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    Homeसाहित्‍यकवितालोकतंत्री भाषा से दूरी क्यों करते

    लोकतंत्री भाषा से दूरी क्यों करते

    —विनय कुमार विनायक
    मत भेदभाव करो स्वभाषा के नाम पे
    भाषा बदल जाती इंसान बदलता नहीं
    नाम बदल जाता ईमान बदलता नहीं
    स्थान बदल जाता किंतु भगवान नहीं
    मत उमेठो कान कानून की भाषा से!

    देश बहुत बड़ा है भाषा बहुत हो गई
    देश बहुत बड़ा है आशा बहुत हो गई
    देश बहुत बड़ा, आस्था बहुत हो गई
    भाषा, आशा,आस्था मानवीय चीज है
    मानवता को मत मरने दो भाषा से!

    भाषा रंगहीन, गंधहीन, धर्महीन होती
    किंतु भाषा रंग बदलती,गंध बदलती,
    धर्म बदलती जब दुर्भावना में पलती,
    देश को तोड़ती, मानवता को छलती,
    मत मारो मानवता को स्वभाषा से!

    उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम सीमा है
    देश को मत बांटो भाषाई सीमा में
    बहुत सी देशी भाषा है इस देश की
    कौन सी अपनी, कौन नहीं अपनी?
    मत धिक्कारो हिन्द को स्वभाषा से!

    अगर विदेशी सीखनी है सीख लो
    किन्तु मजबूरी क्या है कि सीखते
    गुलामी की भाषा, सीखते नही हो
    आजादी की भाषा,शहीदों की भाषा
    राष्ट्रभाषाई से नफरत क्यों करते?

    भाषा की दीवार तोड़ो,देश को जोड़ो,
    आशा मत छोड़ो, दिलाशा की भाषा,
    भारत की केन्द्रीय भाषा, राजभाषा
    हिन्दी है, हिन्दी है संसद की भाषा,
    लोकतंत्री भाषा से दूरी क्यों करते?

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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