लेखक परिचय

सुरेश चिपलूनकर

सुरेश चिपलूनकर

लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।

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दिल्ली में सम्पन्न हुई सर्वदलीय बैठक के बेनतीजा रहने के बाद मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, अब्दुल्ला पिता-पुत्र तथा “सेकुलर देशद्रोही मीडिया” के दबाव में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल ने कश्मीर जाकर सभी पक्षों से बात करने का फ़ैसला किया था। 20 सितम्बर को यह सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल श्रीनगर में अवतरित हुआ। इस प्रतिनिधिमण्डल के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाते हुए, अली शाह गिलानी ने इनसे बात करने से ही मना कर दिया और महबूबा मुफ़्ती की पार्टी PDP ने इनका बहिष्कार कर दिया। इधर के लोग भी कम नहीं थे, प्रतिनिधिमण्डल की इस फ़ौज में चुन-चुनकर ऐसे लोग भरे गए जो मुस्लिम वोटों के सौदागर रहे, एक चेहरा तो ऐसा भी था जिनके परिवार का इतिहास जेहाद और हिन्दू-विरोध से भरा पड़ा है। इस तथाकथित “मरहम-टीम” का शान्ति से कोई लेना-देना नहीं था, ये लोग विशुद्ध रुप से अपने-अपने क्षेत्र के मुस्लिम वोटों की खातिर आये थे, इस प्रतिनिधिमण्डल में जाने वालों के चुनाव का कोई पैमाना भी नहीं था।

महबूबा मुफ़्ती और लोन-गिलानी के अलगाववादी तेवर कोई नई बात नहीं है, इसलिये इसमें कोई खास आश्चर्य की बात भी नहीं है, आश्चर्य की बात तो यह थी कि प्रतिनिधिमंडल में गये हुए नेताओं की मुखमुद्रा, भावभंगिमा और बोली ऐसी थी, मानो भारत ने कश्मीर में बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। शुरु से आखिर तक अपराधीभाव से गिड़गिड़ाते नज़र आये सभी के सभी। मुझे अभी तक समझ नहीं आया कि अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे लोग इस प्रतिनिधिमण्डल में शामिल हुए ही क्यों? रामविलास पासवान और गुरुदास दासगुप्ता जैसे नेताओं की नज़र विशुद्ध रुप से बिहार और पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों के मुस्लिम वोटों पर थी। यह लोग गये तो थे भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल के रुप में, लेकिन उधर जाकर भी मुस्लिम वोटरों को लुभाने वाली भाषा से बाज नहीं आये। जहाँ एक ओर रामविलास पासवान के “नेतृत्व”(?) में एक दल ने यासीन मलिक के घर जाकर मुलाकात की, वहीं दूसरी तरफ़ दासगुप्ता ने मीरवायज़ के घर जाकर उनसे “बातचीत”(?) की। यासीन मलिक हों, अली शाह गिलानी हों या कथित उदारवादी मीरवायज़ हों, सभी के सभी लगभग एक ही सुर में बोल रहे थे जिसका मोटा और स्पष्ट मतलब था “कश्मीर की आज़ादी”, यह राग तो वे कई साल से अलाप ही रहे हैं, लेकिन दिल्ली से गये वामपंथी नेता गुरुदास दासगुप्त और पासवान अपनी मुस्लिम भावनाओं को पुचकारने वाली गोटियाँ फ़िट करने के चक्कर में लगे रहे।

