लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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गिरीश पंकज

दिल्ली में चलती बस में युवती से सामूहिक बलात्कार, छत्तीसगढ़ में एक पाँच साल की बच्ची से दुष्कर्म। ऐसी घटनाएँ समाज को दहला देती हैं, लोग गुस्से में भर कर सड़कों पर उतर आते हैं और धीरे-धीरे गुस्सा ‘बुद्धू बक्से’ (टीवी) के सम्मोहन में कहीं खो जाता है। दिल्ली के सामूहिक बलात्कारी पकड़े गए। कुछ को अपने कृत्य पर ग्लानि है। वे चाहते हैं कि उन्हें फाँसी दे दी जाए। उत्तेजित लोग मांग कर रहे हैं कि बलात्कारियों को नपुंसक बनाया जाए। कड़े कानून बनें लेकिन सच्ची बात तो ये है कि कानून बनने से कभी अपराध कम नहीं होते क्योंकि हर अपराधी यह मान कर चलता है कि वह इतनी सफाई से अपना काम करेगा कि पकड़ा नहीं जाएगा। कानून का भय अब लोगों में नहीं रहा। अगर ऐसा ही होता तो इतनी हत्याएं, बलात्कार, घोटाले क्यों होते? हर अपराध के लिए लिए कानून बना है। सजा के प्रावधान है, मगर घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं।

इतने कानून होने के बावजूद क्यों हो रही हैं घटनाएँ? हम धीरे-धीरे ऐसा समाज रचते चले जा रहे हैं, जहाँ अनैतिकता को लगभग स्वीकृति -सी मिल चुकी है। भ्रष्टाचार को सहज स्वीकृति है, नग्नता को आधुनिकता माना जाने लगा है। टीवी पर इन दिनों एक क्रिकेट खिलाड़ी लड़की पटाने के का आइडिया बता रहा है। जिस समाज में लड़की को पटाने के तरीके बताए जा रहे हों, उस समाज के दिमागी दिवालियेपन की कल्पना आसानी से की जा सकती है। पिछले दिनों एक और अनैतिक विज्ञापन दिखाया गया कि एक विवाहिता सुहागरात के समय पराये मर्द को की ओर बढ़ती नजर आती है क्योंकि उस मर्द ने किसी खास कम्पनी का परफ्यूम लगा रखा था। जो समाज ऐसे विज्ञापनों पर भी राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया व्यक्त न करता हो, उस समाज के बारे में कम से कम मैं तो यही मान कर चलता हूँ कि वो पतन को अपनी स्वीकृति दे रहा है या फिर वो इतना कायर या बुजदिल है कि प्रतिकार करने से डरता है।

प्रश्न यही है कि बलत्कार की घटनाएँ होती ही क्यों हैं? क्यों हमारे समाज के कुछ लोग अचानक भेडि़ए बन जाते हैं? क्यों इंसान हैवान बन जाता है? क्या इसके पीछे केवल इधर की लड़कियों के पहरावे को दोष दे कर छुट्टी पाई जा सकती है? अकसर यह कहा जाता है कि लड़कियों के कपड़े भड़काऊ होते हैं। जिन्हें देख कर कामुकता बढ़ती है। अगर यह सच है तो फिर हम यह भी जानना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ की पाँच वर्षीय लड़की में ऐसा क्या था कि कामुकता से ग्रस्त व्यक्ति ने उसको अपनी वासना का शिकार बना दिया? बलात्कार की घटनाएँ लगभग वे लोग ही करते हैं, जो कमजोर संस्कार के होते हैं। जिनकी वैसी परवरिश ही नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए।

