लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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crude oilशैलेन्द्र चौहान
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें पिछले दशक की शुरुआत में 10 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हुआ करती थीं. लेकिन खाड़ी देशों के बदलते हालात और बढ़ती मांग के कारण पहली बार कच्चे तेल ने 100 डॉलर प्रति बैरल की क़ीमत जनवरी 2008 में पार कर लिया था. और उस साल जुलाई आते-आते क़ीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल के अब तक के रिकॉर्ड के ऊपर पहुंच गई थीं. आज दुनिया भर की फैक्ट्रियों में जो भी उत्पादन हो रहा है उसकी मांग को देखते हुए पेट्रोल, डीज़ल की खपत और जहाज़ों की बुकिंग के आंकड़ों को देख कर इस बात का अंदाज़ा लग जाता है कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है. इस कमज़ोर अर्थव्यवस्था का असर रूस जैसे देशों पर भी हो रहा है, जिसकी क़रीब 60 फीसदी सालाना विदेशी मुद्रा की कमाई कच्चे तेल की बिक्री से होती है. क़ीमतें घटने से रूस और उसके जैसे देशों की कमाई भी मारी जाती है. ओपेक देशों में से अल्जीरिया, अंगोला, नाइजीरिया और वेनेज़ुएला जैसे देश अक्सर ये मांग करते हैं कि उत्पादन में कटौती होनी चाहिए क्योंकि उससे गिरती क़ीमतों पर रोक लग सकती है. इन देशों की अर्थव्यवस्था और सरकारी राजस्व कच्चे तेल से होने वाली कमाई पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. जैसे-जैसे चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएं अहम होती जा रही हैं, इनकी खपत तेज़ी से बढ़ रही है. कच्चे तेल की क़ीमतों पर खाड़ी और उसके आसपास के देशों में हो रही लड़ाई का भी असर होता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में क़ीमतें गिरने लगती हैं तो ओपेक देशों में थोड़ा लालच भी होता है. ओपेक देश हर साल कम से कम दो बार मिलते हैं. हर मीटिंग में उत्पादन की सीमा पर विचार किया जाता है. लेकिन कुछ देश उससे ज़्यादा कच्चे तेल का भी उत्पादन करते हैं. उन्हें लगता है कि क़ीमतें और भी नीचे जाएंगी तो ऐसे में उन्हें आज ही अपने उत्पाद की बढ़िया क़ीमत मिल जाएंगी. ओपेक देश कच्चे तेल के बाज़ार में काफ़ी अहमियत रखते हैं. दुनिया का एक तिहाई कच्चे तेल का उत्पादन करने के कारण वो क़ीमतें बढ़ाने या घटाने की स्थिति में होते हैं. ओपेक में क़तर, लीबिया, सऊदी अरब, अल्जीरिया, नाइजीरिया, ईरान, इराक़, कुवैत जैसे देश शामिल हैं. इंडोनेशिया दोबारा ओपेक में अगले साल शामिल हो जाएगा. वह उसका तेरहवां सदस्य होगा. ओपेक देशों के अलावा अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले कच्चे तेल की खपत पर ख़ास ध्यान देते हैं.कच्चे तेल की गिरती क़ीमतों ने अब दुनिया भर के बाज़ारों में भूचाल पैदा कर दिया है. जो लोग कच्चे तेल पर पैनी नज़र रखते हैं उनका मानना है कि गिरती क़ीमत दुनियाभर की कमज़ोर अर्थव्यवस्था के बारे में बता रही है. पिछले हफ़्ते कच्चा तेल 40 डॉलर प्रति बैरल के नीचे चला गया. नाइमेक्स और ब्रेंट की क़ीमतों के आधार पर ये 11 साल में सबसे कम क़ीमत है. गिरती हुई कच्चे तेल की क़ीमतों से ओपेक में शामिल 12 देश भी हिल गए हैं. ओपेक के मुताबिक़, नवंबर 2015 में उसने तीन करोड़ 17 लाख बैरल का रोज़ाना उत्पादन किया. ये उसके उत्पादन स्तर के मुताबिक़ तीन साल में सबसे ज़्यादा है. कमज़ोर मांग वाले बाज़ार में ओपेक सदस्यों के लालच के कारण शायद गिरती क़ीमतें थम नहीं रही हैं.अगर क़ीमतें फ़रवरी तक बढ़ती नहीं हैं तो ओपेक ने एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाने का फैसला किया है, ताकि वह ऐसे क़दमों पर विचार कर सके जिससे क़ीमतों में गिरावट को रोक जा सकता है. कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती इनमें एक तरीक़ा हो सकता है.