चैनलों पर हमने कांग्रेस के शाहिद सिद्दीकी और वामपंथी गुरुदास दासगुप्ता के साथ मीरवायज़ की बात सुनी और देखी। मीरवायज़ लगातार इन दोनों महानुभावों को कश्मीर में मारे गये नौजवानों के चित्र दिखा-दिखाकर डाँट पिलाते रहे, जबकि गुरुदास जैसे वरिष्ठ नेता “वुई आर शेमफ़ुल फ़ॉर दिस…”, “वुई आर शेमफ़ुल फ़ॉर दिस…” कहकर घिघियाते-मिमियाते रहे। मीरवायज़ का घर हो या गिलानी का अथवा यासीन मलिक का, वहाँ मौजूद इस सेकुलर प्रतिनिधिमण्डल के एक भी सदस्य की हिम्मत नहीं हुई कि वह यह पूछे कि कश्मीर से जब हिन्दू खदेड़े जा रहे थे, तब ये सब लोग कहाँ थे? क्या कर रहे थे? आतंकवादियों और हत्यारों से अस्पताल जा-जाकर मुलाकातें की गईं, पत्थरबाजों से सहानुभूति दर्शाई गई, पासवान ने बिहार के चुनाव और गुरुदास ने बंगाल के चुनाव के मद्देनज़र आज़ाद कश्मीर की माँग करने वाले सभी को जमकर तेल लगाया… लेकिन किसी ने भी नारकीय परिस्थिति में रह रहे जम्मू के पण्डितों और हिन्दुओं के ज़ख्मों के बारे में एक शब्द नहीं कहा… किसी भी नेता(?) में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उन आतंकवादियों से पूछे कि धारा 370 खत्म क्यों न की जाये? मुफ़्त की खाने के लिये अरबों का पैकेज चाहिये तो हिन्दुओं को फ़िर से घाटी में बसाने के लिये उनकी क्या योजना है? कुछ भी नहीं… एक शब्द भी नहीं… क्योंकि कश्मीर में पिटने वाला हिन्दू है, मरने-कटने वाला अपना घर-बार लुटाकर भागने वाला हिन्दू है… ऐसे किसी प्रतिनिधिमण्डल का हिस्सा बनकर जेटली और सुषमा को जरा भी शर्म नहीं आई? उन्होंने इसका बहिष्कार क्यों नहीं किया? जब कश्मीर से हिन्दू भगाये जा रहे थे, तब तो गुरुदास ने कभी नहीं कहा कि “वुई आर शेमफ़ुल…”?

“पनुन कश्मीर” संगठन के कार्यकर्ताओं को बैठक स्थल से खदेड़ दिया गया, इसके नेताओं से जम्मू क्षेत्र को अलग करने, पण्डितों के लिये एक होमलैण्ड बनाने, पर्याप्त मुआवज़ा देने, दिल्ली के शरणार्थी बस्तियों में मूलभूत सुविधाओं को सुधारने जैसे मुद्दों पर कोई बात तक नहीं की गई, उन्हें चर्चा के लिये बुलाया तक नहीं। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि 1947 में पाकिस्तान से भागकर भारत आये हुए सैकड़ों लोगों को अभी तक भारत की नागरिकता नहीं मिल सकी है, जबकि पश्चिम बंगाल में लाखों घुसपैठिये बाकायदा सारी सरकारी सुविधाएं भोग रहे हैं… कभी गुरुदास ने “वुई आर शेमफ़ुल…” नहीं कहा।

