जानिए मनीषा कोइराला की कैंसर से जंग

विवेक कुमार पाठक
नामी निर्देशक सुभाष घई की सौदागर फिल्म से हिन्दी सिनेमा में आगाज करने वाली मनीषा कोइराला ने कैंसर से अपनी जंग को कलम से कागज पर उतार दिया है। उनकी लिखी इस किताब का नाम है द बुक ऑफ अनटोल्ड स्टोरीज। इस किताब में वे जज्बाती कहानियां हम मनीषा के शब्दों में जानेंगे जो कैंसर की पीड़ा के शिकार इंसानों की होती हैं।
 कैंसर किस कदर हर दिन हर पल मरीज को तोड़ता है ये जख्म या तो खुद कैंसर पीड़ित बता सकता है या फिर कैंसर पीड़ित के परिवारजन। मनीषा को इस बात के लिए मुबारकबाद दी जानी चाहिए कि उन्होंने ग्लैमर से कोसों दूर उस मुद्दे को उठाया है जिसे बहुत दिलेरी से उठाए जाने की इस दौर में जरुरत भी है। 
कैंसर मतलब मृत्यु से पहले मृत्यु जैसा भयानक दर्द देने वाला रोग। ऐसा रोग जो अपनी पहचान अकेले होने से रोगी को आधा मार देता है। वो रोग जो पल पल मौत से डराता है। हंसते हुए परिवारों की मुस्कान पर ग्रहण लगा देता है। हिन्दी सिनेमा को 1942 ए लव स्टोरी जैसी यादगार फिल्म देने वाली मनीषा कोइराला की यह किताब उन सबसे मुश्किल दिनों के जज्बातों को हम सबके सामने लाएगी। यह एक सिनेमाई अदाकारा की खुद बयां की हकीकत है।
किस कदर काल की सवारी करने वाली यह बीमारी मन शरीर और आत्मा पर वार करती है हम इस किताब में एक अदाकारा की नजर से जान पाएंगे। मनीषा कोइराला की लिखी इस किताब की सबसे खूबसूरत बात यह होगी कि यह अपने शीर्षक से ही सकारात्मक धारा की ओर हमें ले जाने का भरोसा देती है।
द बुक ऑफ अनटोल्ड स्टोरीज में कैंसर से संघर्ष की कहानियां हैं। ये कहानियां जीवन के संघर्ष और संघर्ष के बाद विजय के उजास को शब्दों से बयां करती हैं। इन कहानियों की सार्थकता यहीं आकर स्थापित होती है।
पर्दे पर शुरुआती दौर में सौन्दर्य से प्रभावित करने वाली मनीषा कोइराला फिल्म द र फिल्म शानदार अदाकारी के लिए लोकप्रिय हुईं थीं। बॉम्बे, दिल से से लेकर हालिया संजू फिल्म उनकी अदाकारी की प्रखरता को बताने वाली फिल्में हैं। जिस कदर मनीषा ने संजू में नरगिस दत्त के किरदार में जान डाली है उसी तरह उनकी किताब कैंसर से लड़ने वालों के संघर्ष को भी नई जान डालने को प्रेरित कर सकती है।
एक ग्लैमरस हीरोइन कैंसर के कारण अपने शरीर पर किस तरह के आघात महसूस करती है मनीषा की ये अनकही कहानियां उन्हीं को सामने लाती हैं।
कैंसर सुंदर सुकोमल काया का किस कदर पल पल क्षरण करता है ये कैंसर के अभिशाप को देख सुन चुके लोग बखूबी जानते हैं। उन देखने सुनने वालों के अलावा भी बहुत कुछ ऐसा होता है जो कैंसर रोगी के जेहन में दिन रात चल रहा होता है। बहुत कुछ ऐसा सकारात्मक चिंतन होता है जो कैंसर रोगियों के मन और विचार में चलना चाहिए मगर चलता नहीं।
मनीषा कोइरला की किताब उन दोनों भयावह और उजले पक्षों को हम सबसे उजागर करती है। यह किताब साल 2012 से शुरु हुए एक संघर्ष की कहानी है। उस संघर्ष में मनीषा कोइराला ने शुरुआत में खुद का क्षरण होते किस कदर पल पल देखा, किस तरह उनकी सुकोमल काया कैंसर से लड़ते लड़ते जख्मी होती चली गई सब कुछ इस किताब में समाया हुआ है। ये वो अनकही कहानियां हैं जो मनीषा कोइराला मन, मस्तिष्क, हृदय और अंतत हृदय में उमड़ती घुमड़ती रहीं। इन कहानियों में भी फिल्मी पर्दे की तरह कुछ किरदार रहे। मनीषा की केन्द्रीय भूमिका में उनके परिवार वाले, डॉक्टर्स, चाहने वाले और हर अजीज उस संघर्ष में अपने अपने तरीके से सहयोगी और गवाह रहे। जीवन को लील जाने वाले कैंसर से जीतकर फिर से अपने किरदार को जीना बहुत मुश्किल भरी जीत है। ये जीत 5 साल की जिजीविषा के बाद बॉलीवुड की अदाकारा मनीषा ने हांसिल की है। इस संघर्ष ने उनके विचार और चिंतन को निश्चित ही गहरा बनाया होगा। इसी की बानगी है कि वे अब देश में विचार, तर्क और चिंतन से जुड़े सार्वजनिक समारोहों में आगे बढ़कर हिस्सा ले रही हैं। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नई दिल्ली में आयोजित वैचारिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति चर्चा का विषय बनी। भविष्य का भारत विषय पर जब संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत भारत वर्ष में विविध वर्गों और धाराओं से आए लोगों से संवाद कर रहे थे तो मनीषा वहां सिने जगत की प्रतिनिधि थीं और आगे बढ़कर शामिल थीं। भविष्य का भारत किसी एक या एक संस्था या संगठन के प्रयास से नहीं बन सकता। मनीषा कोइराला जैसे संघर्ष सारे देश से अपेक्षित हैं। बुराइयों, बीमारियों और कमियों से लड़ते जूझते हुए फिर से स्थापित होने के प्रयास और साहस की देश को आवश्यकता है। हर तरफ जज्बा है बस जरुरत है कोई न कोई किसी न किसी संघर्षशील की अनटोल्ड स्टोरीज को सामने लाने की हिम्मत दे, साहस दे। सशक्त भारत को उन तमाम अनकही अनजानी संघर्ष गाथाओं की निरंतर जरुरत है।

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