बिहार से यूपी तक और मोदी से योगी तक

एक लम्बे समय तक साम्प्रदायिक शब्द भारतीय राजनीत का प्यारा शब्द रहा है। समयानुसार यह शब्द अपने अर्थ तब्दील करता रहा, राजनीतिज्ञों की जुबानी। कभी अटल बिहारी बाजपेयी असाम्प्रदायिक थे और आडवाणी साम्प्रदायिक। समय बदला आडवाणी हो गये असाम्प्रदायिक और मोदी हो गये साम्प्रदायिक। आज के दौर में एक बार पुनः इस शब्द की व्याख्या हो रही है, व्यक्ति के सन्दर्भ में । कहा ये जा रहा है कि अब मोदी असाम्प्रदायिक है और आदित्यनाथ योगी साम्प्रदायिक। सुविधा की राजनीत इसे ही कहते है।

डा. अरविन्द कुमार सिंह

भारतीय राजनीत में चुनाव जीतने के दो शानदार तरीके हैं, ऐसा मैं नहीं कहता, राजनीतिज्ञ कहते हैं। या तो आपको सपने दिखाने की कला आनी चाहिए या फिर जनता के भयदोहन की कुशलता।
भयदोहन की राजनीत 1947 से शुरू हुयी। देश का विभाजन कुछ लोगों को सत्ता प्राप्ति का सूत्र नजर आया। विभाजन ने कई लोगों को आत्म संतुष्टी का आधार प्रदान किया तो कई लोगों को सत्ता के सुख से परिचीत कराया। प. जवाहर लाल नेहरू और कायदे आजम जिन्ना को उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है।

1947 से भयदोहन की राजनीत जो प्रारम्भ हुयी वो अभी हाल तक सफलता पूर्वक अंजाम दी जाती रही। मुसलमानों को आतंकित किया गया, बहुसंख्यक हिन्दुओं का संर्दभ देकर। और इस आधार पर आज भी राजनीत का प्रयास किया जाता है। इन दोनो कौमों को आपस में राजनीतिज्ञों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कभी मिलने नहीं दिया।

सघं और भाजपा इनके निशाने पर रहीं। इस भयदोहन ने तुष्टीकरण की राजनीत का शुभारम्भ किया भारतीय राजनीत में। राष्ट्रीयता की बात करना अपमानजनक हो गया और अपने आप को हिन्दु कहना गाली।
नरेन्द्र मोदी ने भारतीय राजनीत में चुनाव जीतने का एक तीसरा आधार प्रस्तुत किया और वो आधार है – ‘‘ विकास ’’। भारतीय राजनीत भयदोहन और सपने से निकलकर विकास के मार्ग पर अग्रसर हो गयी।
जिसने इसे समझा वो सफलता के झण्डे गाडते चला गया। विभिन्न जगहों पर अलग अलग पार्टियाॅं चुनाव जीतती जरूर नजर आ रही हैं पर यह बात आपको र्निविरोध स्वीकार करनी पडेंगी कि उनके मूल में ‘‘ विकास’’ है।

दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार सभी जगह सफलता का मापदंड विकास या फिर विकास का सपना ही है। न चाहते हुए भी इस नयी राजनीतिक शुरूआत का श्रेय हमें नरेन्द्र मोदी को देना पडेगा। विकास का गुजरात माडल इधर हाल के वर्षो में काफी चर्चित रहा है।

मोदी क्यों पराजित हुए बिहार में ?
मोदी के बिहार में असफल होने को बिन्दुआर समझ ले फिर इस पे विस्तार से चर्चा करते हैं –

नीतिश ने अपने विकास कार्य को आम आदमीयों तक पहुचाया।
मोदी विकास के वजाय राजनीतिज्ञों के जुमलेबाजी में उलझ गये।
मोदी निम्न वर्ग तक पहुचने में असफल रहे।
बिहार में वोटो का बटवारा नहीं हुआ, जिसका फायदा नीतिश को मिला।
मोदी जनता को विकास का भरोसा दिलाने में असफल रहे।
नरेन्द्र मोदी या भाजपा की बिहार पराजय दो बिन्दुओं पर सिमट जाती है। आम गरीब मतदाता तक भाजपा पहुचने में असफल रही, वही दूसरी तरफ नीतिश अन्तिम समय तक बिहार के विकास पर अपने को केन्द्रित रख्खे जिसका फायदा उन्हे मिला। वोटो का न बटना सोने पे सुहागा था।

मोदी ने शुरूआत तो विकास की बातों से की पर अंत आते आते राजनीतिज्ञों की नुक्ताचीनी में उलझ गए। हर राजनीतिक पार्टी अपने सुविघा के अनुसार तथ्यों को फोल्ड करती हैं। भारतीय राजनीत में इसके कई शानदार उदाहरण मिल जायेगें। एक दिलचस्प उदाहरण से दो चार होते चले। जो अवसरवादिता की शानदार मिसाल है।

एक लम्बे समय तक साम्प्रदायिक शब्द भारतीय राजनीत का प्यारा शब्द रहा है। समयानुसार यह शब्द अपने अर्थ तब्दील करता रहा, राजनीतिज्ञों की जुबानी। कभी अटल बिहारी बाजपेयी असाम्प्रदायिक थे और आडवाणी साम्प्रदायिक। समय बदला आडवाणी हो गये असाम्प्रदायिक और मोदी हो गये साम्प्रदायिक। आज के दौर में एक बार पुनः इस शब्द की व्याख्या हो रही है, व्यक्ति के सन्दर्भ में । कहा ये जा रहा है कि अब मोदी असाम्प्रदायिक है और आदित्यनाथ योगी साम्प्रदायिक। सुविधा की राजनीत इसे ही कहते है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश के लिए नरेन्द्र मोदी कभी असाम्प्रदायिक थे। सत्ता में उनके बगलगीर थे। सुविधा के अनुसार शब्द ने अर्थ बदला नरेन्द्र मोदी आज की तारीख में साम्प्रदायिक होकर नीतिश से दूर हो गए। कौन जाने कल सेकुलर होकर फिर नीतिश के बगलगीर हो जाएं? यह सबकुछ तय होता है राजनीतिक फायदे के तराजू पर। गधा बाप हो सकता है, बशर्ते उसकी चर्चा से फायदा मिलता हो। वरना हम माफी माॅंग लेगें।

क्या कारण है, उत्तर प्रदेश की सफलता का?

चुनाव जीतने के लिए कुछ बुनियादी शर्तंे हैं। यह वह न्यूनतम शर्त है, जिसके अभाव में आप चुनाव नहीं जीत सकते –

मतदाताओं में अपनी पैठ बनाना और
उसे वोट में तब्दील करने के लिए, इवीएम मशीन तक ले जाना।
बिहार की हार से सबक लेते हुए भाजपा ने बिहार की गलती उत्तर प्रदेश में नहीं दोहरायी। पहले सफलता के बिन्दुओं को देख ले फिर विस्तार से चर्चा करते हैं –

भाजपा यह विश्वास दिलाने में सफल कि मोदी गरीबों के नेता हैं।
यह कार्य हुआ – जनधन, प्रधानमंत्री योजना, उज्जवला गैस योजना तथा शौचालय निमार्ण कार्यक्रमों के माध्यम से।
इसकी वजह से स्वीकार्यता बढी हर तबके में।
टूट गयी जाति पाति की दिवारें – दरक गयी वोट बैकों की परम्परागत विसाते।
मुस्लीम वोटों का बटवारा – या तो मुस्लीम औरतों ने वोट नहीं डाला या फिर डाला तो भाजपा को। दोनो ही स्थिति में फायदा भाजपा को।
मोदी विकास की बात – युवा, किसान एवं व्यापारियों को समझााने में सफल।
एक प्रशिक्षित और समर्पित संगठन के माध्यम से मोदी अपनी बात आम मतदाताओं तक पहुॅचाने में सफल रहे। जहाॅ अन्य विपक्षी पार्टियाॅ उपर उपर जनता से जुडने का प्रयास कर रही थी, वही भाजपा अपने तमाम कार्यक्रमों के माध्यम से एक एक मतदाता तक सम्र्पक करने में सफल रही।