वामपंथियों और सेकुलरों से तो कोई उम्मीद है भी नहीं, क्योंकि ये लोग तो सिर्फ़ फ़िलीस्तीन और ईराक में मारे जा रहे “बेकसूरों”(?) के पक्ष में ही आवाज़ उठाते हैं, हिन्दुओं के पक्ष में आवाज़ उठाते समय इन्हें मार्क्स के तमाम सिद्धान्त याद आ जाते हैं, लेकिन जेटली और सुषमा से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ये लोग पासवान जैसे व्यक्ति (जो खुलेआम घुसपैठिए बांग्लादेशियों की पैरवी करता हो) के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाएं, या फ़िर असदुद्दीन ओवैसी जैसे घोर साम्प्रदायिक हैदराबादी (जिनका इतिहास हिन्दुओं के साथ खूंरेज़ी भरा है) के साथ हें-हें-हें-हें करते हुए एक “मक्खनमार बैण्ड” में शामिल होकर फ़ोटो खिंचवायें…। लानत है इन पर… अपने “मूल” स्टैण्ड से हटकर “शर्मनिरपेक्ष” बनने की कोशिश के चलते ही भाजपा की ऐसी दुर्गति हुई है लेकिन अब भी ये लोग समझ नहीं रहे। जब नरेन्द्र मोदी के साथ दिखाई देने में, फ़ोटो खिंचवाने में देशद्रोही सेकुलरों को “शर्म”(?) आती है, तो फ़िर भाजपा के नेता क्यों ओवैसी-पासवान और सज्जन कुमार जैसों के साथ खड़े होने को तैयार हो जाते हैं? इनकी बजाय तो कश्मीर की स्थानीय कांग्रेस इकाई ने खुलेआम हिम्मत दिखाई और मांग की कि सबसे पहले इन अलगाववादी नेताओं को तिहाड़ भेजा जाए… लेकिन सेकुलर प्रतिनिधिमण्डल के किसी सदस्य ने कुछ नहीं कहा।

अब एक सवाल भाजपा के नेताओं से (क्योंकि सेकुलरों-कांग्रेसियों-वामपंथियों और देशद्रोहियों से सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं है), सवाल काल्पनिक है लेकिन मौजूं है कि – यदि कश्मीर से भगाये गये, मारे गये लोग “मुसलमान” होते तो? तब क्या होता? सोचिये ज़रा… तीस्ता जावेद सीतलवाड कितने फ़र्जी मुकदमे लगाती? कांग्रेसी और वामपंथी जो फ़िलीस्तीन को लेकर छाती कूटते हैं वे कश्मीर से भगाये गये मुस्लिमों के लिये कितने मातम-गीत गाते? यही है भारत की “धर्मनिरपेक्षता”…

जो लोग कश्मीर की समस्या को राजनैतिक या आर्थिक मानते हैं वे निरे बेवकूफ़ हैं… यह समस्या विशुद्ध रुप से धार्मिक है… यदि भारत सरकार गिलानी-लोन-शब्बीर-महबूबा-यासीन जैसों को आसमान से तारे तोड़कर भी ला देगी, तब भी कश्मीर समस्या जस की तस बनी रहेगी… सीधी सी बात है कि एक बहुसंख्यक (लगभग 100%) मुस्लिम इलाका कभी भी भारत के साथ नहीं रह सकता, न खुद चैन से रहेगा, न भारत को रहने देगा… निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा (अल्लाह के शासन) से कुछ भी कम उन्हें कभी मंजूर नहीं होगा, चाहे जितने पैकेज दे दो, चाहे जितने प्रोजेक्ट दे दो…।

इस आग में घी डालने के लिये अब जमीयत उलेमा-ए-हिन्द (JUH) ने भी तैयारी शुरु कर दी है। जमीयत ने अगले माह देवबन्द में मुस्लिमों के कई समूहों और संगठनों की एक बैठक बुलाई है, जिसमें कश्मीर में चल रही हिंसा और समग्र स्थिति पर विचार करने की योजना है। JUH की योजना है कि भारत के तमाम प्रमुख मुस्लिम संगठन एक प्रतिनिधिमण्डल लेकर घाटी जायें… हालांकि जमीयत की इस योजना का आन्तरिक विरोध भी शुरु हो गया है, क्योंकि ऐसे किसी भी कदम से कश्मीर समस्या को खुल्लमखुल्ला “मुस्लिम समस्या” के तौर पर देखा जाने लगेगा। 4 अक्टूबर को देवबन्द में जमीयत द्वारा सभी प्रमुख शिया, सुन्नी, देवबन्दी, बरेलवी संगठनों के 10000 नुमाइन्दों को बैठक के लिये आमंत्रित किया गया है। क्या “जमीयत” इस सम्मेलन के जरिये कश्मीर समस्या को “मुस्लिम नरसंहार” के रुप में पेश करना चाहती है? लगता तो ऐसा ही है, क्योंकि जमीयत के प्रवक्ता फ़ारुकी के बयान में कहा गया है कि “कश्मीर में हालात बेहद खराब हैं, वहाँ के “मुसलमान” (जी हाँ, सिर्फ़ मुसलमान ही कहा उन्होंने) कई प्रकार की समस्याएं झेल रहे हैं, ऐसे में मुस्लिम समुदाय मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता…”, अब वामपंथियों और कांग्रेसियों को कौन समझाये कि ऐसा बयान भी “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में ही आता है और जमीयत का ऐसा कदम बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। सम्मेलन में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-इस्लामी, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशवारत तथा ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल जैसे कई संगठनों के भाग लेने की उम्मीद है। भगवान (या अल्लाह) जाने, कश्मीर के “फ़टे में टाँग अड़ाने” की इन्हें क्या जरुरत पड़ गई? और जब पड़ ही गई है तो उम्मीद की जानी चाहिये कि देवबन्द के सम्मेलन में माँग की जायेगी की कश्मीर से भगाये गये हिन्दुओं को पुनः घाटी में बसाया जाये और सदभाव बढ़ाने के लिये कश्मीर का मुख्यमंत्री किसी हिन्दू को बनाया जाये… (ए ल्ललो… लिखते-लिखते मैं सपना देखने लगा…)।

सुन रहे हैं, जेटली जी और सुषमा जी? “शर्मनिरपेक्षता” के खेल में शामिल होना बन्द कर दीजिये… ये आपका फ़ील्ड नहीं है… खामख्वाह कपड़े गंदे हो जायेंगे… हाथ कुछ भी नहीं लगेगा…। आधी छोड़, पूरी को धाये, आधी भी जाये और पूरी भी हाथ न आये… वाली स्थिति बन जायेगी…। जब सभी राजनैतिक दल बेशर्मी से अपने-अपने वोट बैंक के लिये काम कर रहे हैं तो आप काहे को ऐसे सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल में जाकर अपनी भद पिटवाते हैं? क्या कोई मुझे बतायेगा, कि असदुद्दीन ओवैसी को इसमें किस हैसियत से शामिल किया गया था और औचित्य क्या है? क्या सपा छोड़कर कांग्रेसी बने शाहिद सिद्दीकी इतने बड़े नेता हो गये, कि एक राष्ट्रीय प्रतिनिधिमण्डल में शामिल होने लायक हो गये? सवाल यही है कि चुने जाने का आधार क्या है?

बहरहाल, ऊपर दिया हुआ मेरा प्रश्न भले ही भाजपा वालों से हो, लेकिन “सेकुलर”(?) लोग चाहें तो इसका जवाब दे सकते हैं कि – कल्पना करो, कश्मीर से भगाये गये लोग पण्डितों की बजाय मुस्लिम होते… तब समस्या की, उस पर उठाये गये कदमों की और राजनीतिबाजों की क्या स्थिति होती?

8 Responses to “गिलानी-मलिक-मीरवायज़ के सामने घिघियाता हुआ सा सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल…”

  1. pramod jain

    ये तो सर्वमान्य सिधांत है की इस देश को बर्बाद करने में राजनेता लोग ही है, और इनसे ये उम्मीद करना की वो देश को रेप्रेसेन्ट करेंगे निरी बेवकूफी है, कश्मीर के लोग भारत के पैसे पर पलते है और भारत को ही आँख दिखाते है, गिलानी आदि अलगाववादियों को बढ़ावा दिया किसने है, पकिस्तान या विदेशों ने नहीं बल्कि भारतीय दोगले नेताओ ने ही दिया है. वोटबेंक से परे हट कर देश के हित में कड़ा निर्णय लेते तो कश्मीर में ये हालात नहीं होते. जो पकिस्तान का गीत गातें है उनको पकिस्तान की सीमा में फेंक देना चाहिए वहां रहेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी

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  2. Ashwani Garg

    I commend Shri Suresh Chiplunkar for a straight forward and to the point presentation of the recent visit of politicians to Kashmir. Thanks for putting the facts straight.
    I am still wondering why sensible politicians like Sushma Swaraj and Arun Jaitley had to accompony the other third grade politicians like Pawan, Chidrambram etc.
    Chidambaram will go down in the history as “the politician who causeed maximum damage to India”.
    These folks of delegation should have presented themselves not as beggars of votes but as leaders of the country.

