लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

नवउदारवादी,बाजारीकरण की आधुनिकतम व्यवस्था में मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का प्रवाह अवरुद्ध सा होता जा रहा है. एक ओर आमरण अनशन की धमकियों का कोलाज़ व्यक्ति विशेष की मर्जी को पोषित नहीं किये जाने पर बदनुमा दाग बनता जा रहाहै,दूसरी ओर सम्पदा के विन्ध्याचल मेहनतकश जनता के सूर्य का रास्ता रोकने पर अडिग हैं.गरीब बच्चों के एडमीशन नहीं हो रहे, कालेजोंस्कूलों में या तो जगह नहींया पहुँच वालों ,पैसे वालों ने अपनीअपनी जुगाड़ जमा ली है.महंगी किताबें,आसमान छूती फीस और कोचिंग की मारामारी में अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ उच्च मद्ध्य्म वर्ग तक सिमिट गई है.पेट्रोल,डीजल,केरोसिन और रसोई गैस में हो रही मूल्यवृद्धि हर महीने अपने कीर्तिमान पर पहुँच रही है.अब विदेशी काले धन ,भृष्टाचार और लोकपाल के लिए अनशन की नौटंकी करने वाले चुप हैं.

वेशक भृष्टाचार ने पूरे देश को निगल लिया है किन्तु उसके खिलाफ संघर्ष करने का माद्दा किसी व्यक्ति विशेष या संविधानेतर सत्ता केंद्र में नहीं हो सकता.हजारे और रामदेव के दिखावटी दांतों में दम नहीं कि उसकी चूल भी हिला सकें.वेशक एक जनतांत्रिक समाज में सभी को ये हक़ है कि देश के हित अनहित को अपने अपने ढंग से अभिव्यक्त करे.अन्ना,रामदेवया अन्य समकालिक स्वयम भू अवतारी{नेता नहीं?}पुरुषों कोभी अपनी राय रखने का अधिकारहै.किन्तुकिसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव नहीं कि एकव्यक्तिया समूह कीरायको सवा अरब लोगों पर जबरन थोप दी जाए.किसी गैर राजनीतिक वफादारी या किसी खास राजनीतिक पार्टी के अजेंडे को आगे बढ़ानेके लिए जन-लामबंदी गैर बाजिब है.यदि कोई व्यक्ति जिसे धार्मिक ,आध्यत्मिक या योग विद्द्या से लाखों लोगों की वफादारी हासिल है तो वह इस वफादारी का इस्तेमाल निहित स्वार्थियों की राजनैतिक आकांक्षा पूर्ती का साधन नहीं बना सकता.

यदि अपने अराजनैतिक कृत्य से आकर्षित जन-समूह को वह किसी अन्य खास और गुप्त राजनैतिक अजेंडे के प्र्योनार्थ इस्तेमाल करने की चेष्टा करेगा तो सिवाय पूंजीवादी अमानवीय भृष्ट व्यवस्था के साक्षात्कार के उसकी नज़रों में बाकी सब शून्य होता चला जायेगा.

एक धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक व्यवस्था के भीतर शासक वर्ग को भी यह अख्तियार नहीं की किसी खास बाबा या स्वयम्भू नेता की जिद पूर्ती करे.यदि कोई दल या सरकार किसी खास धरम मज़हब या गुट की धमकियों के आगे झुकती है या राजनैतिक छुद्र लाभ के लिए नकारात्मक नीतिगत समझौता करती है तो यह भी निखालिस तुष्टीकरण नहीं तो और क्या है?

हमारा निरंतर ये प्रयास रहना चाहिए कि भ्रष्टाचार,कालेधन और अन्य किसी भी मूवमेंट के नाम पर ठगी न हो.वास्तविक संघर्ष की पहचान तो तभी सम्भव है जब पूंजीवादी मूल्योंकि ,महंगाई की,बेरोजगारी की ,धार्मिक संस्थानों में अवैध धन की और परलोक सुधरने के नाम पर खुद का यह लोक सुधारने वालों की भी इन अनशनों ,धरनों और धमकियों में जिक्र हो.

5 Responses to “भ्रष्टाचार विरोध के बहाने जनतंत्र पर हमला ..बहुत नाइंसाफी है”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    तिवारी जी महाराज ,मैंने पहले भी लिखाहै की आप को मुद्दे को टालने और आपनी ही गोल मटोल बातों को दुहराते जाने में महारत हासिल है. सच पूछिए तो आप भी स्टालिन के बताये हुए उसी रास्ते पर चल रहे हैं,जहाँ उसने कहा था की एक झूठ को सौ बार दुहराओ तो वह सच लगने लगेगा.रामनारायण जी ने तो आपको बहुत विस्तृत रूपमें उत्तर दिया है,पर मैं इतना ही काहूंगा की मेरे जिस उद्धरण की आप बार बार उपेक्षा करने का ढोंग कर रहे हैं,आपके सारे प्रश्नों का उत्तर वही है.

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  2. Ram narayan suthar

    माननीय तिवारीजी आपके आलेखों को में बहुत ध्यान प्रुवक पढता हु प्रायकर आपके सभी आलेखों में निजी स्वार्थ की बू आती है आपका हर एक आलेख कुटिलता व् भर्ष्टाचार से सजा हुआ है
    1 अब मत कहना कि कमजोर सरकार है दिल्ली में-समझे बाबा रामदेव…!
    इस आलेख में आपने रामलीला मैदान में जो हुआ उसका खुला समर्थन किया है आपने उस भ्रष्टाचारी तंत्र के अत्याचार को भी लोकतान्त्रिक ठहराने की हर संभव कोशिस की
    क्या इसी लोकतंत्र की आड़ में अपने आपको लोकतंत्र का समर्थक बताते हो

    २ मसखरे लफ़फाज़ ओर ढोंगी बाबाओं से ज़न-क्रांति की उम्मीद करने वालो सावधान!

    इसमें आपने एसा कुछ समझाने की कोशिश की है जैसे भर्ष्टाचार कोई मुद्दा है ही नहीं
    और जो इन मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहा है वो देश की समस्या नहीं बल्कि व्यक्तिगत आकांक्षाओ की सिहरन मात्र है

    ३. विवादों में जनलोकपाल मसविदा समिति
    Saturday, April 23rd, 2011
    इसमें आपने लोकपाल समिति को ही भ्रष्टाचारी करार देने की कोशिस की
    जैसे हॉल ही में हुए भ्रष्टाचार तो इनके आगे नगण्य है

    ४ मात्र-ज़न-लोकपाल विधेयक से ’भ्रष्टाचारमुक्त भारत’ क्या सम्भव है?
    जैसे सरकार इसलिए ही विधेयक को पास नहीं कर रही है
    ५ ज़न-लोकपाल मसौदे पर जनता की राय भी ली जानी चाहिए
    लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों की राय लेना बेहद जरुरी है।
    1एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
    २ एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
    ३ एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
    ४ एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
    ५ एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
    ६ एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
    ७ एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
    ८ एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
    ९ एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
    १० एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
    ११ एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
    १२ एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
    १३ एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
    १४ एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
    १५ एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
    १६ एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
    १७ एक हिंसक और एक अहिंसक;
    १८ एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
    १९ एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
    २० एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
    २१ एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
    २२ एक ब्रहमचारी और एक कामी;
    २३ एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
    २४ एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
    २६ एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
    २७ एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
    २८ एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
    २९ एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
    ३० एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
    31 एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
    ३२ एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
    ३३ एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
    ३४ एक सन्यासी और एक संसारी;
    ३५ एक आस्तिक और एक नास्तिक;
    ३६ एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
    ३७ एक दानवीर और एक भिखारी;
    ३८ एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
    ३९ एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;
    आदि इत्यादी!

    इन लोगो को शामिल करो फिर देखना लोकपाल विधेयक का क्या हश्र होता है क्यों तिवारीजी मानते हो ना आखिर आप चाहते ही यही हो प्रत्यक्ष रूप से तो आप इसका विरोध कर नहीं सकते तो (में आपकी विवशता समझ सकता हु )अप्रत्यक्ष ही सही
    “अन्ना एंड कम्पनी और बाबा रामदेव छलिया थे ,छलिया हैं और छलिया रहेंगे उनकी आलोचना सिर्फ शब्दों में किये जाने पर आप लोगों को तकलीफ क्यों हो रही है”
    आपके साथ क्या छल किया जरुर बताना