यह बात समझना कम दिलचस्प नहीं होगा कि अमित शाह उत्तर प्रदेश के 403 विधान सभाओं तक पहुॅचे। जो बेहतर कार्ययोजना औा प्रतिबद्धता का शानदार नमूना है। वाराणसी पहुॅचते पहुॅचते नरेन्द्र मोदी पूर्णतः विकास पर केंद्रित हो चुके थे। जब व्यक्ति नीचे तक सम्र्पक में हो तब अपनी बात दूसरो को समझाना आसान हो जाता है।इसकी एक छोटी सी बानगी, वाराणसी से देना चाहूॅगा। राष्ट्रीय स्वंयसेवक सघं के एक कार्यकता ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कैसे साधारण कार्यकर्ता की आवाज भी नरेन्द्र मोदी तक पहुॅचती है और उसका कार्य स्वरूप भी दिखायी देता है –

मोदी के वाराणसी आगमन के पूर्व सघं की एक बैठक आयोजित की गयी। स्वयंसेवको से उस जमीनी हकीकत को कहने के लिए कहा गया जो उपर के राजनेता महसूस नही कर पा रहे है। एक स्वंयसेवक ने अपनी बात रखी।आने वाले वक्त में एक प्रश्न वाराणसी में यक्ष प्रश्न के रूप में तब्दील हो जायेगा और सभी विपक्षी पार्टिया इसे पूछंेगी – अतः अभी से उसका उत्तर तैयार किया जाय और उसे मतदाता तक पहुॅचाया जाए। प्रश्न है – मोदी जी ने वाराणसी के लिए क्या किया है? इसे तीन स्तरो पर तैयार किया जाए- देश के लिए क्या किया? – प्रदेश के लिए क्या किया? – और वाराणसी के लिए क्या किया?
एक और भी प्रश्न है। जिसका समाधान होना चाहिए। वाराणसी के व्यापारियों को आयकर की नोटिस मिल रही है। अभी ये हाल है तो बाद में क्या होगा? कृप्या व्यापारियों की एक बैठक आयोजित कर किसी विशेषज्ञ से उनकी समस्या का समाधान कराया जाए।

उस स्वंयसेवक ने कहा – आपको जानकर आश्चर्य होगा, मात्र चैबीस घंटे के अंदर ही यह बात प्रधानमंत्री तक पहुॅच गयी। परिणाम – अरूण जेटली जी वाराणसी आये और व्यापारियों की बैठक कर उनकी समस्या का समाधान किया। नरेन्द्र मोदी जी का काशी विद्यापीठ के मैदान का भाषण यूट्यूब पर उपलब्द्ध है, आप उसे सुन ले – उन्होने बतलाया, अभीतक देश के लिए, प्रदेश के लिए और वाराणसी के लिए उन्होने क्या किया है। वाराणसी की आठो सीट की जीत के पीछे एक शानदार कार्ययोजना संचालित की गयी, जिसका यह एक उदाहरण है।

अपनी जुबान से कोई स्वीकार नहीं करेगा पर सच यही है। यूपी की शानदार जीत के पीछे आममतदाताओं तक अपनी बात पहुॅचाना तथा राष्ट्रीय स्वंयसेवक सघं के स्वंयसेवको के माध्यम से उन्हे इवीएम मशीन तक लाना दो प्रमुख कारण हैं।भारतीय राजनीत अब एक तीसरे शब्द की तलाश में है, शायद आने वाले वक्त में यह तलाश पूरी हो। सपने और विकास से आगे बढकर कार्ययोजनाओं को हकीकत में अमलीजामा पहनाने वाला ही सत्ता के शिर्ष पर बैठेगा। चाहे राजनीतिज्ञ हो या फिर संयासी।

आने वाले वक्त में जाति पाति की दिवारें टूटेंगी, एक नये सवेरे में नये हिन्दुस्तान की कहानी लिखी जायेगी। जहाॅ राष्ट्र भक्ति हमारे जिन्दा होने की बुनियाद होगी और हमारे मरने का सम्बल।

1 thought on “बिहार से यूपी तक और मोदी से योगी तक

  1. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रस्तुत लेख फिरंगी द्वारा सत्ता हथियाने का पुराना दस्तावेज रहा हो जिसका समयानुकूल यहाँ पुनः वर्णन केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की धूर्त चाल हो सकती है|

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