है। हर साल यह रकम तेजी से बढ़ रही है लेकिन सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है।
    भारत में आज भी करीब 45 करोड़(450 मिलियन) लोग गरीबी रेखा से नीचे का जीवन बिता रहे हैं। उनकी रोजाना की औसत आमदनी 50 रुपयों से कुछ ही ज्यादा है। यदि भारत का विदेशों में जमा काला धन भारत लाया जाता है तो केवल कुछ ही घंटों में देश की काया पलट हो सकती है। न केवल गरीबों का जीवन स्तर सुधरेगा बल्कि विदेशों का सारा कर्ज भी उतर जाएगा। और यदि पूरे देश पर कोई कर नहीं लगाया जाए तो भी सरकार अपनी मुद्रा को अगले 30 साल तक स्थिर रख सकती है।
    भारत से औसतन 80,000 लोग हर साल स्विट्जरलैंड की यात्रा करते हैं और इनमें से 25,000 लोग अक्सर ही इस देश की यात्रा पर जाते हैं। सरकार यदि केवल इन 25,000 लोगों पर ही कड़ी नजर रखे तो काफी कुछ खुलासा हो सकता है। हालांकि स्विट्जरलैंड सरकार ने इस मामले में पहले भी भारत की मदद नहीं की है लेकिन यदि भारत सरकार लगातार दबाव बनाए तो भारत को इन भ्रष्ट तत्वों की जानकारी मिल सकती है।

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