    यदि व्यक्तिवादी संविधानेतर सत्ता केन्द्रों को तुरंत नहीं रोका गया तो आज़ादी के ६५ सालों में देश ने जो प्राप्त किया है वो सब मटियामेट हो जाएगा.इसी आशंका के चलते हमें यह लोकतंत्रात्मक नज़रिया पेश करना पड़रहा है
    इस देश ने क्या पाया ६५ सालो में सिवाय भ्रष्टाचार गरीबी भुखमरी के …..
    १९६० में प्रति व्यक्ति आमदनी २ रुपये थी और आज भी वही है अगर रुपये की कीमत के घटाव की दर को जोड़कर देखा जाये तो हम एक सम्र्द्धशाली भारत के निर्माण के लिए इन सबको खोने को तेयार है

    धन्यवाद

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriramt tiwari

    आदरणीय रामनारायण जी और रमेश सिंह जी की प्रतिक्रयाएं मानो प्रतिक्रियावादी सोच की अभिव्यक्ति ही हैं.दोनों ने मेरे आलेख के मूल तत्व को विस्मृत कर अपनी अलग ही पुरानी ढपली बजाने का प्रयत्न किया है.रमेश जी बार-बार अपने एक मई के उद्धरणों को बलात पेश कर रहे हैं.रामनारायण जी आलेख को पढ़े विना ही पूंछ रहे हैं कि भृष्टाचार को समूल नष्ट करने और काले धन को स्वदेश में लाने का विकल्प क्या है?यह बिलकुल वैसा ही सन्दर्भ है की सारी रात रामायण सुनने के बाद सुबह श्रोता महोदय पूंछते हैं कि सीता का अपहरण किसने किया था या कि रावण कहाँ का राजा था?प्रवक्ता .कॉम पर ऐसे दर्जनों आलेख मेने लिखे हैं जिनमें निजी संपत्ति पर नियंत्रण,कराने,पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को पलटने और देश की सकल संपदा मय खेती योग्य जमीन और अवसरों को हर व्यक्ति तक यथार्थ के धरातल पर मुहैया कराने पर भृष्टाचार पर अंकुश लगाने की शुरुआत की जा सकती है .चूँकि वर्तमान व्यवस्था में यह संभव नहीं है और इस व्यवस्था को बदलने के लिए जनता की जनवादी क्रांती की दरकार है ,जिसके भारत में अभी दूर दूर तक आसार नहीं हैं क्योकि भारत की जनता ,धरम मज़हब जात-वर्ण अगड़ा -पिछड़ा दलित-सवर्ण हिन्दी गैर हिंदी के अलावा बाजारीकरण के मकरजाल में उलझ रही है ,आप जैसे विद्द्वान लोग इसे अच्छी तरह समझते हैं किन्तु जागते हुए भी सोने का बहाना कर रहे हैं.यदि आप वास्तव में जिज्ञासु होते या सो रहे होते तो मेरे विचारों को अपने चश्में में अनुकूल न पाकर इस तरह वितंडा खड़ा नहीं करते.आप लोग अपनी अधकचरी अप्रमाणित स्थापनाओं को टिप्पणियों में गूंथकर न तो अन्ना हजारे {जो की कांग्रेस के छद्म सहयोगी हैं}को और न बाबा रामदेव{जो की संघ को सुहाते हैं}को वास्तविक रूप में देख पा रहे हैं और न ही आप लोग अपने विकल्प पेश का रहे हैं. अन्ना एंड कम्पनी और बाबा रामदेव छलिया थे ,छलिया हैं और छलिया रहेंगे उनकी आलोचना सिर्फ शब्दों में किये जाने पर आप लोगों को तकलीफ क्यों हो रही है?भृष्टाचार मिटाने और काले धन को को भारत वापिस लाने में यदि अन्ना और रामदेव के अभियान सफल होते हैं तो मुझे बहुत खुशी होगी .किन्तु प्रजातंत्र और संविधान से परे जाकर यदि कोई हठ इसलिए किया जाता है कि बार्गेनिग या ब्लाक्मैलिंग की जा सके तो यह नितांत निंदनीय कृत्य है.यदि मेरी समीक्षाओं से किसी देशभक्तिपूर्ण आन्दोलन की सफलता संदिग्ध है तो उस ‘छुई -मुई ‘आन्दोलन का शीघ्र नष्ट हो जाना ही देश और दुनिया के हित में है.यदि व्यक्तिवादी संविधानेतर सत्ता केन्द्रों को तुरंत नहीं रोका गया तो आज़ादी के ६५ सालों में देश ने जो प्राप्त किया है वो सब मटियामेट हो जाएगा.इसी आशंका के चलते हमें यह लोकतंत्रात्मक नज़रिया पेश करना पड़रहा है जिसे आप इसलिए पसंद नहीं करते की यह आपके खांचे में फिट नहीं बैठता.

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  4. Ram narayan suthar

    माननीय तिवारीजी मेरा आपसे विन्रम अनुरोध है की आप अगला लेख लिखे तो इस बारे में लिखे की भ्रष्टाचार ख़त्म कैसे होगा न की किसी की रणनीति का खंडन करके लिखते रहो की ऐसे भ्रस्ताचार ख़त्म नहीं हो सकता इसमें ये कमी है ये सम्प्र्दैकता फेलाते है या ये जनतंत्र पर हमला है अपना तर्क दे की भर्ष्टाचार ख़त्म इन तरीको से हो सकता
    खंडन कभी समस्याओ का हल नहीं हो सकता

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  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यहाँ फिर मैं अपने १ मई वाले लेख के कुछ अंश को उद्धृत करने की गुस्ताखी कर रहा हूँ.
    “यह तो हुआ जन लोकपाल बिल और फिर उसको लागू करने के लिये सत्याग्रह. पर उसके बाद जो हुआ या हो रहा है,वह हमारे असली चरित्र को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है.हम वास्तव में क्या हैं,यह जग जाहिर हो जाता है, सत्याग्रह के बाद के आरोपों प्रत्यारोपों में.इन सब में सच पूछिये तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र सामने आा जाता है.यहाँ जो सबसे बडी बात उभर कर सामने आयी है,वह दर्शाती है कि हम अपनी नीचता का बखान करने में भी अपनी बहादुरी ही समझते हैं. मैं बेईमान हूँ तो अन्ना जी या उनके आस पास के लोग भी इमानदार नहीं हैं.मैं तो बेईमान हूं हीं,पर मैं यह प्रामाणित कर सकता हूँ कि आपभी बेईमान हैं. जन लोक पाल बिल का मसौदा किसी खास व्यक्ति के लिये कुछ नहीं कहता और न उस मसौदे को तैयार करने वाले उससे कुछ लाभ उठाने की स्थिति में हैं. क्या वे कमीटी में शामिल हो जायेंगे तो उनको कोई विशेषाधिकार प्राप्त हो जायेगा, जिसका जायज या नाजायज लाभ वे उस समय या बाद में उठा सकें? तो फिर उनको नीचा दिखाने के लिये इतना हो हल्ला क्यों?जन लोकपाल बिल के मार्ग में इतनी अडचने डालने का क्या अर्थ?क्यों हम एक से एक बढकर इस बात पर कम कि जन लोकपाल बिल से लाभ होगा कि नहीं,पर इस बात पर अधिक जोर दे रहे हैं कि जनलोकपाल बिल तैयार करने का उनलोगों को कोई अधिकार ही नहीं,जो इस काम के लिये मनोनीत किये गये हैं.होना तो यह चIहिये था कि जन लोकपाल बिल के मसौदे के एक एक पहलु पर बिस्त्ऋत बहस होता.लोग अपने अपने ढंग से इस पर विचार प्रकट करते .मसौदा सबके सामने है और मेरे विचार से अभी उसमें खामियाँ भी हैं,जो हो सकता है कि कमिटी द़वारा दूर भी कर दी जाये,पर हम भी उस पर अपना विचार तो दे हीं सकते हैं और तब इसमे हमारी सकारात्मक भूमिका होती.जो लोग इसको और प्रभावशाली बनाने की दिशा में निर्देश दे सकतेहैं,उनको सामने आना चाहिये था. पर मेरे विचारानुसार लोग साधारण रूप से दो खेमों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं या यों कहिये कि साधारणतः दो खेमों में बँटे हुए हैं. एक खेमा तो यह प्रमाणित करने में लगा हुआ है कि जो लोग जन लोकपाल बिल तैयार करने वाली कमिटी में हैं,वे हमलोगों से कम बेईमान नहीं हैं.कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि बईमानी में मेरा और उनका करीब करीब बराबर का साझा है. दूसरा खेमा इस बात पर जोर दे रहा है कि जन लोकपाल बिल लोकपाल को सर्व शक्तिमान बना देगा.बाहर से तो दोनो खेमे अलग अलग दिखाई दे रहे हैं,पर तह में जाईयेगा तो पता चलेगा कि दोनो खेमों का उद़देश्य एक है और वह है,जन लोकपाल बिल को किसी तरह रोकना,पर ऐसा क्यो? ”
    मेरे विचार से श्रीमान तिवारी जी के इस लेख में भी उस क्यों का उत्तर नहीं है.

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