4 Responses to “कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट”

  1. Himwant

    आर.सिंह जी, आपने जवाब में एक सुंदर विषय को उठा दिया है। दरअसल पेट्रोलियम लाबी (जो पेट्रोल से लाभान्वित होते है) वे नही चाहते है की कोई वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत उसका स्थान ले। मैं तो सरकार से कहना चाहूँगा की सरकार पेट्रॉल, डीजल आदि पर एक रुपए का ‘वैकल्पिक ऊर्जा शोध सरचार्ज” लगाए। इसप्रकार संकलित रकम को देश के प्रमुख शोध संस्था एवं आई,आई,टी को बाँट दे, ताकी हम किसी पूर्ण स्वदेशी कच्चे पदार्थ की तकनीकी पर आधारित किसी नए ऊर्जा स्रोत की खोज कर पाए। तब मैं यह आशा भी करूँगा की आज के 50 साल बाद मेरा पोता दिल्ली में अपनी कार में 200 ग्राम थोरियम कैप्सूल डलवाए और वह कार उस ऊर्जा से एक साल तक चले। या फिर सड़क किनारे चापाकल से पानी भरे अपनी टँकी में, जिससे हाइड्रोजन निकाल कर उसकी कार का इंजन दौड़े।

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    हिमवंत जी का कहना ठीक ही है कि जब तक आप अच्छी तरह विषय को न समझे तब तक कलम न चलायें,पर ऐसा हमेशा होता आया है. धुरंधरों को भी मैंने ऐसा करते देखा है.
    इस विषय पर मेरा भी ज्ञान बहुत सीमित है,पर मैंने देखा है कि जब जब तेल के दाम बढ़ते हैं, ऊर्जा के वैकल्पिक साधन पर शोध तेज हो जाता है.तेल उत्पादक देशों और बड़ी बड़ी तेल कंपनियों के कान खड़े हो जाते है. और कच्चे तेल के दामों में गिरावट आने लगती है.एक बार तो तेल उत्पादक देशों ने इसे हथियार के रूप में प्रयुक्त किया था.वह समय था १९७३ का था.चूंकि मैं उस समय एक बड़ी कंपनी के साथ जुड़ा हुआ था,अतः भारत ने उस समय जो कदम उठाये थे,उसमे थोड़ा योगदान हमलोगों का भी था.
    पर आज की स्थिति के दो कारण मेरी समझ में आ रहे हैं,
    १.तेल उत्पादक देशों को शायद लगने लगा है कि ऊर्जा के प्रधान साधन के रूप में अब उनका एकाधिकार अधिक दिन तक चलने वाला नहीं है.इसके भी कारण हैं.
    २.आपस में होड़ लग गयी है कि जब तक संभव है इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा लिया जाए.

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  3. himwant

    कच्चे तेल का दाम क्यों गिर रहे है, इस बारे में यह लेख कोई तथ्य परक और खोजपूर्ण बात नही कहता। वास्तविकता यह है की अमेरिका ने पेट्रोल की खरीदी कम कर दी है जिसके कारण मांग में कमी आ गई, अपने खर्चे पुरे करने के लिए पेट्रोलियम उत्पादक देशो को माल सस्ता बेचने को बाध्य होना पड़ रहा है। अब प्रश्न यह उठता है की अमेरिका पेट्रोलियम खरीदी कम क्यों कर दीया है? कारण यह है की वे लोग हाइड्रोलिक फ़्रेक्सीनेशन विधि से खुद अमेरिका में बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम दोहन कर रहे है। हालांकि इस विधि से पेट्रोलियम दोहन से भूगर्भ को बड़ा दुष्परिणाम भोगना पड़ सकता है। इस विधी में भारतीय कृषि उत्पाद गुआर गम का भी प्रयोग होता है। … किसी विषय में कलम चलाने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान काफी नही, लेखक को विषय का ज्ञान बढ़ाने के लिए थोड़ा शोध अवश्य करना चाहिए।

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      Dear Himwant ji– Yes you are right.
      My Understanding is,===>this is a tangled process and it is economics of supply and demand, as you said.
      U. S. production is nearly doubled in last six years, pushing out oil imports that need another market.
      Saudi, Nigerian and Algerian oil once was sold in U S.
      is now competing in Asia.(They need to sell) — and producers are forced to drop prices.
      Canadian and Iraqi production is rising too. Even Russia, with economic problems, keep pumping.
      On demand side, economies of Europe are weak and cars are, energy-efficient. So demand is down.
      This is complicated question, but it boils down to supply and demand.
      However, production is falling in U.S. because of drop in exploration investment. (Guess the future problem)
      –I AM -A GUEST ON THIS COMPUTER–does not have font-excuse English)
      –madhusudan

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