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    यद्दपि शुध्द्हम -लोक विरुद्हम ,न कथनीयम न कथनीयम .
    यदयपि यह सच भी है तो भी उसकी गंभीरता के कारण-दुनिया के सामने चीख -चीख कर अपनी ही शर्मिंदगी को बयान करना ठीक है क्या ? देश हमारा है ,संसद हमारी है -सारी दुनिया हमारी लोकतान्त्रिक कार्य प्रणाली को ईर्षा से देखती है और उसी सर्व दलीय प्रतिनिधिमंडल पर -जिस पर कमसे कम तथाकथित राष्ट्रवादियों को गर्व होना चाहिए उस पर इस तरह कीचड उछालना शोभा देता है क्या ?अलगाव वादियों को समझाइश देना भी एक कूटनीतिक हिस्सा है -जरूरी नहीं के सबके भेजे में घुसे .और देश की भलाई भी इसी में है की कम से कम उनके भेजे में न घुसे जो देश के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं फिर चाहे वे अलगाववादी हों या वैचारिक उग्रवादी .भारतीय षड दर्शन में उल्लेखित -साम दाम -दंड भेद इन्ही का इस्तेमाल तो कर रहे हैं .इसके अलावा जो सर्वज्ञात अंतिम विकल्प है उसके लिए भी पूर्व तैय्यारी के बतौर विश्व विरादरी और खास तौर से उनको जिनकी गिद्ध दृष्टी कश्मीर पर टिकी है .ये बताना जरुरी है की कश्मीर हमारा ही क्यों है ? सर्व दलीय प्रतिनिधि मंडल ने शानदार भूमिका अदा की है .दुनिया की तमाम प्रजातांत्रिक ताकतें इसकी तारीफ कर रहीं हैं और हमारे विद्द्वान साथी कितने उतावले हैं की दुश्मन के बजाय अपनी ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वश्रेष्ठ मंच अर्थात भारत की संसद के सार रूप -प्रतिमान -सर्व दलीय प्रतिनिधि मंडल का भोंडा उपहाश कर रहे हैं -जय हो ..

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  4. रामदास सोनी

    रामदास सोनी

    सुरेशजी, जम्मु-कश्मीर की यात्रा पर गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल के सम्मानीय सदस्यों द्वारा जो आचरण वहां जाकर किया गया वो विशुद्ध रूप से भारतीयों की भावना के प्रतिकूल है। जम्मू-कश्मीर की समस्या का समाधान करने के लिए आज नेतृत्व में सरदार पटेल जैसी इच्छा शक्ति का होना जरूरी है। माणिक वर्मा ने एक स्थान पर लिखा है कि “ कायरता जिन चेहरों का सिंगार करती है, मक्खी भी उन पर बैठने से इंकार करती है।” भारत की अखण्डता पर आंच आने को हो और हमारे सम्मानीय प्रतिनिधि अलगाववादियों के सामने घुटने टेक कर गिड़गिड़ाते रहे यह मात्र उनके लिए नहीं वरन् पूरें भारत के लिए शर्म की बात है। राष्ट्रवादी कवि हरिओम पंवार की कविता “काश्मीर” की निम्न पंक्तियां इन नेताओं पर फिट बैठती है —