हमारे वेद-पुराणों ने स्त्री को शुरु से महिमा-मंडित किया है। उसे देवी का दर्जा दिया। गाय को माता कहा, धरती को भी माँ का सम्मान दिया। पत्थर को पूजा गया, पेड़ों को भी पूजनीय बनाया। इन सबके पीछे यही भाव था कि हम इन सबकी रक्षा करें। लेकिन हमने यह भी देखा कि इस समाज में अनेक लोग ऐसे भी पैदा हाते रहे, जिन्होंने इस ज्ञान का अपमान ही किया और वे पहर उन प्रतीकों को रौंदते रहे, जिन प्रतीकों ने हमें मनुष्य बनाए रखने की कोशिश की। आज हम देखते हैं कि लोग तालाब पाट देते हैं, नदियों को गंदा करने में संकोच नहीं करते। बड़ी आसानी से पेड़ काट कर भी बेचैन नहीं होते। हम अपनी आस्थाओं के सारे केंद्रों को ध्वस्त करते चले जा रहे हैं। इस पतन में इस वक्त स्त्री के प्रति अवमानना सबसे सघन है। कन्या भ्रूण हत्याएँ इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग कैसे स्त्री विरोधी होता जा रहा है, यह भी एक कटु सच्चाई है कि अगर इसी तरह बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती रही तो अब बच्चियों को बलात्कार से बचाने के लिए भी कन्या-भ्रण हत्याएँ बढ़ेंगी। जिस समाज में बच्चियाँ, बड़ी लड़कियाँ और यहाँ तक बूढ़ी औरतें तक काम वासना का शिकार हो जाती है, उस समाज की बर्बर सोच को क्या कहा जाए?

इस आधुनिकता ने हमें एक साथ विकास और पतन का रास्ता दिखा दिया है। एक और हम तकनालॉजी के मास्टर हो गए, दूसरी ओर विनाश के भी। हालत यह है कि हम फटी हुई जीन्स पैंट पहन कर भी आधुनिक होने का भ्रम पा लेते हैं। देह से मुक्ति का राग भी अलापा जा रहा है। जो नैतिक मूल्य थे, वे पाश्र्व में जा रहे हैं। पतन पर मौन नजर आ रहा है। और हमने मौन को भी स्वीकृति का एक लक्षण माना है। ऐसे संक्रमण काल में जब हम बलात्कार और हिंसा की बढ़ती घटनाओं को देखते हैं, तो यह सोचना पड़ता है कि कहीं न कहीं हम आदमी को इंसान बनाने की तकनीक में चूके जरूर हैं। अगर ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि आधुनिक परिवेश में भी हमारे समाज के अनेक लोग मध्ययुगीन बर्बर मानसिकता के शिकार नजर आते हैं। बलात्कार करना बर्बरता की, पागलपन की ही निशानी है। इसका मतलब है कि हम अभी पूरी तरह से आधुनिक नहीं हो सके हैं। आधुनिकता की यही परिभाषा है कि हम मन से अहिंसक रहे, सद्भावी रहे और अतिक्रमण न करें। न किसी की अस्मिता को, न किसी के सम्मान को, न किसी के सुख-संतोष का। इधर लड़कियों को भी शेरनी की तरह रहना है मगर मर्यादा का पालन भी करना होगा। सार्वजनिक स्थलों में खुले आम उद्दंडताएँ बढ़ रही हैं। ब्वॉय और गर्लफेंड जब खुले आम इश्कमिजाजी करते नजर आते हैं तो भूखे भेडिय़े लार टपकाने लगते हैं। तब उनको रोका नहीं जा सकता। या तो हमारी उनसे निपटने की तैयारी भी है। बैहतर यही हो कि सार्वजनिक स्थलों में प्रेमालाप की प्रवृत्ति रुके। ऐसा करके हम अपनी ओर से भी बहुत कुछ अंकुश लगा सकते हैं। भेडिय़ों, को, दरिंदों को, नीचों को मौका ही क्यों दिया जाए? समाज के लोग पता नहीं कब संस्कारित होंगे। होंगे या नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता, कम से कम हम तो सावधान रहें। कानून अपना काम करेगा, मगर हमें भी अपना काम करना होगा। जंगल से गुजर रहे हैं तो आदमखोरों से तो बचने की तैयारी रखनी ही होगी। लेकिन आदमखोरों को सबक सिखाने के लिए उनको कड़ी से कड़ी सजा की तैयारी भी करनी होगी। बलात्कारियों को सजा में विलंब करना स्त्री से एक और बलात्कार की तरह लगता है। जितनी जल्दी हो सके, सजा मिले। और पुलिस से बहुत अधिक अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। बहुत-सी वारदातें तो पुलिस वाले ही करते हैं, बलात्कार से मुक्ति का रास्ता समाज के जागरूक लोग ही निकाल सकते हैं। हम एक चौकन्नी नजर ले कर चलें और अपने में हिम्मत जुटाएँ कि बलात्कारियों का प्रतिवाद कर सकें, उनसे जूझ सकें। भले ही हमारी जान चली जाए। कितनी ही घटनाएँ ऐसी हो चुकी हैं कि कुछ गुंडे सबके सामने बलात्कार करते हैं, और लोग जान के डर से खामोश रह जाते हैं। अब खामोश रहने का समय नहीं, जूझने का समय आ गया है। हम हिम्मत दिखाएँगे तो बलात्कारी या दरिंदे हमारा कुछ नहीं कर सकेंगे।

6 Responses to “बलात्कारियों से जूझें, भले ही जान चली जाए”

  1. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन

    जहाँ भौतिक/दैहिक मूल्यों से ही समाज परिचालित होता है, ऐसे पश्चिम के समाज में, जब कठिन समय आता है, गरीबी आती है, तब, सब से पहले महिलाएँ पतित होती है। यहाँ बलात्कार की आवश्यकता ही नहीं—जब डेटींग में महिलाएं इतनी सरलता से मिलती हो, तो….?
    भौतिक मूल्य तमस प्रधान होते हैं।
    स्थूल रूपसे नारी को केवल काम पूर्ति की दृष्टि से देखा जाता है।
    कारण परस्त्री मातृ समान का आदर्श नहीं है।
    भौतिक मूल्य प्रधान संस्कृतियाँ जब तक समृद्धि होती है, उनकी चकाचौंध होती है।
    चार दिन की चाँदनी –निर्धनता में ये टिक नहीं पाती।
    गरीबी बढी कि, अपराध बढें, परिवार टूटे।बेकारी बढी कि परिवार टूटे-प्रेम खिडकी से बाहर भागा।
    आज की अवस्था में केवल २१ % कुटूंब अपने सगे बच्चों के साथ रहते हैं। ५४% महिलाएं, और ५० % पुरूष एक बार भी जीवन में विवाह नहीं करते–आवश्यकता ही नहीं-जब बिना जिम्मेदारी डेटींग में व्हरायटी एंटर्टेन्मेंट मिल जाए, तो कौन विवाह करके झंझट मोल लेगा?
    ऊपर ऊपर से यह पता नहीम चलता। ५०% विवाह विच्छेद में समाप्त। मेरा लिखा हुआ, “बंधन मुक्त विवाह” पढें।
    भारत को बचाना है। जो युवावस्था में समझ नहीं पाए, अब समझ आ रहा है। भारत फिर भी महान है।

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  2. Rtyagi

    गिरिशजी,

    “हम धीरे-धीरे ऐसा समाज रचते चले जा रहे हैं, जहाँ अनैतिकता को लगभग स्वीकृति -सी मिल चुकी है। भ्रष्टाचार को सहज स्वीकृति है, नग्नता को आधुनिकता माना जाने लगा है। टीवी पर इन दिनों एक क्रिकेट खिलाड़ी लड़की पटाने के का आइडिया बता रहा है। एक और अनैतिक विज्ञापन दिखाया गया कि एक विवाहिता सुहागरात के समय पराये मर्द को की ओर बढ़ती नजर आती है क्योंकि उस मर्द ने किसी खास कम्पनी का परफ्यूम लगा रखा था। ”

    उपरोक्त प्रमुख लाइनों के साथ साथ, हर वाक्य में आज की सच्चाई झलकती है.. यही हमारी समस्याओं की जड़ है.. कानून बनाने से अधिक हमें अपने समाज के पुनुरुद्धार की आवश्यकता है..

    लोग हर गलत बात और नैतिक पतन को स्वीकार व् अंगीकार कर रहे है.. उसके बाद बढ़ी और खुले आम हुई घटनाओं पर अफ़सोस ज़ाहिर कर रहे है.. जबकि यह सब हमारे समाज की और हमारी ही दें है….

    अच्छे लेख के लिए धन्यवाद

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  3. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    बलात्कार से निबटने के लिए पूरी व्यवस्था को ईमानदार बनाने के साथ नैतिकता और संस्कारो पर जोर देना होगा नही तो केवल कानून को सख्त बनाकर हल तलाशा जा सकता तो हत्या के लिए पहले ही फांसी तक की सज़ा मोजूद होने से कत्ल होने बंद हो गये होते.

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