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    गाँधी दर्शन और भाषा समस्या

    डॉअर्पण जैन ‘अविचल

    विचारों की परिपक्वता, विस्तार का आभामंडल, सत्य के लिए संघर्ष, सत्य कहने के कारण नकारे जाने का भी जहाँ भय नहीं, अहिंसावादी दृष्टिकोण, उदारवादी रवैय्या, आर्थिक सुधारों के पक्षधर और अंग्रेजों से लोहा लेने में जिन व्यावहारिक कूटनीतिक तरीकों को अपना कर राष्ट्र के स्वाधीनता समर में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्माण करने वाले श्वेत धोतीधारी, हाथों में एक लाठी लेकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने का जज़्बा रख अंग्रेजी हुकूमत को कुछ हद तक झुका कर भारत की स्वाधीनता की दुन्दुभि बजा कर विश्व के सामने अहिंसा के रास्तों का प्रदर्शन करने वाले योद्धा के रूप में स्वीकार्यता प्राप्त बापू के अविचल संघर्ष प्रणम्य हैं। 

    द्वैत-अद्वैत, समाज-जाति, व्यवस्था-प्रशासन, राजनीति-धर्म इन्ही सारे विचारों और विषयों पर जब अध्ययन किया जाए, भारत की भाषा समस्या के बारें में चिंतन-मनन किया जाए तो कवि प्रदीप के गीत में सुसज्जित साबरमती के संत के वर्णन के बिना लेखन अधूरा माना जायेगा। हिन्दी फ़िल्म जागृति (1954) में कवि प्रदीप द्वारा रचित एक गीत ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल’ जिसमें अक्षरसः सत्य लिखा है कि साबरमती के संत मोहनदास करमचंद गाँधी जिसे सारा राष्ट्र ‘बापू’ के नाम से जानता है, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक नई कहानी लिखी।

    लगभग दो शताब्दी से अंग्रेजी हुकूमत का गुलाम भारत अपने यहाँ निकलने वाले सूर्य के तेज़ को अनुभूत करने में जब असमर्थ नज़र आने लगा, उसी दौर में गुजरात के पोरबंदर में मोहनदास का जन्म हुआ। अफ्रीका में शिक्षा ग्रहण कर ‘बेरिस्टर’ बने  गाँधी भारत की स्वाधीनता के कुशल रणनीतिकार भी माने गए हैं।  उनके जीवन और अध्ययन से प्रेरणा प्राप्त करने वाला विश्व आज भी मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए गाँधी दर्शन का ही सहारा लेता हैं।

      स्वाधीनता संघर्ष के दौरान ही भारतीय जनता यह चाहने लगी थी कि हमारा राष्ट्र स्वतंत्र हो और हमारा अपना, खुद का शासन हो। तब उसके साथ-साथ अपनी भाषा को उचित स्थान देने के लिए भी वह जागृत होने लगी। उसे यह विदित होने लगा कि शारीरिक दासता की अपेक्षा मानसिक गुलामी अधिक भयंकर एवं घातक होती है। इस अनुभूति के कारण ही आधुनिक काल में अहिन्दी-भाषियों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करने में अपना जीवन स्वाहा कर दिया।

    गाँधी के दर्शन में राजनैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक समस्याओं के समाधान से लेकर लोक व्यव्हार और लोक कल्याण का खाका रचने वाली सामाजिक इकाइओं की भी कई समस्याओं का सहज समाधान उपलब्ध हैं। आज डेढ़ सौ वर्षों बाद भी जब गाँधी लिखा व पढ़ा जा रहा है तो इसके पीछे यही कारण है कि उनके विचार समाज को नई चेतन देना का सामर्थ्य आज भी रखते हैं।

    इसी वर्ष भारत शासन द्वारा नई शिक्षा नीति बनाई गई, इस शिक्षा नीति में भी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का मसौदा गाँधी दर्शन से मिलता हैं। यह सत्य है कि बह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए ‘जन-भाषा’, ‘लोक- भाषा’ हिन्दी सीखने का आग्रह किया और गुजराती भाषा-भाषी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मराठी-भाषा-भाषी चाचा कालेलकर जी को सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने का आदेश दिया।

    हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इस बात का अत्यधिक सदमा था कि भारत जैसे बड़े और महान राष्ट्र की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। अत: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विखंडित पड़े संपूर्ण भारत को एकसूत्र में बांधने के लिए, उसे संगठित करने के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्यकता का अहसास करते हुए कहा था – ‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ उन्होंने भारत वर्ष के इस गूंगेपन को दूर करने के लिए भारत के अधिकतम राज्यों में बोली एवं समझी जाने वाली हिन्दी भाषा को उपयुक्त पाकर संपूर्ण भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित, स्थापित किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समान बंगाल के चिंतक आचार्य श्री केशवचंद्र सेन ने भी ‘सुलभ-समाचार’ पत्रिका में लिखा था- ‘अगर हिन्दी को भारतवर्ष की एकमात्र भाषा स्वीकार कर लिया जाय तो सहज में ही यह एकता सम्पन्न हो सकती है।’ अर्थात् हिन्दी ही खंड़ित भारत को अखंड़ित बना सकती है।

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी विखंडित भारत राष्ट्र को अखंडित बनाने के लिए राष्ट्रभाषा के सच्चे एवं प्रबल समर्थक तो थे लेकिन पराधीनता के समय में, अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार के युग में उनके दिमाग में राष्ट्रभाषा की संकल्पना निश्चित थी। अपने इसी दर्शन के कारण ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गुजरात-शिक्षा-सम्मेलन के अध्यक्षीय-पद से राष्ट्रभाषा के प्रसंग में प्रवचन देते हुए राष्ट्रभाषा की व्याख्या स्पष्ट की थी। दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रभाषा का लक्षण स्पष्ट किया था। राष्ट्रपिता गांधीजी के शब्दों में देखिए – ‘राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो सरकारी कर्मचारियों के लिए सहज और सुगम हो। जो धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। जिसको बोलने वाला बहुसंख्यक समाज हो, जो पूरे देश के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो। अंग्रेजी किसी तरह से इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाती।’ इस प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तत्कालीन अंग्रेजी-शासनकाल की अंग्रेजी-भाषा की तुलना में एकमात्र हिन्दी-भाषा में ही राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा (लिंक लेंगवेज) एवं राजभाषा होने के सामर्थ्य का दर्शन किया था।

    सुभाषचंद्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही थी। श्री अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। नागरी लिपि के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र ने तो ई. सन् 1910 में यहां तक कहा था – यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ, ‘साधु हिन्दी’ में वार्तालाप करूंगा। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। इन अहिन्दी-भाषी-मनीषियों में राष्ट्रभाषा के एक सच्चे एवं सबल समर्थक हमारे पोरबंदर के निवासी साबरमती के संत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे।

    हिन्दी के सवाल को गांधी जी केवल भावनात्मक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं मानते थे, अपितु उसे एक राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में भी देखने पर जोर देते थे। 10 नवम्बर, 1921 के ‘यंग इण्डिया’ में उन्होंने लिखा हिन्दी के भावनात्मक अथवा राष्ट्रीय महत्व की बात छोड़ दें तो भी यह दिन प्रतिदिन अधिकाधिक आवश्यक मालूम होता जा रहा है कि तमाम राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं को हिन्दी सीख लेनी चाहिए और राष्ट्र की तमाम कार्यवाही हिन्दी में ही की जानी चाहिए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी ने पूरे देश में हिन्दी का राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचार काफी जोरदार ढंग से किया और उसे राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, स्वाभिमान का पर्याय-सा बना दिया।

    उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी-प्रचार के लिए दक्षिण भारत भेजा था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना उन्हीं की परिकल्पना का परिणाम है। उन्होंने वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हिन्दी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से ही की थी तथा जन-नेताओं को भी हिन्दी में कार्य करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया था। उनकी प्रेरणा के ही परिणाम स्वरूप हिन्दीतर भाषा-भाषी प्रदेशों के स्वतंत्रता संग्राम के ने हिन्दी को सीख लिया था और उसे व्यापक जन-सम्पर्क का माध्यम बनाया था।

    वर्तमान समय में भारत में एक राष्ट्र- एक राष्ट्रभाषा की मांग पुरजोर तरीके से उठी हुई है। एक ओर भारत स्वास्थ्य के विषम हालातों से दो चार हो रहा है, कोरोना का संकट काल है बावजूद इसके देश में कई तरह की गंभीर समस्याएँ दिन-प्रतिदिन उठती जा रही है। हालिया दौर में किसान समस्या, आरक्षण समस्या एवं भाषा समस्या भी सर्वोपरि हैं। यदि इन समस्याओं का समाधान भी गाँधी दर्शन में खोजा जाएँ तो निश्चित तौर पर भारत एक सूत्रीय प्रगति का नया सौपान तय कर सकता है। गाँधी दर्शन के अनुसार भारत की एक प्रतिनिधि भाषा होना चाहिए जो सम्पूर्ण भारत में सर्वमान्य हो, ऐसी भाषा वर्तमान में हिन्दी ही है, क्योंकि देश की लगभग साठ प्रतिशत आबादी हिन्दी को प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार्य करती हैं। ऐसे में अन्य भारतीय भाषाओँ के अस्तित्व पर खतरा समझने वाले लोगों के लिए भी गाँधी दर्शन मौन नहीं है, उस दर्शन अनुसार अन्य भारतीय भाषाओँ को मातृभाषा मान कर स्थानीय स्तर पर उन भाषाओँ में कार्य व्यवहार होना चाहिए। दौलत सिंह कोठारी आयोग ने जिस शिक्षा नीति को देश के सामने रखा था उसे भी लागू करके देश को भाषाई दलदल से निकाला जा सकता हैं। सभी भारतीय भाषाओँ को राजभाषा बनाया जाएँ, और देश की प्रतिनिधि भाषा यानि राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को स्थाई रूप से निर्वाचित किया जा सकता हैं।

    हिन्दी राष्ट्रभाषा के स्थान पर उसी समय आसीन होगी जब जनता के स्तर पर वह सम्पर्क, व्यावहारिक भाषा बन जाय। अर्थात् एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश से मिले तो वह अंग्रेजी आदि का प्रयोग न कर हिन्दी का प्रयोग करे। तामिल-भाषी बंगाली से मिलने पर या पंजाबी मलयाली से मिलने पर या मराठी गुजराती से मिलने पर आपसी व्यवहार, विचार-विनिमय हिन्दी में करे। इस प्रकार राष्ट्रीय जीवन में हिन्दी व्यावहारिक-संपर्क की महत्त्वपूर्ण कड़ी बनने पर ही राष्ट्रभाषा बन सकती है और इससे ही राष्ट्रपिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित हो सकती है।

    अर्पण जैन "अविचल"
    अर्पण जैन "अविचल"
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