दूसरों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले कट्टरपंथी

संजय सक्सेना

हज यात्रा के लिये सब्सिडी खत्म करने का मोदी सरकार का फैसला मुस्लिम धर्म गुरूओं के लिये ‘गले की हड्डी’ बन गया है। कुरान की रोशनी में मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदार मोदी सरकार के फैसले का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं तो कहीं न कहीं उन्हें इस बात का मलाल भी है कि आनन-फानन में हज सब्सिडी खत्म क्यों की गई,जबकि सुप्रीम कोर्ट के 2012 के आदेशानुसार भी मोदी सरकार के पास हज सब्सिडी खत्म करने के लिये 2022 तक का समय था। आश्चर्य होता है कि जो बात कुरान की रोशनी में कही गई है उसे मुस्लिम धर्मगुरू उन लोंगो पर भी थोप देना चाहते हैं, जो कुरान की जगह दूसरे धर्म के मानने वाले हैं। ऐसे लोगों को समझना होगा कि दूसरे की निजी जिंदगी, उसके धर्म अथवा कौम पर उंगली उठाकर आप अपने आप को सही नहीं ठहरा सकते है। अपने आप को और अपने धर्म को सही साबित करने के लिये की गई कोई भी बात या दावा तर्क के बिना अछूरा हैं।
मुस्लिम धर्मगुरूओं को हज यात्रा की सब्सिडी खत्म होने से अधिक मलाल इस बात का है कि आखिर हिन्दुओं को क्यों धर्म यात्राएं या कुम्भ जैसे अन्य आयोजनों के समय अनुदान/सब्सिडी दी जाती है। मुस्लिम धर्ग गुरूओं को समझना चाहिए कि अब जरूरी तो नहीं है कि जो बात कुरान की रोशनी में मुसलमानों के लिये गलत हो वह अन्य धर्मो के मानने वालों के लिये भी गलत ही हो? हिन्दू धर्म बहु विवाह की इजाजत नहीं देता है। हिन्दुओं में भले ही तलाक की खबरें आती हों,लेकिन हिन्दू धर्म कभी तलाक की इजाजत नहीं देता है। इस्लाम में नसबंदी को नाजायज बताया जाता है,लेकिन हिन्दू धर्म में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है। इस्लाम एक अल्लाह की थ्योरी पर चलता है,मगर हिन्दू धर्म में माॅ-बाप, गुरू का दर्जा भगवान से भी ऊपर बताया गया है। यहां धरती माॅ की भी पूजा की जाती है,लेकिन मुसलमानों के एक बड़े तबके को:वंदेमातरम’ बोलने में एतराज होता है और कई मौकों पर तो राष्ट्रगान पर भी एतराज होता है,जिसकी खबरे अक्सर सुर्खिंया बनती रहती हैं।
तमाम ऐसे उदाहरण हैं मिल जायेंगे जिसमें मुसलमान भाई अपनी पुरानी सोच से रत्ती भर इधर से उधर होने को तैयार नहीं होते हैं। कुरान में जेहाद की जो परिभाषा है उसको कट्टरपंथियों ने इस तरह परिभाषित किया कि पूरी दुनिया में आतंकवाद सिर चढ़कर नाचने लगा। अफसोस होता है कि कुरान की संजीदगी की मुट्ठी भर लोंगों ने (जो अपने आप को मुल्ला-मौलवी कहते हंैं) अपने तरीके से व्याख्या करके इस्लाम ना मानने वाले को काफिर करार दे दिया।
अफसोस होता है कि धर्म के नाम पर सियासत की रोटिंयां सेंकने वालों के चलते ही दो समप्रदायों के बीच नफरत की दीवारें खड़ी होती है। इससे देश और समाज का तो कोई भला नहीं होता है,मगर धर्म के ठेकेदारों की दुकानें खूब चलती हैं। अयोध्या से लेकर काशी, मथुरा और आगरा,तीन तलाक,हज सब्सिडी खत्म करने तक का विवाद अगर चर्चा बटोर रहा है तो इसके पीछे की वजह धार्मिक कम सियासी ज्यादा है। कई वर्षो से यह परम्परा सी बन गई है कि धर्म के कुछ ठेकेदार अपने आप को सही साबित करने के लिये सार्थक बहस की बजाये दूसरे के धर्म पर हमलावर हो जाते हैं। हिन्दू धर्म में लाख खामियां हो सकती हैं,लेकिन सच्चाई यह भी है कि इन खामियों को दूर करने के लिये समय-समय पर कई आंदोलन भी हुए। सती प्रथा, बाल विवाह,भू्रण हत्या जैसी तमाम कुरीतियां आज हिन्दू समाज से दूर इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। यह हिन्दू धर्म ही हैं जहां ईश निंदा तक की छूट है,जबकि पाकिस्तान जैसे देश में ईश निंदा करने वाले को मौत की सजा तक दे दी जाती है, जो लोग धर्म और आस्था के नाम पर बिल्कुल भी बदलने को तैयार नहीं हैं,उन्हें हमेशा यह बात ध्यान रखना चाहिए कि धर्म व्यापक है। जिस धर्म में बहस,संवाद या तर्क नहीं होंगे,तो वह ठहरा हुआ पानी जैसा होगा,जिसमें बदबू और सड़ापन दोंनो दिखेंगे। कोई भी धर्म तभी श्रेष्ठ हो सकता है जबकि उसके मानने वाले स्वयं अपने धर्म के बारे में जाने-समझें न कि कही-सुनी बातों पर विश्वास करें। जैसा की तीन तलाक के मामले में हुआ था। तीन तलाक ऐसा गलत रिवाज बन गया था,जो शरीयत में कहीं था ही नहीं। इसके कारण मुल्ला-मौलवियों ने कई महिलाओं की जिंदगी खराब कर दी। परिवार उजड़ गये।
मशहूर लेखिका नासिरा शर्मा तो बड़ी ही साफगोई के साथ कहती हैं कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में तीन तलाक पर शाहबानों मामले मंे महिलाएं इस लिये मुखर विरोध नहीं कर पाईं थीं क्योंकि उन्होंने शरीयत को पढ़ा नहीं था। इस बार शरीयत के हवाले से किये जाने वाले दावों को महिलाओं ने अपने तर्को से काट दिया। इसलिये उनकी जीत हुई। वह कहती हैं जब हम धर्म के वास्तविक तथ्यों को सामने लायेंगे,तभी उनका मनमाना अर्थ देने वाले पराजित हो सकेंगे।
इसी तरह लेखिका तस्लीम नसरीन कहती हैं सभी सभ्यताएं और धर्म आलोचनाओं की राह से गुजरने के बाद ही प्रकाशवान होते है।आलोचना और विश्लेषण से बचाकर किसी का भी पुनर्जागरण नहीं होता है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: