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    Homeसाहित्‍यलेखमहाकाल की परिवर्तनकारी चेतना का प्रकाशपुंज है गायत्री तीर्थ ‘शांतिकुंज’

    महाकाल की परिवर्तनकारी चेतना का प्रकाशपुंज है गायत्री तीर्थ ‘शांतिकुंज’

    मनोज ज्वाला
    भारत सरकार ने हरिद्वार में अवस्थित ‘गायत्री तीर्थ शांतिकुंज’ की
    स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर पिछले गंगा दशहरा के दिन उस आध्यात्मिक स्थापना
    के नाम से एक डाक-टिकट जारी किया है । शांतिकुंज मैं प्रायः जाते रहता
    हूं । वह स्वतंत्रता सेनानी से आध्यात्मिक साधक तपस्वी ऋषि बने पण्डित
    श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित एक ऋषि-अरण्यक है.जहां एक बहुत बडा
    आध्यात्मिक प्रयोग हो रहा है । मनुष्य में देवत्व के अभ्युदय से धरती पर
    सतयुग की वापसी के निमित्त ‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा , हम सुधरेंगे-युग
    सुधरेगा’ की ललकार के साथ ‘युग निर्माण योजना’ के तहत ‘स्वच्छ मन –
    स्वस्थ शरीर – सभ्य समाज’ की रचना का लक्ष्य लिए हुए ‘व्यक्ति-निर्माण ,
    परिवार-निर्माण, समाज-निर्माण’ विषयक विविध कार्यक्रमों की भिन्न-भिन्न
    गतिविधियां चलाने के लिए तदनुसार आध्यात्मिक विज्ञान व वैज्ञानिक
    अध्यात्म का प्रतिपादन करनेवाले युग-ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य की
    स्थापनाओं-विचारनाओं की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है शांतिकुंज । यह एक
    संस्था भी है और सतविचार भी ; संगठन , मिशन भी और सत्प्रवृतियों के
    संवर्द्धन व दुष्प्रवृतियों के उन्मूलन का क्रियात्मक विस्तार भी ।
    अध्यात्म विज्ञान और पदार्थ विज्ञान के परस्पर समन्वय से
    व्यक्ति-परिवार-समाज के परिष्करण और युग-परिवर्तन की इसकी योजना इस तथ्य
    व सत्य पर आधारित है कि दुनिया भर में व्याप्त समस्त समस्याओं का मूल है-
    वैचारिक प्रदूषण , जिसका असली कारण विज्ञान के एक पक्ष- ‘पदार्थ’ के
    प्रति बढती आशक्ति और दूसरे पक्ष- ‘अध्यात्म’ के प्रति घटती रुचि अथवा
    इसकी गलत व पदार्थोन्मुखी अभिव्यक्ति है । रथ का एक घोडा कुमार्गी हो जाए
    और दूसरा उसी का अनुगामी , तब जिस तरह से दुर्घटना सुनिश्चित है ; उसी
    तरह की अवांछित स्थिति से उल्टी दिशा में गुजर रही है- आज की मानवी
    सभ्यता , समाज-व्यवस्था और वैश्विक अवस्था । इस उल्टे को उलट कर सीधा
    करने का वैचारिक सरंजाम है- युग निर्माण योजना का विस्तार व
    गायत्री-चेतना का संचार , जो आधुनिक युग के विश्वामित्र कहे जाने वाले
    ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य-विरचित हजारों (लगभग-३५००) ग्रंथों-पुस्तकों
    में वर्णित तथ्यों के अनुसार अदृश्य अलौकिक शक्तियों से
    निर्देशित-संचालित है और इसका मुख्यालय शांतिकुंज है जिसकी स्थापना का एक
    व्यापक आध्यात्मिक अख्यान है ।
    इंग्लैण्ड से उच्च अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर आईसीएस बन जाने के
    पश्चात भारत लौट आने पर कुछ वर्षों तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की
    क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहने के बाद आध्यात्मिक प्रेरणावश
    योगी बन के सन १९१० से पाण्डिचेरी में ४० वर्षों तक आध्यात्मिक
    प्रयोग-साधना करते रहे अरविन्द घोष जो महर्षि अरविन्द कहे जाते हैं
    उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से भारत की भवितव्यता व होतव्यता का अवलोकन
    कर राष्ट्र के नाम अपने एक संदेश में सनातन धर्म को भारत की राष्ट्रीयता
    घोषित करते हुए यह घोषणा की थी कि “भारत का वैश्विक पुनरुत्थान
    अवश्यम्भावी है और इसके लिए योगेश्वर कृष्ण की ‘अधिमानसिक शक्ति’ से
    सम्पन्न एक दिव्य पुरुष का अवतरण सन १९२६ में हो चुका है ”।
    महर्षि के कथनानुसार सन १९२६ में जो हुआ उसी की परिणति है
    शांतिकुंज की वर्तमान व्याप्ति । सन १९११ में जन्में श्रीराम शर्मा को सन
    १९२६ की वसंत-पंचमी के दिन गायत्री-उपासना के दौरान एक दिव्य
    प्रकाश-सम्पन्न अलौकिक पुरुष-आकृति से साक्षात्कार हुआ और उन्होंने
    श्रीराम को ‘नया जन्म’ देते हुए अपने स्पर्श-मात्र से उनकी चेतना को
    कबीरदास व रामकृष्ण परमहंस के रुप में कई जन्म-जन्मान्तरों की यात्रा करा
    कर उन्हें युग-परिवर्तन की दैवीय योजना के क्रियान्वयन हेतु समस्त
    विश्व-वसुधा की चेतना झकझोरने का आध्यात्मिक सरंजाम खडा करने की
    तपश्चर्या में नियोजित कर दिया । श्रीराम शर्मा के वे गुरू
    सर्वेश्वरानन्द ने उन्हें एक “अखण्ड ज्योति” प्रदान की थी, जो शांति कुंज
    , हरिद्वार में आज भी अविराम प्रज्ज्वलित है । अपने उन अलौकिक गुरू के
    मार्गदर्शन में श्रीराम ने चौबीस वर्षों तक गाय के गोबर में से एकत्र
    उच्छिष्ट जौ की रोटी व गौ-दुग्ध की छाछ मात्र का सेवन कर कठोर तप करते
    हुए गायत्रीमंत्र (चेतना-शक्ति) के ‘चौबीस लक्षी’ चौबीस महापुरश्चरण करने
    के दौरान तीन बार हिमालय की दुर्गम यात्रा कर वहां विराजमान प्राचीन
    ऋषियों की ‘अलौकिक संसद’ के निर्देशानुसार महाकाल की उपरोक्त
    परिवर्तनकारी ‘युग निर्माण योजना’ के क्रियान्वयन हेतु वेद-विदित
    अध्यात्म-दर्शन का आधुनिक युगानुकूल वैज्ञानिक प्रतिपादन करने के पश्चात
    सनातन धर्मी वर्णव्यवस्था को उसके मूल रुप में पुनर्स्थापित करने,
    व्यक्तियों को ब्रह्म-तेज से सम्पन्न ब्राह्मण-वानप्रस्थी व क्षात्र-बल
    से सम्पन्न क्षत्रीय-युगसेनानी बनाने, अछुतों-दलितों को भी वेदाध्ययन का
    अधिकार व अवसर प्रदान कर ब्राह्मण बनने-बनाने का प्रशिक्षण देने,
    स्त्रियों को सचमुच की शक्तिस्वरुपा वेदवादिनी बनाने तथा समाज की तमाम
    दुष्प्रवृतियों का उन्मूलन करने एवं राष्ट्र-धर्म के रक्षार्थ विभिन्न
    सतप्रवृतियों का संवर्द्धन करने और सामाजिक रुढियों-पाखण्डों-मूढ
    मान्यताओं-प्रथाओं को निरस्त-निष्प्रभावी करने के साथ-साथ वेद-विदित
    संस्कार-परम्पराओं को पुनर्जीवित करने के निमित्त आधुनिक विज्ञान-सम्मत
    विपुल साहित्य-सामग्रियों-संसाधनों से युक्त व्यापक-विराट धर्मतंत्र देश
    भर में खडा कर आसुरी शक्तियों के विरूद्ध एक बहुआयामी आन्दोलन छेड दिया ।
    इस निमित्त उन्होंने समस्त भारतीय आध्यात्मिक-धार्मिक वांग्मय का
    लोकभाषिक रुपान्तरण करने के साथ-साथ व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र-जीवन
    के सभी प्रश्नों-मसलों-समस्याओं का सनातनधर्मी समाधन प्रस्तुत करने वाले
    तीन हजार से भी अधिक साहित्य रच कर तथा मानवी चेतना के उत्त्कर्ष-उन्नयन
    विषयक सूक्ष्म-गुह्य अन्वेषण-मंथन हेतु ‘ब्रह्मवर्चस रिसर्च इंस्टिच्युट’
    की अभिनव स्थापना कर और जन-मानस को अधिमानस व अतिमानस स्तर तक
    परिष्कृत-संस्कारित करने के निमित्त मथुरा में ‘गायत्री तपोभूमि’ एवं
    ‘हरिद्वार में ‘शांति-कुंज’ नामक अद्भूत आधुनिक ‘ऋषि-अरण्यक’ बसा कर
    ‘देव-मानव’ गढने का टकसाल खडा कर दिया । ‘महाकाल’ के इन दोनों पार्थिव