    बस नारों में गाते रहिए कि कश्मीर हमारा है, छूकर तो देखो हर हिम चोटी के नीचे इक अंगारा है।
    दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल उठाकर दर्पण की, दरबारों की तस्वीरे है बस बेशर्म समर्पण की।
    काश्मीर है जहां तमंचे है केसर की क्यारी में, काश्मीर है जहां रूदन है बच्चों की किलकारी में।
    काश्मीर है जहां तिरंगे झण्डे फाड़े जाते है, 47 के बटंवारे के घाव उघाड़े जाते है।
    काश्मीर है जहां हौंसलों के दिल तोड़े जाते है, खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते है।
    काश्मीर है जहां विदेशी समीकरण गहराते है, गैरों के झण्डे भारत की भूमि पर लहराते है।
    काश्मीर है जहां दरिंदों की मनमानी चलती है, घर-घर में एके 56 की राम कहानी चलती है।
    काश्मीर है जहां हमारा राष्ट्रगान शर्मिन्दा है, भारत मां को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है।
    काश्मीर है जहां देश शीश झुकाया जाता है, मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है।
    हमकों दो आंसू नहीं आते है, बहुत बड़ी दुर्घटना पर, थोड़ी सी चर्चा होती है बहुत बड़ी घटना पर।
    राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाति पर, भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर।
    मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर, भारत के बेटे शरणार्थी हो गए अपनी धरती पर।
    वे घाटी से खेल रहे है गैरों के बलबूते पर, जिनकी नाक टिकी है पाकिस्तानी जूतों पर।
    फिर भी खून सने हाथों को न्यौता है दरबारो का, जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अधिंयारों का।
    कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की, कुलवन्ती दासी हो गई आज रखैलों की।
    घाटी आंगन हो गई खूनी खेलों की, आज जरूरत है सरदार पटेलों की।

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  5. neelesh

    suresh ji namaste,

    app aise hi logon ko jagruk kare apne samaj kashmir ka ithihaas bhula chuka hai ab logon ko samaj ne jaroori hai ki hindhu per kitna hythachaar hua hai aur hota jarahe hai. Hindhu jaage ga to vishwa jaage ga.

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  6. ateet

    बहुत अच्छा लेख है सुरेश जी इस देश में जब तक पासवान जैसे लोग रहेंगे तब तक कुछ नहीं हो सकता है.

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  7. om prakash shukla

    भाई सुरेश जी धन्यवाद जो इन शर्मिंदावाडियो की ढंग से खबर है जब इन लोगो के साथ नीतीश सरकार चलने के बाद भी अपमानजनक और घ्रिडित व्यव्हार कर इनके स्टार नेताओ को कुत्ते की तरह दुतकारते है और ये लोग समझौते के लिए तलवे चाटते है तो हम लोगो जैसे समर्थक अपने बाप दादाओ को कोसते है जो बचपन से इनलोगों के लिए सालो पोस्टर झंडी लगवाते रहे .अज शुषमा स्वराज जो शायद कभी चंद्रशेझार के नेत्रित्व में राजनीत प्रारम्भ की थी और जेतली जो जेठमलानी की तरह टपके लोगो से उम्मीद ही यही है कि ओसामा–बिन–लादेन के डुप्लीकेट मंच के साथ मंच पैर बैठा कर वोते मागने वालो के नतृत्व को स्वीकारे और अपना व्यक्तिगत अगेंडा जो शायद कभी प्रधान मंत्री बनाने में सहायक हो jai आखिर देव गौडा और गुजराल की लाटरी ही तो खुली थी उसी के लालच में मुह खोले बैठे है और वह सब कर रहे है जो एमेर्जेंस्य में इनके लिए असुविधाजनक हो.

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  8. sunil patel

    आदरणीय सुरेश जी. बिलकुल सत्य कह रहे है. सच हमेशा कडवा होता है. राजनीती जो न कराय thoda . जिन्हें काल कोठारी में डाल देना चाहिय था उनके सामने हमारे देश का प्रतिनिधि मंडल घिगिया रहा है, बेहद शर्म की बात है.

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