गौ-रक्षा का बदनाम होता उद्देश्य

गौ-हत्या पर रोक का कानून बनता है तो दुध का उत्पादन तो बढ़ेगा ही, जैविक खाद से खेती भी होने लग जाएगी। फिलहाल देश में दुग्ध उत्पादन में कमी अनुभव की जाने लगी है। जिसकी भरपाई नकली दूध से की जा रही है। जो नई-नई बीमारियां परोसने का काम कर रहा है। दूध की दुनिया में सबसे ज्यादा खपत भारत में है। देश के प्रत्येक नागरिक को औसतन 290 गा्रम दूध रोजाना मिलता है। इस हिसाब से कुल खपत प्रतिदिन 45 करोड़ लीटर दूध की हो रही है। जबकि शुद्ध दूध का उत्पादन करीब 15 करोड़ लीटर ही है। मसलन दूध की कमी की पूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर, यूरिया और पानी मिलाकर की जा रही है। दूध की लगातार बढ़ रही मांग के करण मिलावटी इस दूध का कारोबार गांव-गांव फैलता जा रहा है।


प्रमोद भार्गव
राजस्थान के अलवर में कथित गौ-रक्षकों ने पहलू खान नाम के एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर दी। इसी घटना के परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी, जिसमें गौ-रक्शा के नाम पर सक्रिय-समूहों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। इस बाबत न्यायालय ने केंद्र समेत 6 राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए हैं। राजस्थान सरकार से तो पहलू खान हत्याकांड का पूरा ब्यौरा मांगा है। इस बाबत देर से ही सही राष्ट्रिय स्वयं सेवक के प्रमुख मोहन भागवत ने भी गौ-रक्षक दलों की हिंसक वारदातों की निंदा की है। उनका कहना है कि इन घटनाओं से गौ-रक्शा का पवित्र उद्देश्य बदनाम होता है। साथ ही गौ-हत्या को अधर्म बताते हुए देश भर में इस पर पाबंदी की वकालात की है।
बीते कुछ महीनों में गुजरात, झारखंड, मध्यप्रदेश , उत्तरप्रदेश और कर्नाटक में गौ-रक्शा के नाम पर गैर-कानूनी वीभत्स एवं अराजक घटनाएं घटी है। देश के अधिकांश राज्यों में गौ-हत्या अपराध है। गौ-मांस की बिक्री पर भी प्रतिबंध है। लिहाजा गौ-रक्षकों को कानून और संविधान के दायरे में रहने की जरूरत है। जबकि हो उल्टा रहा है। लोग कानून का उल्लघंन कर व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। जबकि उनका दायित्व बनता है कि वे गाय से जुड़ी किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि की सूचना पुलिस को दे और फिर कार्यवाही और न्याय होने दें। खुद न्याय व्यवस्था हाथ में लेकर इंसाफ करने का अधिकार गौ-रक्षकों को कतई नहीं है। वैसे भी यदि समाज का व्यवहार बदलता है तो बिना किसी कानून के भी गौ-हत्या बंद हो सकती है। आज हम गाय को मां मानते है तो किसी कानून के वशीभूत न होकर गाय की महिमा एवं उपयोगिता को ज्ञान परंपरा से जानते हुए मानते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  ने भी बीते साल तथाकथित गोरक्षकों पर हमलावर होते हुए कहा था कि 80 प्रतिशत गोरक्षक धंधेबाज हैं। राज्य सरकारें इनकी कुंडली निकालें और सख्त कानूनी कार्यवाही करें। मोदी ने यह भी कहा कि ज्यादातर गायें कत्लखानों में कत्ल से ज्यादा प्लास्टिक खाने से मरती हैं। मोदी का यह बयान तब आया है, जब गुजरात के ऊना में कुछ दलितों को मरी गायों की खाल उतारने पर पीटा गया था।
कथित गौ-रक्षक उन राज्यों में ज्यादा अरजकता दिखा रहे हैं, जिनमें भाजपा सरकारें हैं। इस कारण गौ-रक्षक कानून हाथ में लेते हुए वैध-अवैध का भी फर्क नहीं कर पा रहे हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्यवाही की है। वैध बूचड़खानों पर उन्होंने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है और न ही हर प्रकार के मांस कारोबार को प्रतिबंधित किया है। बावजूद वहां अन्य प्रकार के मांस की दुकानों पर हमले हुए तो सरकार ऐसी गैर-कानूनी कार्यवाहियों से सख्ती  से निपटी है। साफ है, बूचड़खानों पर शत -प्रतिशत रोक लगाने के लिए राज्य अथवा केंद्र सरकार को कानून बनाने की जरूरत है। इसीलिए मोहन भागवत ने गौ-हत्या पर कानून बनाकर पाबंदी लगाने की मांग की है। इस लिहाज से गौ-रक्षक और भाजपा कार्यकताओं को अपनी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार पर कानून बनाने का दबाव बनाने की जरूरत है।