    निदेशालयों में लाखों गायत्री-साधकों द्वारा विवेक-सदबुद्धि जगाने-उभारने
    और वातावरण को नवसृजनकारी तरंगों से तरंगित करने की शक्ति विखेरने का
    सामूहिक जप-यज्ञ वर्षों से चल रहा है । आचार्य जी ने वर्तमान कलयुग को
    कलंकित करने वाली असुरता के विरूद्ध ‘युग निर्माण योजना’ प्रस्तुत करते
    हुए अनीति अन्याय, अनाचार, आडम्बर, पाखण्ड, अन्धविश्वास, अस्पृश्यता,
    जात-पात वंशवाद, नेग-दहेज, मृतक-भोज, अपव्यय, अपसंस्कृति, फैशनपरस्ती,
    असमानता, विषमता, स्वार्थपरता व ईश्वरीय अनास्था-अविश्वास एवं अनियंत्रित
    भोग-उपभोग, दुराचरण, प्रदूषण तथा जाति-लिंग-भाषा-प्रांत विषयक भेदभाव के
    विरूद्ध जन-जागरण और तत्सम्बन्धी सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन हेतु
    प्रशिक्षित-संकल्पित युग-शिल्पी साधकों के समय-श्रम-पुरुषार्थ का
    योजनाबद्ध सतत नियोजन शुरू किया, जो आज भी जारी है । इस बीच देश की आजादी
    के पश्चात उन्हें शासन-सत्ता से आकर्षक पद की पेशकस की गई तो उसे
    उन्होंने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया , स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन लेने
    से भी मना कर दिया तथा स्वयं राजनीति में भाग नहीं लेने और लोकचेतना के
    आध्यात्मिक उन्नयन से राजनीति की उल्टी दिशा को भी उलट कर सीधा करने के
    अपने कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में लगे रहे । सन १९९० की गंगा दशहरा
    (गायत्री जयन्ती) को उनके पूर्व-घोषित महाप्रयाण के बाद से भी उनका युग
    निर्माण आन्दोलन प्रखर चिन्तक चिकित्सक वैज्ञानिक डा० प्रणव पण्ड्या के
    नेतृत्व में समस्त विश्व-वसुधा को अपनी परिधि में लेता हुआ विस्तृत होता
    जा रहा है । धर्मतंत्र से लोकशिक्षण-विषयक विविध परिवर्तनकारी
    कार्यक्रमों के आयोजन और तत्सम्बन्धी विचार-साहित्य-सम्प्रेषण से समाज के
    मुर्द्धन्यों-सज्जनों को अनीति-अनौचित्य के विरूद्ध जागृत-संगठित करने
    तथा अवांछित चाल-चलन बदलने व सन्मार्गी सदाचरण अपनाने और उल्टे को उलट कर
    सीधा करने के बहुविध प्रयत्नों-प्रकल्पों को विस्तार देने वाले डा०
    पण्ड्या को पिछले वर्ष राष्ट्रपति ने राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया था ।
    किन्तु, युग-ऋषि के आदर्शों-मान्यताओं के अनुरूप ही उन्होंने भी यह
    राजनीतिक पद स्वीकार नहीं किया और राजनीति की दिशा-धारा बदलने वाली युग
    निर्माण योजना के क्रियान्वयन को ही महत्व दिया ।
    व्यक्ति-परिवार-समाज-जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त अवांछनीयताओं
    के विरुद्ध कल्याणकारी परिवर्तन के निमित्त सद्विचारों (गायत्री) की
    साधना, सत्साहित्यों की उपासना व सत्कर्मों की आराधना से जनमानस का
    परिष्कार इस योजना के बौद्धिक आन्दोलन की धुरी है । ब्रह्मबर्चस शोध
    संस्थान और देव संस्कृति विश्वविद्यालय इसकी दो अभिनव स्थापनायें हैं ।
    ब्रह्मबर्चस में विशेष रूप से धर्म-अध्यात्म पर वैज्ञानिक शोध-संधान होते
    हैं , तो विश्वविद्यालय में भारतीय सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और
    युगपरिवर्तनकारी भावभूमि पर प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति एवं अत्याधुनिक
    प्रौद्योगिकी से भाषा, साहित्य, व्याकरण, इतिहास, पर्यटन, ज्योतिष, गणित,
    फलित, योग, मनोविज्ञान, स्वास्थ्य प्रबन्धन, ग्राम-प्रबन्धन,
    आपदा-प्रबन्धन, पत्रकारिता, अध्यापन आदि विविध विषयों पर अनूठे
