लेखक परिचय

श्याम नारायण रंगा

श्याम नारायण रंगा

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अभी हाल ही में कुछ दिन पहले अन्ना हजारे ने अनशन किया और मान गए और अब बाबा रामदेव अनशन कर रहे हैं। ये सब अनशन और आंदोलन और धरना प्रदशर्न जो हमारे देश में होते हैं वे सिस्टम के खिलाफ होते हैं और सब लोग मिलकर सारा दोा सरकार व सरकार चलाने वाले नेताओं पर म देते हैं और उनके खिलाफ इस प्रकार के प्रदशर्न कर अपना विरोध प्रदशिर्त करते हैं। इन सब प्रदशर्नों को देखकर ऐसा लगता है कि सारा का सारा दोष इन नेताओं का ही है और एक मात्र राजनीति करने वाले ये लोग ही इस देश का बंटाधार कर रहे हैं। मैं इन सब के बीच एक बात कहना चाहूँगा कि हम लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीते हैं और इस सिस्टम का निर्माण हमारी जनता ने ही किया है। जनता ही इस सारे सिस्टम और इस सारे नेताओं के मूल में है। लोकतंत्र में जनता जनार्दन है और भारत के भाग्य की विधाता भी जनता ही है।

क्या वास्तव में सारे नेता ही इस सिस्टम और नकारापन के कारण है। ऐसा नहीं है वास्तव में हमारे देश की जनता भी इस सब दोषियों के लिए बराबर की भागीदार है और सबसे बड़ा दोष जनता का ही है। लोकतंत्र में आखिरी निर्धारक जनता है सो जनता की ही जिम्मेदारी है कि वह जिस सिस्टम का निर्माण कर रही है उसे भली भाँति बनाए और सारे सिस्टम के बारे में सोचकर अपने वोट का प्रयोग करें।

वास्तव में जनता ने ही इस सारे सिस्टम को खराब किया है। देश में काम करने वाले करोड़ो लोग चाहे वह आईएएस हो, क्लर्क हो, चपरासी हो, ठेकेदार हो, दुकानदार हो, व्यापारी हो सब के सब भ्रट हैं। इस देश की जनता ने खुद ने भ्रटाचार को पनाह दी है। देश का आईएएस भ्रटाचार में लिप्त हैं, क्लर्क पैसे खाता है, डॉक्टर बिना फिस देखता नहीं, इ्रंजीनियर घूस खाकर काम करता है, ठेकेदार मिलावट करने से चूकता नहीं, व्यापारी व उद्योगपति जमाखोरी कालाबाजारी में लगे हुए हैं, धर्म के नाम पर धंधा चल रहा है, साधु संयासियों के आश्रम ऐसो आराम और अय्यासी के अड्उे बने हुए हैं। कहने का मतलब है कि चारों ओर लूट मची है तो ऐसी स्थिति में सिर्फ नेताओं और राजनीति करने वालों पर दोष मंढ कर मुक्त नहीं हुआ जा सकता।

क्या इस देश के आईएएस, क्लर्क, चपरासी, डॉक्टर, इंजीनियर, ठेकेदार का दायित्व नहीं है कि वो ईमानदारी से काम करें वो अपना सब कुछ देश के हित में लगाए। जब ये सब के सब वर्ग के लोग भ्रटाचार में लिप्त है तो सिर्फ राज करने वाले लोगों पर दोष  देना कितना उचित है। हमारी मानसिकता में परिवर्तन लाना बहुत जरूरी है। हम सरकार की चीज को दुरूपयोग के लिए ही समझते हैं, सरकारी सम्पत्ति को तोड़ना, उसका उचित उपयोग न करना हम अपना दायित्व समझते हैं। आम आदमी खुद अपने पर नजर डाले कि वो टैक्स की चोरी कितनी करता है, दिन भर में कितनी दिवारों पर पान कि पीक थूकता है, यत्र तत्र कितना कूड़ा फैलाता है, ट्रेफिक नियमों को दिन भर में कितनी बार तोड़ता है, कितनी सरकारी सम्पत्ति का दुरूप्योग करता है, अपने काम पर समय पर जाता है क्या और अपने दफतर में कितनी देर बातें करता है, कितनी देर काम करता है, काम की चोरी कितनी करता है। क्या इस देश के आम नागरिक की जिम्मेदारी नहीं है कि वह खुद अपने पर ध्यान दें और अपने में सुधार के प्रयास करें।

हम दूसरे विकसित देशों की बड़ाई करते हैं लेकिन एक बार सोचे कि हम अमेरिका या जर्मनी या कुआलालाम्पुर कहीं पर भी विदेश में जाते है” तो क्या एयरपोर्ट पर थूकते हैं, क्या सार्वजनिक जगहों को  शौचालय बनाते हैं, क्या हम वहाँ पर ट्रेफिक नियमों का उल्लघंन करते हैं, क्या हम वहाँ पर बिना टिकट यात्रा करने का प्रयास करते हैं नहीं ना तो फिर दिल्ली, मुम्बई में घूसते ही हमें ऐसा क्या हो जाता है कि इन सब बातों को हम धड़ल्ले से करते हैं वहाँ कौनसा नेता आकर कहता है कि आप खुले आम थूकों, टिकट बिना यात्रा करों आदि आदि। एक नजर अपने पर डाले कि क्या धरना व प्रदशर्न जो कर रहे हैं वो कहीं अपने खिलाफ ही करें तो कितना अच्छा हो।

हमारे अनशन करने वाले लोग राजघाट जाकर अपने इस शुभ कायोर्ं की  शुरुआत करते हैं ताकि आम जन में ये संदेश जाए कि गाँधी जी के बताए सिद्घांतों व आदशोर्ं पर चलने का प्रयास किया जा रहा है। पर याद करो कि महात्मा गाँधी ने एक अनशन जनता के खिलाफ भी किया था। जब इस देश का विभाजन हुआ और चारों तरफ मारकाट मची थी तो इस युग पुरू ने दिल्ली में भूख हड़ताल शुरु ही आम आदमी के खिलाफ और कहा कि जब तक आम आदमी  शांति से नहीं रहेगा वे अनशन नहीं तोड़ेगे। आम आदमी ने उस राट्रपिता की बात को सुना और माना। मारकाट बंद हुई तो क्या आज के इन बाबाओं को या समाज सेवकों को या किसी की भी ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे आम जनता को सुधाने के लिए अनशन करें और जनता को बनाए कि वह कितना गलत कर रही है।

सिस्टम खराब है, राजनेता ईमानदार नहीं रहे पर क्या जनता के आदशर उच्च रहे हैं नहीं ना तो इस सिस्टम को जन्म देने वाली जनता ही पवित्र न होगी तो इससे पैदा होने वाला सिस्टम कैसे पवित्र होगा। हमें चाहिए कि हम अपने नैतिक चरित्र व राट्रीय चरित्र को उच्च बनाए और महात्मा गाँधी के कहे उन शब्दों पर गौर करें कि किसी भी काम को करने से पहले यह सोचें कि आपके द्वारा किए गए इस काम से इस देश के सबसे गरीब आदमी को क्या फायदा होगा अगर कोई उस अंतिम आदमी को कोई फायदा हो तो ही वह काम करें अन्यथा नहीं।

मेरी राय है या मांग है इन नेताओं से संस्थाओं से धर्म गुरूओं से कि वे एक विशाल अनशन करें जनता के खिलाफ, जनता की आदतों के खिलाफ, ताकि आम जन को लगे कि वो भी गलत है और इस सारी व्यवस्था में बराबर का भागीदार है।

One Response to “एक अनशन जनता के लिए”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ऐसे तो यह सही है की हमाम में सब नंगे हैं,पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब कोई भी अभियान छेड़ता है तो यह मान कर चलना पड़ता है की कोई तो ऐसा निकला जो इस बुराई के विरुद्ध आगे बढ़ा और उस अभियान से जो लहर उठता है उससे काया पलट की कुछ तो उम्मीद की जा सकती है.ऐसे भी बावा रामदेव का आन्दोलन कुछ कुछ वैसा ही है जैसा जेपी का था जो सत्ता परिवर्तन से भ्रष्टाचार के समाप्ति की उम्मीद करता है,पर कोई कारण नही की इसका भी अंत वैसा ही न हो जैसा जेपी के आन्दोलन का हुआ.अना
    हजारे से उम्मीद इसलिए बंधती है,चूँकि वे क़ानून की सीमा का विस्तार चाहते हैं,जिससे कोई भी भ्रष्टाचार करने का साहस ही न कर सके,ये दूसरी बात है की हमारी मूल प्रकृति ऐसी है की हम जन लोकपाल क़ानून में भी कुछ न कुछ छिद्र ढूढ़ ही लेंगे,पर वह तो समय ही बताएगा,फिलहाल तो जन लोक पाल विधेयक से बंधन के कुछ कठोर होने की उम्मीद तो की ही जा सकती है.

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