गांधी जी का जन्म दिवस या भारत का मरण दिवस

माना गाँधी ने कष्ट सहे थे
अपनी पूरी निष्ठां से
भारत विख्यात हुआ है
उनकी अमर प्रतिष्ठा से

किन्तु अहिंसा सत्य कभी 
अपनों पर ही ठन जाता है
माना घी और शहद अमृत है
पर मिलकर विष बन जाता है

अपने सारे निर्णय हम पर
थोप रहे थे महान गाँधी जी
पर तुष्टिकरन में खुनी खंजर
घोप रहे थे अमर गाँधी जी

महा क्रान्ति का हर नायक
उनके लिये एक खिलौना था
उनके अपने हठ के आगे
अखंड भारत भी बोना था

इसलिए अखंड भारत में ही
अखंड भारत का दौर गया
भारत से पंजाब,सिंध
और रावलपिंडी लाहौर गया

तब जाकर सफल हुए
जालिम जिन्ना के मनसूबे
गाँधी जी अपनी जिद में
पूरे भारत को ले डूबे

भारत के इतिहासकार
थे चाटुकार दरबारों में
अपना सब कुछ बेच चुके थे
नेहरु गाँधी के परिवारों में

भारत का सच लिख पाना
था उनके बस की बात नहीं
वैसे भी सूरज का लिख पाना
जुगनू के बस की बात नहीं

आजादी का श्रेय नहीं था
गाँधी के आंदोलोनो को
आजादी को सफल बनाया
शेखर के पिस्टल ग्नो को

जो जिन्ना जैसे राक्षसों से
मिलने जुलने जाते थे
जिनके कपड़े डुलने के लिये
लंदन पेरिस में जाते थे

आर के रस्तोगी  

7 thoughts on “गांधी जी का जन्म दिवस या भारत का मरण दिवस

  1. Shrinarayan Chandak jiThanks for comments, Sorry for late reply. Kindly circulate this poetry to other peoples. Nex month,my book is comming in which such collectios are there. If you are interested I can send you,please provide your postal addres, although this book is available throughout the world. Yours R.K.Rastogi

  2. काश, भारतीय जनसमूह द्वारा कविता में निर्मम सत्य को पहचाना जाए!

    भारत के इतिहासकार
    थे चाटुकार दरबारों में
    अपना सब कुछ बेच चुके थे
    नेहरु गाँधी के परिवारों में

    प्रतिदिन इतिहास लिखते आज मीडिया में चाटुकार क्या कुछ नहीं कर रहे हैं? बात सीधी सी है—यदि सभी राजनैतिक दल भारत और भारतवासियों के लिए अच्छा सोचते हैं तो युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शासन के साथ मिल निस्वार्थ विकास कार्यों में लगने के विपरीत वे अपवित्र गठबंधन द्वारा उनका विरोध क्यों करते हैं?

    बचपन से ही मुझे अचम्भा इस बात का रहा है कि कैसे चतुराई से अखंड भारत के रक्तपात-पूर्ण विभाजन की क्रूर चपेट में आये अधिकतर शांति से रहते हिंदू, सिख और मुसलमानों में लाखों निर्दोष लोगों को विश्व में सबसे बड़े जनसमुदाय के स्थानांतरण में जान-माल गंवा उन्हें गाँधी नेहरु के गुणगान गाते दिखाया गया था| यदि सीमा के दोनों ओर स्थापित राजनीतिज्ञों द्वारा रक्तपात पर सहानुभूति-पूर्ण सकारात्मक कार्य किये होते तो स्वयं लोगों में फिर से सद्भावना व भाईचारा बढ़ जाता लेकिन इसके विपरीत आज राजनैतिक स्तर पर दोनों देश एक दूसरे के शत्रु बने हुए हैं|

    भारत का सच लिख पाना
    था उनके बस की बात नहीं
    वैसे भी सूरज का लिख पाना
    जुगनू के बस की बात नहीं

    भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में तथाकथित स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात १८८५ में जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि कार्यवाहक-शासक के रूप में स्थापना पर सामाजिक, राजनैतिक, व कानूनी अनुसंधान और अध्ययन हेतु स्नातकोत्तर कार्यक्रम आयोजित होने चाहियें ताकि राष्ट्रवादी शासकीय नीति व विधि व्यवस्था निर्माताओं के लिए पिछले कई दशकों में व्यापक भ्रष्टाचार और अराजकता के कारण भारतीय समाज में आज दयनीय स्थिति को समझने के लिए उपयुक्त सामग्री उपलब्ध हो पाए| ऐसी स्थिति में नेहरु गाँधी के मुफ्त में लगे ऐतिहासिक इश्तिहारों को विधि पूर्वक हटाने में कभी कोई संकोच न कर पाए|

  3. काश, भारतीय जनसमूह द्वारा कविता में निर्मम सत्य को पहचाना जाए!

    भारत के इतिहासकार
    थे चाटुकार दरबारों में
    अपना सब कुछ बेच चुके थे
    नेहरु गाँधी के परिवारों में

    प्रतिदिन इतिहास लिखते आज मीडिया में चाटुकार क्या कुछ नहीं कर रहे हैं? बात सीधी सी है—यदि सभी राजनैतिक दल भारत और भारतवासियों के लिए अच्छा सोचते हैं तो युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय शासन के साथ मिल निस्वार्थ विकास कार्यों में लगने के विपरीत वे अपवित्र गठबंधन द्वारा उनका विरोध क्यों करते हैं?

    बचपन से ही मुझे अचम्भा इस बात का रहा है कि कैसे चतुराई से अखंड भारत के रक्तपात-पूर्ण विभाजन की क्रूर चपेट में आये अधिकतर शांति से रहते हिंदू, सिख और मुसलमानों में लाखों निर्दोष लोगों को विश्व में सबसे बड़े जनसमुदाय के स्थानांतरण में जान-माल गंवा उन्हें गाँधी नेहरु के गुणगान गाते दिखाया गया था| यदि सीमा के दोनों ओर स्थापित राजनीतिज्ञों द्वारा रक्तपात पर सहानुभूति-पूर्ण सकारात्मक कार्य किये होते तो स्वयं लोगों में फिर से सद्भावना व भाईचारा बढ़ जाता लेकिन इसके विपरीत आज राजनैतिक स्तर पर दोनों देश एक दूसरे के शत्रु बने हुए हैं|

    भारत का सच लिख पाना
    था उनके बस की बात नहीं
    वैसे भी सूरज का लिख पाना
    जुगनू के बस की बात नहीं

    भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में तथाकथित स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात १८८५ में जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि कार्यवाहक-शासक के रूप में स्थापना पर सामाजिक, राजनैतिक, व कानूनी अनुसंधान और अध्ययन हेतु स्नातकोत्तर कार्यक्रम आयोजित होने चाहियें ताकि राष्ट्रवादी शासकीय नीति व विधि व्यवस्था निर्माताओं के लिए पिछले कई दशकों में व्यापक भ्रष्टाचार और अराजकता के कारण भारतीय समाज में आज दयनीय स्थिति को समझने के लिए उपयुक्त सामग्री उपलब्ध हो पाए| ऐसी स्थिति में नेहरु गाँधी के मुफ्त में लगे ऐतिहासिक इश्तिहारों को विधि पूर्वक हटाने में कोई संकोच न कर पाए|

  4. I agree with Rastogiji. So many Freedom Fighters got martyred but for Gandhi Nehru, they were the sole achievers. They simply be-fooled innocent but uneducated Indians.

  5. Rastogiji,
    I congratulate you for putting forward the truth. The choice of words is so right. Undue credit goes to Mahatma. Just like the mother of Nation is Bharat Mata, not a person. Father of Nation should be something far more Pure and Eternal than a Mahatma, so called. Some day that awakening will come.
    I wish you had written more than what shows here.
    Shrinarayan Chandak, USA

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