आग की लपटें

मैं आज सुबह
उठा और देखा
रात की बूंदाबांदी से
जम गई थी धूल
वायुमंडल में
व्याप्त रहने वाले
धूलकण भी
थे नदारद
मन हुआ खुश
देखकर यह सब
कुछ देर बाद
उठाकर देखा अख़बार
तो जल रहा था वतन
साम्प्रदायिकता व
जातिवाद की आग में
यह बरसात
नहीं कर पाई कम
इस आग को
-विनोद सिल्ला©

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