    पाठ्यक्रमों की उच्च शिक्षा-विद्या प्रदान की जाती है । इन दोनों ही
    स्थापनाओं के संचालन और युग-परिवर्तनकारी भावनाशील व्यक्तियों के समय ,
    साधन व श्रम के सुनियोजन का मुख्यालय-निदेशालय शांतिकुंज ही है , जहां
    प्रायः दस हजार से भी अधिक पीत-वस्त्रधारी ऐसे लोग युग निर्माण योजना की
    विविध गतिविधियों को भिन्न-भिन्न क्रिया-कलापों से देश-दुनिया भर में
    फैलाने के निमित्त एक सुव्यवस्थित दिनचर्या के तहत विविध
    प्रकल्पों-प्रकोष्ठों में सक्रिय देखे जाते हैं । प्रातः-जागरण से लेकर
    रात्रि-शयन तक की व्यस्त दिनचर्या का हर क्षण और हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग
    में सप्तसरोवर की तपोभूमि पर अवस्थित उस ऋषि-आरण्यक-आश्रम का एक-एक कण
    सविता के तेज से उद्दीप्त और वेद-विदित जीवन-शैली से अभिशिक्त प्रतीत
    होता है । प्रातः पांच बजे से आठ बजे तक व्यास-पीठ पर बैठ
    महिलायें-कन्यायें वेद-विदित विशुद्ध वैज्ञानिक रीति से नित्य यज्ञ-कर्म
    सम्पादित करती-कराती हैं । उन्हीं के निर्देशन में सामने यज्ञ-मण्डप में
    अग्नि-कुण्डों के चारो तरफ बैठे लोग पहले ‘गायत्री-मंत्र’ , फिर
    ‘महारुद्र’ व ‘महामृत्युञ्जय मंत्र’ से विविध औषधीय पदार्थों की आहुतियां
    होम करते हैं । यह प्रति दिन का उनका सबसे पहला सामूहिक नित्य-कर्म है ।
    युग निर्माण योजना के संस्थापक ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य
    की स्थूल काया जब शांतिकुंज में वास करती थी, तब भारत-पाक युद्ध (१९७१)
    के दौरान राष्ट्र-संकट के निवारणार्थ अमेरिकी नौसेना के सातवें बेडे को
    भारतीय समुद्री सीमा-क्षेत्र में आने से रोक देने और एक भटके हुए
    प्रलयकारी अंतरिक्षयान- ‘स्काईलैब’ को पृथ्वी पर गिरने से रोक उसे गहरे
    समुद्र में धकेल कर प्रलय टाल देने जैसे कई आध्यात्मिक-यज्ञीय प्रयोग
    वहां सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुके हैं , जिनके रहस्यों से दुनिया आज तक
    अनभिज्ञ व अचम्भित है ; किन्तु उनका प्रचार नहीं किया गया ।
    जाति-सम्प्रदाय के भेद से परे सर्वजन-हिताय उत्कृष्ट जीवन-शैली का अभ्यास
    कराने के बावत नियमित प्रशिक्षण-सत्रों का आयोजन करते रहने वाले
    शांतिकुंज में इन दिनों आतंकवाद के निवारणार्थ ‘क्लीं’ सम्पुट-युक्त
    गायत्री-मंत्र के जप व यज्ञ का भी एक प्रयोग चल रहा है और यह भी
    प्रचार-विज्ञापन से दूर ही है । इस प्रयोग का परिणाम क्या होगा, यह तो
    आने वाला समय ही बताएगा; किन्तु इससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि
    भारत के पुनरुत्थान हेतु आध्यात्मिक उपक्रम भी पराक्रम पर है । हिमालय की
    ऋषि-सत्ता से संचालित–निर्देशित यह आश्रम महाकाल की परिवर्तनकारी चेतना
    का प्रकाशपुंज है. जो सनातन धर्म के अधिष्ठान पर खडा है और विश्व-कल्याण
    के निमित्त भारत राष्ट्र के पुनरुत्थान को प्रतिबद्ध है । यहां से ऋषि
    वशिष्ठ , विश्वामित्र , अगस्त्य , परशुराम. याज्ञवल्क , चरक. दधीचि.
    कणाद आदि तमाम ऋषियों की सुशुप्त परम्पराओं और उनकी विद्याओं के
    पुनर्जीवन व पुनर्प्रतिष्ठापन के विविध प्रकल्प भारत सहित विश्व भर के
    १४४ देशों में लगभग ६००० गायत्री शक्तिपीठों और गायत्री चेतनाकेन्द्रों
    के माध्यम से चलाये जा रहे हैं । यह अद्भूत है…रोमांचकारी है !
    • मनोज ज्वाला

    मनोज ज्वाला
    मनोज ज्वाला
    * लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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