गौ-हत्या पर रोक का कानून बनता है तो दुध का उत्पादन तो बढ़ेगा ही, जैविक खाद से खेती भी होने लग जाएगी। फिलहाल देश में दुग्ध उत्पादन में कमी अनुभव की जाने लगी है। जिसकी भरपाई नकली दूध से की जा रही है। जो नई-नई बीमारियां परोसने का काम कर रहा है। दूध की दुनिया में सबसे ज्यादा खपत भारत में है। देश के प्रत्येक नागरिक को औसतन 290 गा्रम दूध रोजाना मिलता है। इस हिसाब से कुल खपत प्रतिदिन 45 करोड़ लीटर दूध की हो रही है। जबकि शुद्ध दूध का उत्पादन करीब 15 करोड़ लीटर ही है। मसलन दूध की कमी की पूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर, यूरिया और पानी मिलाकर की जा रही है। दूध की लगातार बढ़ रही मांग के करण मिलावटी इस दूध का कारोबार गांव-गांव फैलता जा रहा है। बहरहाल मिलावटी दूध के दुश्परिणाम जो भी हों, इस असली-नकली दूध का देश की अर्थव्यवस्था में योगदान एक लाख 15 हजार 970 करोड़ रूपए का है। दाल और चावल की खपत से कहीं ज्यादा दूध और उसके सह उत्पादों की मांग व खपत बढ़ी है। इसीलिए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि वे मौजूदा कानूनों में बदलाव लाकर मिलावटखोरों को उम्रकैद की सजा के प्रावधान करें।
दूध की इस खपत के चलते दुनिया के देशों निगाहें भी इस व्यापार को हड़पने में लगी है। दुनिया की सबसे बड़ी दूध का कारोबार करने वाली फ्रांस की कंपनी लैक्टेल है। इसने भारत की हैदराबाद की सबसे बड़ी ‘तिरूमाला दूध डेयरी‘ को 1750 करोड़ रूपए में खरीद लिया है। इसे चार किसानों ने मिलकर बनाया था। भारत की तेल कंपनी आॅइल इंडिया भी इसमें प्रवेश कर रही है। क्योंकि दूध का यह कारोबार 16 फीसदी की दर से हर साल बढ़ रहा है।
अमेरिका भी अपने देश में बने सह उत्पाद भारत में खपाने की तिकड़म में है। हालांकि फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है। अमेरिका चीज;पनीर भारत में बेचना चाहता है। इस चीज को बनाने की प्रक्रिया में बछड़े की आंत से बने एक पदार्थ का इस्तेमाल होता है। इसलिए भारत के शाकाहारियों के लिए यह पनीर वर्जित है। गो-सेवक व गऊ को मां मानने वाला भारतीय समाज भी इसे स्वीकार नहीं करता। अमेरिका में गायों को मांसयुक्त चारा खिलाया जाता है, जिससे वे ज्यादा दूध दें। हमारे यहां गाय-भैसें भले ही कूड़े-कचरे व मानव-मल में मुंह मारती फिरती हों,लेकिन दुधारू पशुओं को मांस खिलाने की बात कोई सपने में भी नहीं सोच सकता। लिहाजा अमेरिका को चीज बेचने की इजाजत नहीं मिल पा रही है। लेकिन इससे इतना तो तय होता है कि बहुराष्ट्रिय कंपनियों की निगाहें हमारे दूध के कारोबार को हड़पने में लगी हैं और हम हैं कि बूचड़खानों को सब्सिडी देकर गोवंश की हत्या के प्रबंध कर रहे हैं।
बिना किसी सरकारी मदद के बूते देश में दूध का 70 फीसदी कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इस कारोबार में ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। लेकिन पारंपरिक ज्ञान से न केवल वे बड़ी मात्रा में दुग्ध उत्पादन में कामयाब हैं,बल्कि इसके सह उत्पाद दही, घी, मक्खन, पनीर, मावा आदि बनाने में भी मर्मज्ञ हैं। दूध का 30 फीसदी कारोबार संगठित ढांचा,मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में दूध उत्पादन में 96 हजार सहकारी संस्थाएं जुड़ी है। 14 राज्यों की अपनी दूध सहकारी संस्थाएं हैं। देश में कुल कृशि खाद्य उत्पादों व दूध से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसदी हैं, किंतु वह दूध ही है,जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, घी, मक्खन, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे सात करोड़ से भी ज्यादा लोगों की अजीविका चल रही है।
चंद पूर्वग्रही, दुधारू मवेशियों की सुरक्शा को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक दृश्टि से देखते हुए मुस्लिम हित प्रभावित होने की बात को तूल देते हैं। आम धारणा है कि मांस के व्यापार में मुसलमान जुड़े हैं, जबकि यह धारणा निराधार है। देश के जो सबसे बड़े चार मांस निर्यातक हैं, वे हिंदू हैं। दुधारू पशुओं को पालने और दूध के व्यापार से ग्रामीण दलित और मुसलमान भी जुड़ा है। बकरियों के कारोबार में तो मुस्लिमों की बहुतायत है। इसके विपरीत हिंदुओं में खटीक समाज के लोग भी मांस का व्यापार करते हैं। निर्यात के कारोबार से भी ये लोग जुड़े हैं। लिहाजा केवल दलित और मुसलमानों को इस धंधे के लिए दोषी ठहराना नाइंसाफी है।
प्रमोद भार्गव

Leave a Reply

%d bloggers like this: